scorecardresearch
 

प्रधान संपादक की कलम से

दीर्घावधिक समाधान बैंकिंग क्षेत्र में आमूलचूल सुधार की मांग करता है. बड़े कर्जों की गहरी छानबीन और सख्त नियंत्रण के साथ हर तिमाही में संपत्ति ऑडिट, समीक्षा और सख्त जांच-पड़ताल की जरूरत है

अर्थव्यवस्था की दुखती रग अर्थव्यवस्था की दुखती रग

अरुण पुरी

आर्थिक वजहों से अधिक अपने समाजवादी रुझान को आगे बढ़ाने के लिए इंदिरा गांधी ने 1969 में 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था, जिनमें देश का लगभग 85 फीसद जमा खाता हुआ करता था. इन वर्षों में राष्ट्रीयकृत बैंकों ने दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों तक अपनी पहुंच बढ़ाई और खेती-किसानी के लिए कर्ज मुहैया कराया. अलबत्ता, कुछ की दलील है कि यह काम तो निजी बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण लगाकर भी किया जा सकता था. इस बीच, यह नेताओं और क्रोनी या याराना कारोबारियों के लिए ऐसा मुफ्त उपहार साबित हुआ है कि देश की अर्थव्यवस्था से उसने भारी कीमत वसूली है. वोटर लुभाऊ मजबूरियों के कारण ऐसे कर्ज मेलों का आयोजन किया गया, जिनमें बैंकों को वापसी की मामूली गारंटी के बावजूद कर्ज बांटना पड़ा है. आज, देश का तकरीबन 65 फीसद बैंकिंग क्षेत्र (जमा के मद में) सरकारी मिल्कियत वाला है और देश के बैंक 2018-19 में दुनिया में सबसे अलाभकर स्थिति में हैं. राजनैतिक सत्ता की मिल्कियत की तरह सरकार संचालित तमाम कारोबार की निकम्मेपन को समेटे देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कारदाताओं के खरबों रुपए स्वाहा करने वाले अंधे कुएं बन गए हैं.

सरकार पिछले कुछ साल में सरकारी बैंकों में मोटे तौर पर 3.5 लाख करोड़ रु. डाल चुकी है. यह जल जीवन मिशन की समूची बजट योजना के बराबर है, जिसका ऐलान अगस्त 2019 में देश के सभी घरों तक पाइपलाइन से पानी पहुंचाने के लिए किया गया. इस साल अगस्त में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 20 में धोखाधड़ी में बैंकों के 1.86 लाख करोड़ रु. लुट गए. ये 80 फीसद सरकारी बैंकों में हुए. यह आंकड़ा सरकार के महिला और बाल विकास पर खर्च करने की इच्छा का छह गुना है. यह निहायत शर्मिंदगी का सबब है कि करदाता बैंक के गोरखधंधे की कीमत अदा करे, जबकि वह रकम ज्यादा सार्थक काम में लग सकती हो.

पिछले महीने कारोबारी हलके एक और बैंक के लगभग डूबने से हैरान हो उठे. आरबीआइ को लक्ष्मी विलास बैंक को उबारने के लिए 318 करोड़ रु. का कर्ज माफ करना पड़ा और 336 करोड़ रु. अंश-पूंजी देनी पड़ी. शुक्र है कि यह मामूली ही था, लेकिन इससे गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) के गहराते संकट की ओर ध्यान गया, जो डूबत कर्ज के लिए बैंक शब्दावली है. जून 2019 में एनपीए 9.4 लाख करोड़ रु. था. यह देश केसमूचे स्वास्थ्य बजट का चार गुना है, जो अब अर्थव्यवस्था की दुखती रग बना हुआ है. अधिकतर एनपीए दशक भर पहले देश की अर्थव्यवस्था में आए उछाल के लिए मुहैया कराया गया कर्ज है, जब देश के बैंकों ने खासकर दूरसंचार और रियल एस्टेट जैसे पैसा खपाऊ सेक्टर को खुले हाथ से कर्ज दिया.

हालांकि बाद में जब सतह के नीचे डूबत कर्ज का बढ़ता जंजाल खुला तो मौजूदा एनपीए ऊंट के मुंह में जीरा जैसा लगने लगा. पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का आकलन है कि महामारी के दौर में ब्याज भुगतान पर मोरेटोरियम के सरकारी ऐलान से इस साल के अंत तक एनपीए में अतिरिक्त 10 लाख करोड़ रु. का इजाफा हो जाएगा.

यानी मौजूदा आंकड़े का दोगुना. 2017 में सरकार ने सरकारी बैंकों में जान फूंकने के लिए 2.11 लाख करोड़ रु. मुहैया कराने की योजना बनाई, जो इस साल शिक्षा के मद में बजट आवंटन के दोगुने से ज्यादा है. निजी क्षेत्र के बैंक भी इस जंजाल से अलग नहीं हैं. आइसीआइसीआइ और हाल में येस बैंक इसकी मिसाल हैं, जिनके प्रमोटर ही फंसे पाए गए. फर्क यह है कि सरकारी बैंकों में करदाता को चपत लगती है जबकि निजी बैंकों में शेयरधारकों को.

पिछले छह साल में बैंकिंग क्षेत्र में गड़बड़झाले के काफी संकेत मिले हैं. इसकी शुरुआत विजय माल्या और नीरव मोदी जैसों के मामलों से होती है, जो याराना बैंकिंग के मिसाल हैं. सरकारी बैंकों का डूबत कर्ज 8.8 लाख करोड़ रु. के साथ देश में कुल एनपीए का करीब 85 फीसद है. अकेल भारतीय स्टेट बैंक का डूबत कर्ज 2.23 लाख करोड़ रु. है. नतीजतन, बैंक नकदी की भरमार के बावजूद कर्ज देने में सख्ती बरत रहे हैं. बैंकों पर लोगों का भरोसा बुरी तरह डोल गया है. हम सभी जानते हैं कि पूंजी अर्थव्यवस्था की ऑक्सीजन है. इसके बिना कारोबार बढ़ नहीं सकते और बिना वृद्धि के हमारी अर्थव्यवस्था किनारे ही बैठी रहेगी. जब हमारा सामना सबसे बुरे वर्ष से है, बढ़ते एनपीए का मतलब है कि आने वाले वर्षों में बेहद बुरा दौर हमारा इंतजार कर रहा है.

इसमें दो राय नहीं कि समूचा बैंकिंग क्षेत्र धोखाधड़ी, बढ़ते एनपीए, लुंज-पुंज कामकाज और जोखिम लेने में हिचक के कारण दलदल में फंसा है. 10 सरकारी बैंकों को मिलाकर चार करने जैसा सरकारी प्रयास दिखावटी जैसा है. सरकारी बैंकों को ज्यादा स्वायत्ता देने और पेशेवर प्रबंधन नियुक्त करने की कोशिशें मामूली फेरबदल ही साबित हुई हैं.

आरबीआइ की एक कार्यकारी समिति ने बड़े कॉर्पोरेट घरानों को बैंक प्रमोटर बनाने की सिफारिश की है. इसमें अपनों या अपनी ही दूसरी कंपनियों को कर्ज बांट देने का जोखिम है. आरबीआइ के आंकड़े बताते हैं कि सरकारी बैंकों की कर्ज हिस्सेदारी 2015 में 74.3 फीसद से घटकर 2020 में 59.8 फीसद हो गई है, जबकि निजी बैंकों की 21.3 फीसद से बढ़कर 36 फीसद हुई है. कुछ निजी बैंकों ने बहुत अच्छा मूल्य-निर्माण किया है. मसलन, एचडीएफसी का बाजार पूंजीकरण 16 दिसंबर को 7.79 लाख करोड़ रु. था, जो सभी सरकारी बैंकों के संयुक्त बाजार पूंजीकरण (4.88 लाख करोड़ रु.) से भी ज्यादा है.
अगर सरकार ध्यान दे तो इसमें एक संदेश है. दीर्घावधिक समाधान बैंकिंग क्षेत्र में आमूलचूल सुधार की मांग करता है. बड़े कर्जों की गहरी छानबीन और सख्त नियंत्रण के साथ हर तिमाही में संपत्ति ऑडिट, समीक्षा और सख्त जांच-पड़ताल की जरूरत है.

हमारी आवरण कथा 'बैंक क्यों हैं बदहाल' इसी चिंताजनक पहलू पर गौर करती है और राह सुझाती है. इसे एग्जीक्यूटिव एडिटर एम.जी. अरुण, डिप्टी एडिटर श्वेता पुंज और सीनियर एडिटर अनिलेश एस. महाजन ने लिखा है.

देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ने के लिए एनपीए के बोझ के बिना कर्ज का प्रवाह जरूरी है. अगले पांच साल में बकाया बैंक कर्ज तकरीबन दोगुनी करने की जरूरत है. भारत में कर्ज-जीडीपी अनुपात 56 फीसद है, जबकि चीन में यह 150-200 फीसद के दायरे में है. देश की अर्थव्यवस्था 50 खरब डॉलर की हो, इसके लिए अगले पांच साल तक बकाया कर्ज में वृद्धि 15 फीसद होनी चाहिए, जो फिलहाल 8-10 फीसद है. अगर सरकार आर्थिक विकास के प्रति गंभीर है तो उसे बुनियादी बैंक सुधार की कड़वी गोली निगलनी ही होगी. वरना अर्थव्यवस्था भंवर में चक्कर ही काटती रहेगी.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें