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प्रधान संपादक की कलम से

''मेरे पिता ने कहा कि प्रेस जाओ और देखो कि मैंने इसे लेकर क्या सोचा है. मैं इससे जुड़ गया और कभी लंदन नहीं लौटा. मुझे एहसास हुआ कि इसके टिकाऊ होने का अकेला तरीका यह होगा कि हमारे पास अपना काम हो. और इस तरह इंडिया टुडे वजूद में आई''

2020 में नोएडा के इंडिया टुडे मीडियाप्लेक्स में 2020 में नोएडा के इंडिया टुडे मीडियाप्लेक्स में

हमने इंडिया टुडे अंग्रेजी की 45वीं वर्षगांठ मनाने के लिए तय किया कि 45 राष्ट्रीय आइकन को उनके 'जिंदगी बदल देने वाले लम्हों' पर नजर डालने के लिए कहा जाए. चूंकि मैंने दूसरों से उनकी जिंदगी के निर्णायक मोड़ों का खुलासा करने के लिए कहा, इसलिए मुझे मुनासिब लगा कि मैं भी अपने ऐसे क्षण बताऊं. मैं नियति में, या इस बात में कि सब कुछ पहले से तय है, यकीन नहीं करता. जिंदगी बिरले ही कभी सीधी लकीर होती है. इसमें उतार-चढ़ाव और मोड़ आते हैं और उनमें से कई हमें चौंकाते हुए अचानक आते हैं. असल में यह हादसों, इत्तेफाकों और अक्सर किस्मत का सिलसिला होती है. कम से कम मेरे मामले में तो इसी तरह हुआ. मैं उन बच्चों में से नहीं था जो जिंदगी में जल्द ही यह जान जाते हैं कि वे क्या चाहते हैं. विज्ञान में मेरी गति नहीं थी, इसलिए मेरे इंजीनियर या डॉक्टर बनने का यानी उन पेशों में जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता था जिनका उन दिनों बोलबाला था. फिर मैं उस पीढ़ी का बच्चा था जो अपने माता-पिता की बात मानती थी, खासकर जब आपकी कोई खास महत्वाकांक्षा नहीं होती थी.

1960 के दशक में, अपनी मेहनत से अपना मुकाम हासिल करने वाले मेरे कारोबारी पिता मानते थे कि भारत कम्युनिज्म की राह पर जा रहा है और चार्टर्ड अकाउंटेंट बनकर मैं पेशेवर काबिलियत हासिल कर लूंगा. कम्युनिज्म को भी आखिर चार्टर्ड अकाउंटेंटों की जरूरत तो पड़ेगी! तो मैंने लंदन से चार्टर्ड अकाउंटेट की योग्यता हासिल की. मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी लेकिन मेरे पिता और फ्लीट के लॉर्ड रॉय थॉमसन, जो दुनिया भर में सबसे ज्यादा अखबारों के मालिक थे, इत्तेफाकन हुई एक मुलाकात के बाद दोस्त बन गए और उन्होंने साथ मिलकर भारत में कारोबार शुरू करने का फैसला किया. इस तरह थॉमसन प्रेस की शुरुआत हुई, जो कमर्शियल प्रिटिंग प्रेस था क्योंकि उस वक्त अखबारों में विदेशी मिल्कियत की इजाजत नहीं थी.

मैं लंदन में चार्टर्ड एकाउंटेंट के तौर पर काम कर रहा था और छुट्टियों में घर आया था. मेरे पिता ने कहा कि प्रेस जाओ और देखो कि मैंने इसे लेकर क्या सोचा है. मैं इससे जुड़ गया और कभी लंदन नहीं लौटा. कुछ साल बाद मुझे कमान सौंप दी गई. मुझे एहसास हुआ कि इसके टिकाऊ होने का अकेला तरीका यह होगा कि हमारे पास अपना काम हो. हमने बच्चों की किताबें छापनी शुरू कीं जो भारतीयों ने लिखी और तस्वीरों से सजाई थीं. बच्चों का ज्यादातर साहित्य उन दिनों आयात किया जाता था; कुछ तो मैंने खुद लिखी थीं.

हमने जिस पहली पत्रिका का प्रकाशन किया, वह 1975 में जर्नल ऑफ एप्लाइड मेडिसिन नाम से एक मेडिकल जर्नल था. फिर उसी साल दिसंबर में इंडिया टुडे आई. हालांकि खबर, पढ़ने और सवाल पूछने का जुनून मुझमें था, लेकिन मीडिया मुगल बनने की कोई महान दूरदृष्टि मुझमें नहीं थी. पत्रिका पहले अनिवासी भारतीयों को उनके मूल देश के बारे में बताने के लिए डिजाइन की गई थी. यह कामयाब नहीं हुई—एनआरआइ तक पहुंचना बहुत मुश्किल था. मगर पत्रिका को बंद करने से पहले हमने इसे घरेलू बाजार में लाने का फैसला किया. प्रतिक्रिया उत्साह बढ़ाने वाली थी. कुछ महीने बाद जनवरी 1977 में श्रीमती गांधी ने इमरजेंसी हटाने और चुनाव करवाने का संकेत दिया.

यह इस पत्रिका और मेरे लिए निर्णायक मोड़ था. आप देख सकते हैं, इंडिया टुडे का जन्म नाकामी से हुआ था. इमरजेंसी की ज्यादतियां और उसके बाद हास्यास्पद रूप से गड़बड़ जनता पार्टी की दो साल की हुकूमत युवा और जोशो-खरोश से भरे स्टाफ के लिए आदर्श खुराक थी. उन्होंने खबरों का पीछा किया और किसी विचारधारा के लबादे या न्यस्त स्वार्थ के बगैर उन्हें जस का तस बयां कर दिया. जनवरी 1977 में हमारा सर्कुलेशन 15,000 कॉपी था; साल खत्म होते-होते हम 1,00,000 पर पहुंच गए.

दूसरे छोटे निर्णायक मोड़ भी आए. जैसे जनता पार्टी की सरकार के गिरने के बाद 1980 में श्रीमती गांधी के लौटने की हमारी भविष्यवाणी, वह भी तब जब ज्यादातर राजनैतिक पंडित उनकी हार का दावा कर रहे थे. इससे पत्रिका की साख में भारी इजाफा हुआ और राजनैतिक तबका हमें ज्यादा गंभीरता से लेने लगा. यह जनमत सर्वेक्षण की शुरुआत भी थी, जो फिर अक्सर किए जाने लगे. उसके बाद कभी पीछे मुड़कर देखने का मौका नहीं आया.

खासे बहस-मुबाहिसे के बाद 2 जून 1997 को हमारा पाक्षिक साप्ताहिक बन गया. मेरा एक सीधा-सादा मंत्र था: हम बस शानदार संपादकीय सामग्री पेश करने में अपने सारे संसाधन झोंक दें, बिजनेस वाला हिस्सा तो अपना ख्याल खुद रख लेगा. और उसने रखा भी. वित्तीय मजबूती ने हमें तमाम कोनों से आने वाले उन दबावों के सामने, जो इस बिजनेस में होते ही हैं, दृढ़ता से टिके रहने की ताकत दी. इंडिया टुडे ग्रुप लगातार इसी स्वभाव से ओतप्रोत बना रहा है, फिर चाहे जिस भी माध्यम में जाना हमने चुना हो.

हमारे छायाचित्रों और सामयिक आलेखों ने पक्का किया कि हम भीड़ में अलग दिखाई दें और उस ऊंचाई पर पहुंचे जहां हम आज हैं—यानी डिजिटल क्रांति के बावजूद 95 लाख पाठक संख्या के साथ देश की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पत्रिका. इंडिया टुडे अंग्रेजी का यह 1,751वां अंक (हिंदी का 1,481वां अंक और 35वां साल) है. 45 सालों में हम एक भी संस्करण से नहीं चूके, कोविड-19 के इस असाधारण साल में भी नहीं. पत्रिका की कामयाबी ने इंडिया टुडे ग्रुप की नींव रखी. ग्रुप ने इन 45 सालों में 56 प्रकाशन, 24-घंटे के चार चैनल, एक म्यूजिक लेबल, सात रेडियो स्टेशन, ऑनलाइन शॉपिंग, ऑनलाइन एजुकेशन, एक स्कूल, एक आर्ट गैलरी, 12 वेबसाइट, छह ऐप और 30 मोबाइल वीडियो चैनल लॉन्च किए. बेशक नाकामियां मिलीं और गलतियां भी हुईं. मैंने कभी उन पर बहुत ज्यादा सोच-विचार नहीं किया, बस सबक सीखे और आगे बढ़ गया. मैं अपनी जिंदगी को सबसे अच्छी तरह उस बात से जोड़ता हूं जो गीतकार गुलजार ने इस अंक में कही है, ''जिंदगी की इमारत का कोई नक्शा तो होता नहीं कि आर्किटेक्ट पहले बना दे. उसे तो बस एक्स्प्लोर करते रहना होता है.''

अपनी 45वीं वर्षगांठ के विशेषांक के लिए हमने बहादुरी, धैर्य और लगन के प्रेरक अफसानों का बेशकीमती खजाना जुटाया और सजा-संवारकर पेश किया है. इनमें उन जानी-मानी शख्सियतों की कहानियां हैं, जो अपनी मामूली पृष्ठभूमि की बेड़ियां तोड़कर ऊपर आए. जैसे कि वे रॉकेट वैज्ञानिक जो सीमांत किसान परिवार से आए हैं और जिनके पास चप्पल तक खरीदने के पैसे नहीं होते थे लेकिन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के प्रमुख बने और सूर्य, चंद्रमा और शुक्र पर खोजी अभियान भेजते हैं. या हमारे सबसे दबे-कुचले समुदायों में से एक से आए वे सोशल ऐक्टिविस्ट, जिन्होंने सिर पर मैला ढोने के अभिशाप को जड़ से मिटाने का अभियान शुरू किया.

हम उन सरकारी अफसरों का लेखा-जोखा भी लाए हैं जिन्होंने लीक से हटकर सोचा और चौंकाने वाले नतीजे दिए. मसलन, वह रेलवे इंजीनियर, जिसने अपने करियर के आखिर में भूगोल को ललकारने वाला प्रोजेक्ट और यातायात का एक नया साधन विकसित किया और ये दोनों अब उनकी करीबी पहचान बन गए हैं. या वे भारतीय महिला बैंकर जो जिंदगी के एक चौराहे पर पहुंचकर अपने पेशे को तिलांजलि देने के बारे में सोच रही थीं लेकिन तभी उन्हें एहसास हुआ कि ''छोड़ना कहीं ज्यादा आसान है और आसान विकल्प नहीं चुनना चाहिए.'' फिर वह अभिनेता जिसका स्कूल में मजाक उड़ाया जाता था लेकिन आगे चलकर उन्होंने एक के बाद एक शुरू में नाकाम और बाद में हिट फिल्में दीं और हमारे सबसे नामुमकिन सितारों में से एक बने.

शानदार शख्सियतों की हमारी फेहरिस्त में ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने नाकामी से भयभीत हुए बगैर कामयाबी का अलहदा रास्ता तैयार किया. उनमें वे राजनीतिज्ञ हैं जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के पद पर पहुंचने की नाकाम कोशिश को पीछे छोड़ दिया और भारतीय राजनीति में कामयाब करियर बनाने निकल पड़े और साथ ही असाधारण लेखक, विद्वान वक्ता तथा अग्रणी सार्वजनिक बुद्धिजीवी भी बने. इन शख्सियतों को जो बात खास और अलग बनाती है, वह है जोखिम उठाने का माद्दा. यह वह गुण है जो हमारे कई कारोबारियों में कूट-कूटकर भरा है.

जैसे वो युवा आंत्रेप्रेन्योर जिसने परिवार के कपड़े के कारोबार से अलग होने और एक फार्मास्युटिकल फर्म का अधिग्रहण करने के बाद अपनी किस्मत को हमेशा के लिए बदल दिया. या वह कुलीन कारोबारी जिन्हें उनके पिता की त्रासद मौत के बाद परिवार का कारोबार चलाने में लगा दिया गया और आगे चलकर उन्होंने अरबों डॉलर की विशालकाय वैश्विक कंपनी खड़ी की. एक और अरबपति कारोबारी को अपने पिता का कुकिंग ऑइल का कारोबार संभालने के लिए स्टैनफोर्ड में अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़नी पड़ी और जो अब भारत की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनियों में से एक चला रहे हैं. एक चौथे धन्नाशाह भी हैं, जो धातुओं के कबाड़ के व्यापार से शुरू करके अरबों डॉलर का साम्राज्य चला रहे हैं जो धातु, खनन, तेल और गैस तक फैला है.

अन्य आइकन सफलता की असाधारण कहानियां रचने के लिए बंधे-बंधाए रास्तों से मुड़कर आए. जो शख्स आज हमारे सबसे प्रतिभावान गीतकारों में से एक है, उसने मोटर गैराज से शुरू किया था. वह बैंकर जिन्होंने अपनी नौकरी की एकरसता से बचने के लिए लिखना शुरू किया और अब बेस्टसेलिंग लेखक में बदल गए हैं.

आखिर में, हमारे यहां ऐसी शख्सियतें भी हैं जो चोटों से उबरकर अपने पेशे की ऊंचाइयों पर पहुंचे. वह शानदार बैडमिंटन खिलाड़ी है, जो चोटों से परेशान होकर कोच-सह-प्रशासक बन गए और भारत में विश्व स्तर की प्रतिभाएं तैयार कर रहे हैं. और दुश्मन की गोली से जीवित बच निकले जनरल जो अब भारत के पहले रक्षा प्रमुख हैं.

इनमें से कई कहानियों में आपको एक पैटर्न और जिंदगी को बदल देने वाले कुछ सबक मिलेंगे. मुसीबत अक्सर महान शिक्षक होती है. यह आपको प्रतिकूल हालात से लड़ते हुए अपना रास्ता बनाना और अपना सर्वश्रेष्ठ सामने लाना सिखाती है. कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं है; कभी-कभी प्रतिभा अपने आप में काफी नहीं होती. अपनी शैक्षणिक योग्यताओं के भरोसे कभी न रहें, बस सीखते रहें. सही वक्त पर सही जगह होना किस्मत की बात है. अलबत्ता हम जो विकल्प चुनते हैं उन्हीं से तय होता है कि हम कौन हैं और हम क्या बनते हैं.

मानवजाति के बदतर सालों में से एक के समाप्त होने पर मैं सच्चे मन से कामना करता हूं कि उम्मीद, असाधारण साहस और व्यक्तिगत कामयाबी की ये कहानियां आपको नए साल की प्रेरणा प्रदान करें. प्रिय पाठक, हमारे इस सफर का हिस्सा होने के लिए मैं आपका शुक्रिया भी अदा करना चाहूंगा. यह सफर अभी लंबा चलेगा.

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