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प्रधान संपादक की कलम से

इस हफ्ते ब्रिटेन फाइजर-बायोएनटेक वैक्सीन को इस्तेमाल के लिए मंजूरी देने वाला पहला देश बन गया.

22 जुलाई, 2020 का आवरण 22 जुलाई, 2020 का आवरण

सदी के बदतरीन वर्षों में एक जब आखिरी मुकाम पर है, हम मृतकों का हिसाब लग रहे हैं. कोविड-19 महामारी दुनिया भर में अब तक 14 लाख लोगों का जान ले चुकी है और 6.4 करोड़ लोग संक्रमण का शिकार हो चुके हैं, जबकि दुनिया भर की अर्थव्यवस्था में खरबों स्वाहा हो चुका है. भारत में 95 लाख लोग संक्रमण ग्रस्त हो चुके हैं और दुनिया में सबसे अधिक संक्रमण वाला दूसरा देश है.

हमारे देश में मौत का आंकड़ा 1,38,122 है, जो दुनिया में तीसरे नंबर पर है, मगर खुशकिस्मती से हमारी मृत्यु दर 1.5 फीसद के साथ सबसे कम है. इसके बावजूद, महामारी देश में जारी है इसलिए चारों तरफ अनिश्चय का माहौल है. देश खासकर इस लिहाज से भी मुश्किल में है क्योंकि यहां 31 फीसद लोग शहरों में भीड़ भरे अस्वस्थकर स्थितियों में रहते हैं और स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है.

ऐसे वक्त में जब अर्थव्यवस्था में बहाली के हल्के संकेत मिल रहे हैं, देश एक और लॉकडाउन नहीं झेल सकता. ऐसे में किसी कारगर वैक्सीन की संभावना उस वायरस के खिलाफ भारी उम्मीद जगाती है, जिसने हमारी जिंदगी से पूरा साल भर छीन लिया.

इस हफ्ते ब्रिटेन फाइजर-बायोएनटेक वैक्सीन को इस्तेमाल के लिए मंजूरी देने वाला पहला देश बन गया. मॉडर्ना और फाइजर की वैक्सीन का अमेरिकी खाद्य और दवा प्रशासन (एफडीए) के मानकों के मुताबिक अत्यधिक जोखिम वाले समूहों पर आपात प्रयोग किया गया. आखिर, महीनों बाद उम्मीद की किरण झिलमिलाई है.

साझा वैज्ञानिक उद्यम के लिए समूची मानवता का साथ खड़ा होना विरला ही है. इसकी तेजी से डब्ल्यूएचओ का इस साल फरवरी का आकलन पीछे छूट गया कि वैक्सीन में 18 महीने लगेंगे. 

वैक्सीन आपकी रोग-प्रतिरोधक प्रणाली को ऐसी ऐंटी-बॉडी बनाने को प्रेरित करती है, जो बीमारी लगने पर कारगर हो सके. वैज्ञानिकों ने पाया है कि भारी घातक होने के बावजूद एसएआरएस-कोव-2 वायरस एड्स जैसा पेचीदा नहीं है.

विकसित होने वाले सभी वैक्सीन के लिए उस प्रोटीन या मददगार तत्व को खोजकर हराना गेमचेंजर साबित होगा जो वायरस को मानव कोशिकाओं से जुडऩे और बढऩे में सहायक होता है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों में सहमति है कि अगर वैक्सीन आपको संक्रमण से बचाने के लिए काफी है तो यही बड़ी छलांग है. 

लगभग एक साथ कई वैक्सीन की आमद होने वाली है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के पास करीब 150 कोविड-19 वैक्सीन विकसित होने की खबर है, जिनमें तकरीबन 44 क्लिनिकल ट्रायल और 11 आखिर चरण के ट्रायल के दौर में हैं. भारत के अपने विकल्प के क्लिनिकल ट्रायल भी चल रहे हैं. मसलन, भारत बायोटेक की कोवैक्सीन और जाइडस कैडिला की जाइकोव-डी हैं.

इसके अलावा मॉडर्ना की एमआरएनए-1237 वैक्सीन, फाइजर की बीएनटी162बी2 वैक्सीन, रूस की स्पूतनिक वी वैक्सीन और ऐस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड है, जिसे भारत में सिरम इंस्टीट्यूट बनाएगा. मंजूरी की आस में ये सभी कंपनियां करोड़ों की तादाद में उत्पादन शुरू करने की तैयारी में हैं.

इन वैक्सीन की आमद से काफी उम्मीद और उत्सुकता जगी है लेकिन कई सवाल भी खड़े हुए हैं. जैसे, कितना सुरक्षित हैं ये? कितना कारगर होंगे ये? किसी वैक्सीन को नफा-नुक्सान के आकलन के बाद ही मंजूरी दी जाती है. वैक्सीन की फटाफट मंजूरी से संदेह जगा है क्योंकि सुरक्षित और कारगर वैक्सीन के विकास में अमूमन 6-10 साल लगते हैं; पोलियो वैक्सीन के विकास में 20 साल लगे.

हालांकि नई टेक्नोलॉजी और मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में नए अनुसंधानों से साल भर में वैक्सीन बनाना संभव हुआ है. एक ही शर्त है कि उसके फायदे जोखिम से अधिक होने चाहिए क्योंकि वैक्सीन स्वस्थ आदमी को दी जाती है. खासकर विकसित देशों में वैक्सीन के प्रति आशंकाएं कायम हैं. अमेरिका में ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक 30 फीसद लोग वैक्सीन में यकीन नहीं करते. इसलिए वैक्सीन लगवाना व्यक्तिगत पसंद का मामला है.

एक दूसरा पहलू यह है कि कोई वैक्सीन कितनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता दे सकती है और कितनी कारगर है. एफडीए के मुताबिक, 50 फीसद से ऊपर हो तो वैक्सीन कामयाब है. नए कोविड-19 वैक्सीन के कई निर्माता 90 फीसद तक कारगर होने की बात कहते हैं. लेकिन सवाल है कि वह लोगों में रोग के प्रति कितना प्रतिरोध विकसित कर पाती है. क्या उन्हें तब भी संक्रमण लगेगा? वैक्सीन का असर कितना रहेगा—छह महीने, साल भर?

इसके कई व्यावहारिक मसले हैं. 1.4 अरब आबादी वाले देश में कैसे वैक्सीन लगेगी? टीकाकरण का देश में वर्षों का अनुभव है, लेकिन पहली बार वयस्क लोगों को टीका लगाया जाएगा. कामयाब होता है तो टीकाकारण में नया आयाम जुड़ेगा.

हमें पता है कि स्वास्थ्यकर्मियों को पहले वैक्सीन मिलेगी. क्या अधिक जोखिम वाले 65 वर्ष से ऊपर के बुजुर्गों को भी मिलनी चाहिए? चिंताएं दूसरी भी हैं. खासकर नई वैक्सीन टेक्नोलॉजी के तहत उत्पादन इतने बड़े पैमाने पर पहले नहीं हुआ. हम नहीं जानते कि करोड़ों नग की आपूर्ति हो पाएगी.

हमारी आवरण कथा ‘कोविड-19 वैक्सीन: कितनी सुरक्षित? कितनी कारगर?’ इन पहलुओं की पड़ताल करती है. ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा वैक्सीन विज्ञान और उसके सुरक्षित तथा कारगर होने की कहानी बताते हैं. एसोसिएट एडिटर सोनाली अचार्जी पड़ताल करती हैं कि देश के सबसे बड़े वैक्सीन वितरण कार्यक्रम के इंतजामात कितने दुरुस्त हैं.

इसमें खुशखबरी यह है कि भारत दुनिया में बड़ा वैक्सीन निर्माता बनकर उभर रहा है. वैन्न्सीन उत्पादन से दवा क्षेत्र को ही ताकत नहीं मिलेगी, बल्कि सि‌रिंज और बोतल निर्माण के उद्योग को भी बल मिलेगा. उम्मीद है कि मौजूदा कार्यक्रम देश में स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च बढ़ाने के लिए जागरूकता भी पैदा करेगा. 

आइए, उम्मीद करें कि 2021 कोविड-19 के दु:स्वप्न को पीछे छोड़ देगा और बेहतर ‘नए हालात’ में हमें सिखाएगा कि जीवन में क्या महत्व का है और क्या नहीं.

 

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