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प्रधान संपादक की कलम से

कहा जाता है कि भविष्य वर्तमान का उन्नयन नहीं बल्कि उसका आमंत्रण है. आइए आमंत्रण को स्वीकार करें और इस संकट में दुनिया भर के देशों की तरफ से दिखाई गई फुर्ती, जोश-खरोश और नई-नई चीजें करने के हौसले के साथ दुनिया को बेहतर जगह बनाएं

आमंत्रण को स्वीकार करें आमंत्रण को स्वीकार करें

अगर 2020 सब कुछ बदल देने वाला साल था तो 2021 भविष्य के गर्भ में छिपे कई सवालों के साथ शुरू हो रहा है. हम अब भी दुनिया के कई हिस्सों में अंगड़ाई लेती महामारी और कोविड-19 की कई वैक्सीन लॉन्च होने के साथ कोविड के बाद की दुनिया की उम्मीदों के बीच फंसे हैं. यह नए साल की उम्मीद भरी शुरुआत है, खासकर जब भारत में दो वैक्सीनों को इस्तेमाल की इजाजत मिल गई है. हमें पता है वैक्सीन कोविड-19 का इलाज नहीं, यह वायरस का फैलाव धीमा करने का जरिया भर है. दुनिया की आबादी के बड़े हिस्से को वैक्सीन लगाने में कम से कम दो साल लगेंगे. यानी अब हम महामारी की ढलती बेला में हैं.

इस नई दुनिया का रूप-रंग क्या होगा और 2021 के गर्भ में हमारे लिए क्या छिपा है? हमने 10 विशेषज्ञों से भविष्य में झांकने के लिए कहा. हमारा यह विशेष अंक, जिसे मैनेजिंग एडिटर काइ फ्रीज ने संजोया है, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, मनोरंजन, राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के बड़े रुझानों पर उनकी भविष्यवाणियां प्रस्तुत कर रहा है.

महामारी की हमारी सबसे बड़ी सीख स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन का कहना है कि भारत को स्वास्थ्य में अपना निवेश जीडीपी के 1.5 फीसद से बढ़ाकर कम से कम 2.5 फीसद पर लाने जरूरत है. उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्था को मजबूत, अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए डिजिटल औजारों और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल और अलग से जन स्वास्थ्य काडर खड़ा करना होगा. वे यह भी कहती हैं कि ऊपर से नीचे दिए जाने वाले फरमान कुछ ही वक्त के लिए कारगर होते हैं और धारावी की मिसाल बताती है कि समुदायों को समाधान का हिस्सा बनाना होगा.

सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता इस साल भारत की अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकना होगी. दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बुरी मार हमारी अर्थव्यवस्था को सहनी पड़ी है. कृषि को छोड़कर अर्थव्यवस्था के चार अहम इंजन—घरेलू खपत, सरकारी खर्च, निजी निवेश और निर्यात—लड़खड़ा रहे हैं. सरकार को अर्थव्यवस्था की सेहत फिर से चुस्त-दुरुस्त बनाने की अपनी कोशिशें बढ़ानी होंगी, खासकर जब वैश्विक अर्थव्यवस्था गिरावट के दौर में है. एपीएसी स्ट्रैटजी के सह-प्रमुख नीलकंठ मिश्र को लगता है कि मजबूत नीतिगत उपायों के बावजूद चीन को छोड़कर बाकी वैश्विक अर्थव्यवस्था के 2022 तक कोविड से पहले के स्तर पर लौटने की उम्मीद नहीं है. कोलंबिया युनिवर्सिटी के प्रोफेसर अरविंद पानगड़िया सरकार की आमदनी बढ़ाने की गरज से पीएसयू को आक्रामक ढंग से निजी हाथों में सौंपने के लिए विनिवेश मंत्रालय बनाने की और ग्रामीण तथा शहरी गरीबों को जीडीपी के 1-2 फीसदी के दायरे में नकद सहायता देने की सिफारिश करते हैं.

एशिया रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रतिष्ठित फेलो किशोर महबूबानी मानते हैं कि 21वीं सदी का 'ग्रेट गेम' सैन्य मुकाबले के बजाय आर्थिक है और भारत को हाशिये पर इंतजार करने की बजाय आरसीईपी सरीखे वैश्विक समूहों में हिस्सेदार होना चाहिए. उनकी दलील है कि प्रतिस्पर्धा छोटे वक्त में रचनात्मक विनाश लेकिन लंबी अवधि में आर्थिक मजबूती की ओर ले जाती है. अगर आप दुनिया में कूटनीतिक दबदबा चाहते हैं तो आपको आर्थिक बाहुबल तैयार करना चाहिए.

बीते हुए साल का एक ज्यादा स्वागतयोग्य बदलाव यह था कि अपने शहरों के पूरी तरह ठप पड़ने के दौरान हम सबने स्वच्छ हवा में सांस ली. यह चेतावनी थी: पर्यावरण की अनदेखी करके हम खुद को ही खतरे में डालते हैं. क्या जलवायु परिवर्तन अगली चेतावनी हो सकती है? डोनाल्ड ट्रंप के जाने और राष्ट्रपति जो बाइडन के आने का मतलब है कि अमेरिका 2015 के पेरिस समझौते में फिर शामिल होगा और उत्सर्जन कम करने में जुटेगा. पर्यावरणविद सुनीता नारायण देशों से आग्रह कर रही हैं कि ऊर्जा से लेकर परिवहन बदलाव तक तमाम क्षेत्रों में स्वच्छ हवा के फायदे पक्के करें.

भारत के राजनैतिक फलक पर नजर डालते हुए ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा कह रहे हैं कि 2021 मध्य-दक्षिण विचाराधारात्मक रुख की ओर कदम बढ़ाता दिखाई देगा, जिसमें क्षेत्रीय और जातिगत ताकतों की बजाए जनकल्याणकारी नीतियों और पूंजीवाद के अनूठे मेल के साथ राष्ट्रीय पहचान, गौरव और सुरक्षा जैसे पहलू हावी रहते हैं. ऐसा और भी होगा, अगर भाजपा जल्द ही होने जा रहा पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव जीत लेती है. दूसरी तरफ, अगर ममता बनर्जी फिर से मुख्यमंत्री चुनी जाती हैं, तो वे 2024 में भाजपा का मुकाबला करने के लिए विपक्षी गठबंधन की अगुआई करने की कतार में होंगी.

सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े हमारे गणराज्य की दशा-दिशा पर आलोचनात्मक नजर डालते हुए कह रहे हैं कि संसद की चुप्पी के कारण सार्वजनिक विमर्श सड़कों पर आ गया लगता है. सरकार और उसके आलोचकों को एक-दूसरे पर चीखना बंद कर नई शुरुआत करनी चाहिए. हुक्मरानों और नागरिकों को एक दूसरे को अपनी एकतरफा बात सुनाने के बजाय एक दूसरे के साथ संवाद के रास्ते पर लौटना होगा. हमें कम नाराज देश होने की जरूरत है. वे उम्मीद करते हैं कि 2021 नई तैयारी और संवाद का साल होगा.

महामारी के चलते मीडिया और मनोरंजन की दुनिया में बलात् एक क्रांति घटी. फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (फिक्की) के प्रेसीडेंट उदय शंकर लिखते हैं कि 'मीडिया महज सृजनात्मक उद्यम बजाए टेक्नोलॉजी चालित सृजनात्मक उद्यम में बदल गया है'. वे कहते हैं कि इस क्षेत्र का भविष्य उद्यमियों की एक नई पीढ़ी रचेगी जो कंटेंट और टेक्नोलॉजी दोनों में निवेश करेगी.

लेखक और पत्रकार फरीद जकरिया अपनी बेस्टसेलिंग किताब टेन लेसंस फॉर ए पोस्ट-पैंडेमिक वर्ल्ड का सार पेश करते हुए हमें 2021 के लिए पांच बड़े सबक बता रहे हैं: जनता को महामारी सरीखे झटकों से बचाने की जरूरत है; गैरबराबरी और बदतर होगी; कोविड-19 डिजिटल क्रांति को तेज कर देगा; वैश्वीकरण खत्म न होगा, बस थोड़ा ठहरेगा और शायद यह हमें चीन पर अत्यधिक निर्भरता से अलगाव की तरफ ले जा सकता है; और उत्तर-अमेरिकी दुनिया चीन के दबदबे वाली नहीं, बहुपक्षीय दुनिया होगी.

अलबत्ता चीन रणनीतिक चुनौतियां पेश कर रहा है और यह भारत से बेहतर कौन जानता है, जो सरहदों पर लड़ाकू चीन से निबट रहा है. एग्जीक्यूटिव एडिटर संदीप उन्नीथन बता रहे हैं कि चीन और पाकिस्तान को रोकने के लिए भारतीय सेना को बजट पर भारी दबाव के बावजूद सुधारों को अंजाम देने और अपनी युद्ध मशीन आधुनिक बनाने की जरूरत है.

कहा जाता है कि भविष्य वर्तमान का उन्नयन नहीं बल्कि उसका आमंत्रण है. आइए आमंत्रण को स्वीकार करें और इस संकट में दुनिया भर के देशों की तरफ से दिखाई गई फुर्ती, जोश-खरोश और नई-नई चीजें करने के हौसले के साथ दुनिया को बेहतर जगह बनाएं.

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