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प्रधान संपादक की कलम से

किसानों से बात करने की जरूरत है और इससे भी ज्यादा अहम यह कि सरकार को फसलों के पैटर्न में विविधता लाने के लिए एक योजना बनाने की जरूरत है

6 मई, 2020 का आवरण 6 मई, 2020 का आवरण

अरुण पुरी

बुनियादी सुधार लाना किसी भी देश में तकलीफदेह और चुनौतियों से भरी प्रक्रिया है. लोकतंत्र में तो ऐसा और भी ज्यादा है. निहित स्वार्थों से लड़ना पड़ता है. विपक्षी राजनैतिक दल तो जन विरोध का फायदा उठाने को हमेशा तैयार रहते ही हैं. भारत में यह खास तौर पर मुश्किल इसलिए भी है क्योंकि हम न केवल लोकतंत्र बल्कि संघीय गणराज्य भी हैं. यही नहीं, हम ऐसी अर्थव्यवस्था हैं जो दशकों से समाजवाद की चाशनी में तरबतर रही है और यह समाजवाद हमें लोकलुभावन नीतियों से विरासत में मिला है.

अर्थव्यवस्था को उदार बनाने और इसे बाजार की ताकतों के तहत लाने की किसी भी कोशिश का जबरदस्त विरोध किया जाता है. बीते हफ्ते के दौरान हजारों किसानों ने राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं पर घेरा डाल दिया. इसकी वजह थी तीन विवादास्पद कृषि कानून: किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन तथा सुविधा) अधिनियम 2020; मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तीकरण और सुरक्षा) समझौता अधिनियम 2020; और अनिवार्य वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020. ये कानून एक राष्ट्र, एक बाजार के अच्छे मार्गदर्शक सिद्धांत पर आधारित हैं.

पंजाब भारत के गेहूं के सालाना उत्पादन में 11.9 फीसद का और चावल की उपज में 12.5 फीसद का योगदान देता है. राज्य के कोई 11 लाख परिवार कृषि पर निर्भर हैं. मिसाल के लिए, पिछले साल रबी और खरीफ के सीजन में केंद्रीय एजेंसियों ने पंजाब की 85 फीसद कृषि उपज खरीदी और इस पर 52,000 करोड़ रुपए खर्च किए. किसानों की आगत लागतों को कम रखने के लिए कृत्रिम ढंग से नियंत्रित कीमतों के जरिए उन्हें मुफ्त बिजली, सस्ते उर्वरक, बीज मुहैया करने के लिए केंद्र और राज्य दोनों ने सब्सिडी की शक्ल में 14,000 करोड़ रुपए खर्च किए.

किसानों को डर है कि नए विधेयक अच्छे-भले ढंग से चली आ रही आढ़तियों और कृषि उपज मंडी समिति या एपीएमसी की व्यवस्था को तहस-नहस कर देंगे. उन्हें आशंका है कि कॉर्पोरेट कंपनियां कोई शुल्क चुकाए बगैर घुस आएंगी और समय बीतने के साथ एपीएमसी और केंद्रीय एजेंसियों के हाथों न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर पक्की खरीद को तिलांजलि दे दी जाएगी.

अलबत्ता पंजाब के गुस्से की जड़ें कहीं गहरी हैं और इनसे भारत के कृषि क्षेत्र की मौजूदा बीमारियों की झलक मिलती है. हरित क्रांति अपनी ऊर्जा और रफ्तार खो चुकी है, वहीं पंजाब गेहूं और धान के फंदे को तोड़कर उससे मुक्त नहीं हो सकता और ज्यादा फायदेमंद फसलों को नहीं अपना सकता. एमएसपी पर बहुत ज्यादा निर्भरता का नतीजा राजस्व में ठहराव, फसलों के पैटर्न में विसंगतियों और भूमिगत जल के छीजते जाने में हुआ है. हरेक कृषि परिवार औसतन 2.1 लाख रुपए के कर्ज में डूबा है और ग्रामीण कर्जदारी पंजाब में सबसे ज्यादा है.

बीते दशक के दौरान 3,500 किसानों ने खुदकुशी की और इसकी मुख्य वजह यह थी कि वे अपना कर्ज नहीं चुका सके. पंजाब में कोई 72 फीसद जोत पांच एकड़ से कम हैं. मध्य प्रदेश सरीखे राज्य अब ज्यादा गेहूं उगा रहे हैं, जिसका अर्थ है कि पंजाब में अब घटते प्रतिफल के नियम की शुरुआत हो चुकी है. तो भी, कृषि इसका मुख्य आधार बना हुआ है क्योंकि पंजाब के उग्रवाद के दिनों में तहस-नहस हो गए नौकरियां पैदा करने वाले उद्योग अब तक लौट नहीं सके हैं.

तीनों कृषि कानूनों के सुधारवादी इरादों को खामियां निकाल पाना मुश्किल है. हमारी पिछले आवरण में इसे कृषि क्रांति 2.0, हरित क्रांति के बाद अगली बहुप्रतीक्षित छलांग कहा गया था. केंद्र ने गलती यह की कि तमाम हितधारकों से बात करके सलाह-मशविरे की व्यापक प्रक्रिया नहीं चलाई, खासकर तब जब कृषि राज्य का विषय है.

इन कानूनों को जून में अध्यादेश के जरिए लाया गया और सितंबर में पर्याप्त बहस के बगैर संसद से पारित करवा लिया गया. इससे इन्हें लागू करने की जल्दबाजी को लेकर संदेह पैदा हुए. इन्हें संसदीय समिति में भेजकर शायद इस व्यापक विरोध से बचा सकता था जिसका सामना अब सरकार कर रही है. इतने अहम सुधार लाने से पहले निश्चित तौर पर ज्यादा जमीनी काम करने की जरूरत थी. इन कानूनों का विरोध का पैमाना देखकर, और यह हकीकत देखकर कि उनका साबका एक अहम वोट बैंक से पड़ा है, सरकार किसानों से बातचीत करने को मजबूर हुई. फिर यह तो होना ही था कि सरकार की परेशानी देखकर विपक्षी पार्टियां अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिए आंदोलन का फायदा उठाने की खातिर अखाड़े में कूद पड़ीं.

हमारी आवरण कथा, 'पंजाब क्यों नाराज़' ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा और सीनियर एडिटर अनिलेश एस. महाजन ने लिखी है और यह किसान आंदोलन के नतीजों और भारत के गेहूं और धान के कटोरे राज्य पर इसके असर पर नजर डालती है. हमने पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू भी किया है.

किसानों से बात करने की जरूरत है और इससे भी ज्यादा अहम यह कि सरकार को फसलों के पैटर्न में विविधता लाने के लिए एक योजना बनाने की जरूरत है. मिसाल के लिए, पड़ोसी हरियाणा पानी निगलने वाली धान की फसल को छोडऩे में किसानों की मदद करने के लिए प्रति एकड़ 7,000 रुपए दे रहा है. अगर भारत को तरक्की करनी है तो किसानों को उनकी जमीन से बाहर उत्पादक नौकरियों देने की जरूरत है, जिसका मतलब है उन्हें नए हुनर से लैस करना और ग्रामीण बुनियादी ढांचा विकसित करना ताकि खाद्य प्रसंस्करण सरीखे खेती-किसानी से जुड़े उद्योग जरूरी रोजगार दे सकें.

अगर ऐसा नहीं हुआ तो किसानी की आमदनी को 2022 तक दोगुना करने का चार साल पुराना मोदी सरकार का वादा सुदूर सपना ही बना रहेगा. कृषि क्रांति 2.0 को समग्र नजरिए की जरूरत है और इसे अपने सही अंजाम पर पहुंचना ही चाहिए. इससे ज्यादा अहम यह कि इसे उन सब प्रमुख लोगों को अपने साथ लेकर चलना होगा जिनके हित इससे जुड़े हैं.

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