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प्रधान संपादक की कलम से

बजट बनाना सामान्य परिस्थितियों में भी मुश्किल काम है. इसमें बहुत-से मंत्रालयों की जरूरतों और अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों की मांगों के बीच संतुलन बिठाने की दरकार होती है. अर्थव्यवस्था के अपूर्व संकट वाले दौर में देश का वित्त मंत्री होना फिलहाल सबसे अवांछनीय काम है

अभूतपूर्व केंद्रीय बजट: अभी नहीं तो कभी नहीं अभूतपूर्व केंद्रीय बजट: अभी नहीं तो कभी नहीं

अरुण पुरी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही 'अभूतपूर्व' केंद्रीय बजट प्रस्तुत करने का वादा किया है. यह देखने के लिए कि वे वाकई ऐसा करती हैं या नहीं, हमें 1 फरवरी तक इंतजार करना पड़ेगा. पर हम जानते हैं कि जिन हालात में यह बजट आ रहा है, वे सचमुच अभूतपूर्व हैं जो पिछले चार दशकों में देखे नहीं गए. केवल चार मौके आए जब बजट नकारात्मक वृद्धि के दौर में प्रस्तुत किया गया था—1958-59, 1966-67, 1973-74 और 1980-81.
वित्त मंत्री ने 1 फरवरी 2020 को जब पिछला बजट पेश किया था, भारत की अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ने लगी थी और महज 4.1 फीसद की दर से बढ़ रही थी. इस साल कोविड-19 और लॉकडाउन के दोहरे झटके के चलते उसके 7.7 फीसद तक सिकुड़ जाने का अनुमान है.

इस साल केंद्रीय बजट, जो वित्तीय साल में सरकार के खर्च की प्राथमिकताएं बताता है, पर कहीं ज्यादा करीब से निगाह रखी जाएगी क्योंकि उम्मीद है कि यह इस गहरी खाई से हमें बाहर निकालने का रास्ता तैयार करेगा और वापस वहां ले जाएगा जहां हम महामारी से पहले थे.

इन असामान्य परिस्थितियों को देखते हुए, आम तौर पर बजट के बाद की जाने वाली तहकीकात हम पहले ले आए ताकि बजट से ऊंची उम्मीदों को समझ सकें. 2021 का बजट भारी लाचारियों के वक्त आ रहा है. आमदनी घट रही है, खर्चे बढ़ रहे हैं. वृद्धि के तीन इंजन—निजी खपत, निजी खर्च और निर्यात—लड़खड़ा रहे हैं. चौथा और अकेला सक्रिय इंजन यानी सरकारी खर्च बमुश्किल तमाम जोर लगा पा रहा है. सरकार 29.87 लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा पहले ही कर चुकी है, जो भारत के जीडीपी के 15 फीसद के बराबर है. इसमें धन प्रवाह बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप के 8 लाख करोड़ रुपए भी शामिल हैं. बजट दूसरी पांच बड़ी मदों—कर्ज पर ब्याज, रक्षा, खाद्य सब्सिडी, पेंशन और राज्यों को अंतरण—में कटौती नहीं कर सकता. ये बजट का 60 फीसद हिस्सा हैं. ये या तो राजनैतिक तौर पर नागवार हैं या सांविधिक बाध्यता. खासकर रक्षा, पूर्वी लद्दाख में भारी चीनी लामबंदी को देखते हुए.

अर्थव्यवस्था के दिशासूचक सेक्टरों—ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट, बैंकिंग, मैन्युफैक्चरिंग—के हमारे व्यापक विश्लेषण ने इस हफ्ते की आवरण कथा की थीम के लिए प्रेरित किया. 'खुलकर खर्च करने का वक्त', जो एक्जीक्यूटिव एडिटर एम.जी. अरुण और डिप्टी एडिटर श्वेता पुंज ने लिखी है, इस बात की पड़ताल करती है कि क्यों सरकार को मौजूदा संकट से बाहर निकलने के रास्ते के तौर पर अपने खर्चों का नल पूरी तरह खोल देना चाहिए. यह जानने के लिए कि यह क्यों कारगर हो सकता है, 2009 के बजट की सीख पर नजर डालते हैं.

2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के बाद बजट ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए राजकोषीय घाटा जीडीपी के 2.5 फीसद से बढ़ाकर 6 फीसद पर पहुंचा दिया था और 1.86 लाख करोड़ रुपए के खर्च प्रोत्साहनों का ऐलान किया था, जो उस वक्त जीडीपी का 6.5 फीसद था. बोर्ड ऑफ इंडिया टुडे इकॉनॉमिस्ट (बीआइटीई) के जिन अर्थशास्त्रियों से हमने बात की, उन्होंने ज्यादातर 2009 के फॉर्मूले की ही सिफारिश की. उनका कहना है कि राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5 से 7 फीसद के बीच बढ़ाने की जरूरत है.

विशेषज्ञ तीन क्षेत्रों की पहचान करते हैं जहां सरकार को अपने खर्चों को केंद्रित करना चाहिए. स्वास्थ्य बेशक पहली प्राथमिकता होना ही चाहिए. सरकार को अपने स्वास्थ्य का खर्च जीडीपी के मौजूदा 1.5 फीसद से बढ़ाकर कम से कम 2.5 फीसद करने की जरूरत है ताकि स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा इतना मजबूत किया जा सके कि वह महामारी की किसी भी नई लहर से निबट सके. इंफ्रास्ट्रक्चर एक और व्यापक असर डालने वाला पहलू है जो अर्थव्यवस्था को उठा सकता है. सरकार को 2025 तक 7,300 परियोजनाओं पर 111 लाख करोड़ रुपए खर्च करने के लिए अपने नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट (एनआइपी) को फिर शुरू करने और अपने बकाया बिल चुकाने की जरूरत है. शहरी बेरोजगारी, जो दिसंबर में बढ़कर 8 फीसद पर पहुंच गई, सार्वजनिक तौर पर जितना जानी जाती है उससे कहीं ज्यादा बड़ी चुनौती है.

हमारे कई विशेषज्ञ काम और सामाजिक सुरक्षा देने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के शहरी संस्करण का सुझाव देते हैं. मगर दूसरे सवाल करते हैं कि कहीं इससे ग्रामीण इलाकों के नौकरी चाहने वाले लोगों को तो बढ़ावा नहीं मिलेगा कि वे जरूरी हुनर के बगैर शहरों में नौकरियों की तलाश करें और पहले से चरमराते शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव और बढ़ा दें. बेरोजगारी की समस्या से निबटने के लिए तेज आर्थिक वृद्धि के अलावा कोई आसान समाधान नहीं है.

इस सबके लिए सरकार धन कहां से उगाह सकती है? मसलन एनआइपी के लिए हर साल 25 लाख करोड़ रुपए उगाहना बहुत भारी काम होने जा रहा है. हमारे विशेषज्ञ रक्षा और गैर-रक्षा क्षेत्रों में सरकार की मिल्कियत वाली परिसंपत्तियां भुनाने का सुझाव देते हैं, जो आक्रामक ढंग से और तरीके से किया जाए तो जबरदस्त हो सकता है. साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) का विनिवेश, जिसके लिए सरकार ने 2020-21 में 2.14 लाख करोड़ रु. का लक्ष्य तय किया था, बहुत ही कम महज 11,006 करोड़ रुपए ही हासिल कर सका.

पैसा नाली में बहाने वाले पीएसयू को बंद करना खजाने की रकम बचाना है. सरकार को केंद्र के असैन्य कर्मचारियों की तनख्वाहों की बढ़ती लागत की भी समीक्षा की जरूरत है, जो 10 लाख करोड़ रुपए (2017 में केंद्र और राज्य सरकारों के कर्मचारियों को मिलाकर) है. शायद बहुत पहले उपयोगिता गंवा चुके मंत्रालयों से छुटकारा पाकर शुरुआत की जा सकती है. अगर हमें इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश को तेजी से बढ़ाना है, तो हमें विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए मजबूत बॉंन्ड मार्केट की जरूरत है.

बजट बनाना सामान्य परिस्थितियों में भी मुश्किल काम है. इसमें बहुत-से मंत्रालयों की जरूरतों और अर्थव्यवस्था के तमाम क्षेत्रों की मांगों के बीच संतुलन बिठाने की दरकार होती है. अर्थव्यवस्था के अपूर्व संकट वाले दौर में देश का वित्त मंत्री होना फिलहाल सबसे अवांछनीय काम है. यदि उन्हें पथप्रवर्तक बजट के अपने वादे पर खरा उतरना है, तो वित्त मंत्री को तमाम पुराने दस्तूरों और मजबूरियों को तिलांजलि देनी होगी. यह करों में कटौती करने और मांग तथा खपत में तेजी लाने का अच्छा मौका हो सकता है. उन्हें लीक से हटकर सोचना होगा, अर्थव्यवस्था में जोश भरने और तेज विकास दर वापस लाने की दिलेरी के साथ सोचना होगा, भारतीय अर्थव्यवस्था जिस तेज विकास की हकदार है.

अभी नहीं तो कभी नहीं.

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