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प्रधान संपादक की कलम से

भाजपा बिहार में बड़ी ताकत बनकर उभरी है. अपने सहयोगी से काफी ज्यादा सीटें उसे मिली हैं, हालांकि मुख्य फिलहाल जनता दल (यूनाइटेड) के ही होंगे.

4 नंवबर, 2020 का आवरण 4 नंवबर, 2020 का आवरण

अरुण पुरी

हमने तीन हफ्ते पहले पत्रिका के कवर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तस्वीर के साथ ‘सफलता का समीकरण’ शीर्षक लगाया तो लग रहा था बिहार का विधानसभा चुनाव एनडीए के लिए बेहद आसान होगा. लोकनीति-सीएसडीएस के जनमत सर्वेक्षण में सहज बहुमत का अनुमान लगाया गया था और नेताओं की इस अजेय जोड़ी—एक का राष्ट्रीय करिश्मा और दूसरे की स्थानीय पैठ बेजोड़ जो है—के सामने थे 31 वर्षीय तेजस्वी यादव जैसे अपेक्षाकृत नौसिखिए और उनके आनन-फानन बनाए गठजोड़ के सहयोगी. लिहाजा, नतीजे तय लग रहे थे. लेकिन, जैसा कि ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री हैरॉल्ड विल्सन ने कहा था, ''राजनीति में हफ्ता भर लंबा वक्त होता है.’’ बेशक, तीन हफ्ते तो एक युग के समान होंगे.

बिहार चुनाव में वही हुआ. धीमी शुरुआत के बाद तेजस्वी की दावेदारी में दम दिखने लगा. उन्होंने पिता लालू यादव की संदिग्ध विरासत को पीछे छोड़ा और रोजगार का मुद्दा उठाया, जो युवाओं की नब्ज छू गया. आखिर में उन्होंने बिहार चुनाव को ऐसे कांटे की टक्कर में बदल दिया, जैसा हाल के दौर में नहीं देखा गया था. फिर भी, अंत में राजनैतिक गणित ही प्रभावी साबित हुआ. सही दिशा में चुनाव-पूर्व गठबंधन का गणित मामूली बहुमत का आंकड़ा छू गया.

इस चुनाव के कई सबक हैं. इसने स्थापित कर दिया कि प्रधानमंत्री मोदी का करिश्मा कोविड महामारी और आर्थिक बदहाली से फीका नहीं पड़ा है. यह जन धन, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना और महामारी में गरीब परिवारों को हर महीने पांच किलो अनाज तथा एक किलो दाल वितरण जैसी केंद्रीय योजनाओं की भी कामयाबी का जनादेश है. महिला वोटरों की तादाद में इजाफा भी शायद भाजपा के हक में गया क्योंकि मोदी की योजनाओं से ज्यादा लाभान्वित वे ही हैं.

भाजपा बिहार में बड़ी ताकत बनकर उभरी है. अपने सहयोगी से काफी ज्यादा सीटें उसे मिली हैं, हालांकि मुख्य फिलहाल जनता दल (यूनाइटेड) के ही होंगे. भाजपा नीतीश कुमार की पार्टी के बिना सरकार नहीं बना सकती. उन्हें श्रेय जाता है कि वे राज्य में सातवीं बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे. लेकिन उनकी पार्टी सत्ता विरोधी लहर और पूर्व सहयोगी चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के कारण सीटें व वोट प्रतिशत गंवा बैठी. साथ ही, जद (यू) केवोट तो भाजपा उम्मीदवारों को मिले लेकिन इसका उलटा नहीं हुआ.

हाल के वर्षों में यह बिहार का पहला चुनाव था, जिसमें विकास और रोजगार के मुद्दे राज्य के ताकतवर जाति समीकरणों की तरह ही प्रभावी बने. बिहार के युवा मतदाताओं ने बड़ी संख्या में विपक्ष को वोट दिया, जिन्होंने नीतीश के अलावा दूसरे की सरकार नहीं देखी है. सो, नीतीश के लिए जरूरी है कि वे पार्टी का आधार महिलाओं और अति पिछड़ी जातियों से बढ़ाएं. वे पार्टी में गैर-मौजूद दूसरे नंबर का नेतृत्व भी विकसित करें, कई क्षेत्रीय पार्टियों की तरह उनकी पार्टी भी एक व्यक्ति का शो है, वरना यह भी उनके बाद बिखर जाएगी.

उन्हें चुनौती देने वाले महागठबंधन के मुखिया तेजस्वी तो देश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बनने से जरा भर चूक गए. उनके पिता लालू जब पहली बार 1990 में मुक्चयमंत्री बने थे तो तेजस्वी चार महीने के थे. चुनाव के चंद हफ्ते पहले तेजस्वी ने अपने पिता की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की कमान हाथ में ली और जोरदार राजनैतिक अभियान चलाया. उन्होंने अपने परिवार के विवादास्पद इतिहास से हटकर राज्य के युवाओं की आकांक्षाएं जगाने पर फोकस किया. उनकी कोशिशें बेजा नहीं गईं. राजद राज्य में सबसे बड़ी पार्टी है और तेजस्वी वर्तमान और भविष्य के नेता हैं.

इस बीच दिशाहीन कांग्रेस अपने वादों और प्रदर्शनों के बीच बढ़ती खाई में धंसी हुई है. वह अपने खाते की 70 में से महज 19 सीटें जीत कर महागठबंधन को घातक झटका दे गई. हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) को महागठबंधन से बाहर रखना भी महंगी गलती साबित हुई, जिससे मुस्लिम वोट बंट गया. एआइएमआइएम मूल्यवान पांच सीटें झटक ले गया. अगले साल पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु  और असम के चुनावों में हर कोई इन बदली जमीनी हकीकतों और नए किरदारों पर बारीक नजर रखेगा. 

हमारी आवरण कथा 'भगवा ताज’ इन चुनावी नतीजों का विश्लेषण करती है और पटना में अगली सरकार के लिए आगे की राह पर नजर डालती है. इसे सीनियर एसोसिएट एडिटर अमिताभ श्रीवास्तव ने लिखा है. नीतीश कुमार को देश में सबसे गरीब और सबसे कम औद्योगिकीकरण वाले राज्य में तेजस्वी के उठाए बेरोजगारी और विकास के मुद्दों पर गौर करना होगा.

उन्हें राज्य के 1.67 करोड़ युवाओं की आकांक्षाओं पर खरा उतरना होगा, जो 18 से 29 वर्ष उम्र के हैं. उन्हें हुनर विकास, स्वास्थ्य सेवा, महिलाओं, उद्यमियों के विकास, किसानों को सिंचाई की सुविधा और छात्र ऋण माफ करने के अपने चुनावी वादे भी पूरे करने होंगे. राज्य की प्रति व्यक्ति आय 2018-19 में 30,617 रु. से बढ़कर 2019-20 में 43,000 रु. तो हुई है लेकिन यह अभी भी राष्ट्रीय औसत की आधी से कम है. नीतीश को रोजगार देने और आमदनी बढ़ाने के लिए सेवा और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र पर फोकस करना होगा.

10 नवंबर के जनादेश ने टकराव की संभावना के बीज भी बो दिए हैं. नीतीश कुमार को बतौर मुख्यमंत्री अगले पांच साल कई चुनौतियों का सामना करना है. महज तीन सीट के बहुमत के कारण एनडीए को विकासशील इंसान पार्टी और हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (सेक्युलर) जैसे मनमौजी सहयोगियों पर निर्भर रहना होगा. इन दोनों के पास 4-4 सीटें हैं. नीतीश कुमार को बड़े भाई की तरह भाजपा के लंबे साए में भी रहना होगा, जो अब राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है.

भाजपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद के लिए समर्थन तो देगी मगर समीकरण काफी बदले हुए होंगे. भाजपा अब 33 में से 10 मंत्री पद पाकर शायद ही खुश रहे, जैसा कि पिछली सरकार में थी. ज्यादा मंत्री पद का मतलब है कि सरकार में उसकी ज्यादा चलेगी. अपनी सेकुलर छवि को लेकर सतर्क रहने वाले नीतीश कुमार हमेशा ही बिहार में हिंदुत्व की ताकतों पर अंकुश रखते रहे हैं. अब देखना होगा कि राज्य में दबदबे वाली पार्टी होने का मंसूबा पाल रही उत्साही भाजपा की आकांक्षाएं कैसे परवान चढ़ती हैं.

 

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