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प्रधान संपादक की कलम से

हमारी आवरण कथा 'गांव-गांव महामारी’ इसी चिंताजनक रुझान की पड़ताल करती है. इसे हमारे देश भर के ब्यूरो की रिपोर्ट के साथ एसोसिएट एडिटर सोनाली अचार्जी ने कलमबंद किया है.

आवरण कथा 22 जुलाई, 2020 आवरण कथा 22 जुलाई, 2020

अरुण पुरी

अचानक 24 मार्च की रात 8 बजे, देश में कोरोना महामारी के चलते दुनिया में सबसे सख्त लॉकडाउन लगाया गया. उस दिन देश में कोविड संक्रमण के 574 मामले थे और एक मौत दर्ज हुई थी. इसी के साथ, जैसा कि अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने कहा, ‘‘आपने अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप कर दी और तमाम लोगों को भटकने को छोड़ दिया, ताकि वायरस फैलता जाए...’’

लॉकडाउन के नफा-नुक्सान पर बहस अंतहीन है, लेकिन सब कुछ अटकलों और अनुमानों पर ही आधारित है. जीवन और आजीविका में से एक को चुनना और आसन्न महामारी से जूझने के लिए मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्टर तैयार करने की मोहलत निकालना कोई आसान नहीं था. इसके अलावा, सरकार लाखों की संख्या में शहरी मजदूरों के अपने गांव-घर लौट जाने का न अंदाजा लगा पाई, न उसकी कोई योजना बना पाई, जिसके नतीजे अब हमें भुगतने पड़ रहे हैं.

7 सितंबर को भारत कोविड-19 संक्रमण के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर का देश बन गया और ब्राजील पीछे छूट गया. 10 सितंबर को कोविड संक्रमण से मौत के मामले में 75,062 आंकड़े के साथ दुनिया में तीसरे स्थान पर था. 10 सितंबर तक देश में संक्रमण के कुल मामले 45 लाख पर पहुंच गए.

हमारे यहां संक्रमण की दर तीन महीने पहले 4 फीसद से दोगुनी बढ़कर 8.6 फीसद हो गई है. पिछले हफ्ते हमारे यहां हर रोज औसतन संक्रमण के 89,000 मामले जुड़े. उम्मीद की बेहद पतली-सी किरण बस यह है कि संक्रमण से मृत्यु दर सिर्फ 1.7 फीसद है, जिससे बीमारी की गंभीरता का पता लगता है. 9 सितंबर को हमारे यहां ठीक होने की दर 77.7 फीसद दुनिया भर में बेहतर थी. 

लॉकडाउन शुरू हुआ तो कोविड बड़े शहरों तक सीमित था. हाल तक संक्रमण के आधे मामले मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, चेन्नै, पुणे और कोलकाता में थे. हालांकि हमारे लिए सबसे चिंताजनक ग्रामीण इलाकों में कोविड संक्रमण का बढ़ता ग्राफ है. 1 मार्च से 17 जुलाई तक ग्रामीण और अर्द्ध ग्रामीण जिलों में संक्रमण के मामले 40 फीसद थे, जो अब बढ़कर 67 फीसद हो गए हैं.

जिलों के बीच आवाजाही शुरू होने से राज्यों के ग्रामीण इलाकों में कोविड-19 के मामले छलांग मार रहे हैं. मसलन, ओडिशा में फिलहाल ग्रामीण संक्रमण 59 फीसद, झारखंड में 41 फीसद, छत्तीसगढ़ में 37 फीसद और बिहार में 40 फीसद है. महाराष्ट्र स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के पांच जिलों नागपुर, उस्मानाबाद, बीड, सांगली और कोल्हापुर में अगस्त में संक्रमण में औसत वृद्धि 400 फीसद तक रही, जबकि मुंबई में यह 28 फीसद ही थी.

ये आंकड़े डरावने हैं क्योंकि देश की खस्ताहाल स्वास्थ्य-तंत्र का सबसे बुरा हाल ग्रामीण इलाकों में ही है. देश के गांवों में तकरीबन 65 फीसद आबादी बसती है, लेकिन सिर्फ 37 फीसद ही डॉक्टर वहां हैं. गांवों में इलाज के बुनियादी तंत्र प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्टाफ की भारी कमी है.

करीब 2,000 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में तो डॉक्टर ही नहीं हैं. गांवों में प्रति 10,000 व्यक्ति पर सिर्फ 3.2 अस्पताली बिस्तर हैं जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का बुनियादी मानक हर 300 लोगों पर 1 बिस्तर का है. देश के कई ग्रामीण इलाकों के हमारे अध्ययन में पुणे जिले के राजेवाड़ी गांव में महज तीन हफ्ते में संक्रमण के मामले शून्य से 91 हो गए और संक्रमण की 25 फीसद की दर राष्ट्रीय औसत से तीन गुना है.

यहां सबसे करीब का कोविड अस्पताल 50 किमी दूर पुणे में है. संक्रमण दोगुना होने की मौजूदा दर केमद्देनजर अनुमान है कि इस महीने जिले में 2,000 ऑक्सीजन वाले बिस्तरों और 350 वेंटिलेटर की कमी है. पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में वहां के एक करोड़ लोगों के लिए सिर्फ एक रेफरल अस्पताल है जबकि वहां संक्रमण के मामले राज्य में दूसरे नंबर पर 33,800 हैं.

हमारे ग्रामीण इलाकों में संक्रमण में तेज इजाफा दिख रहा है, ऐसे में हमारे नीति-नियंताओं को दो मोर्चों पर जूझना पड़ रहा है. जिन कई राज्यों में संक्रमण दर काफी कम थी, अब उनमें तेजी दिख रही है, और जहां बीमारी को खत्म होता माना जा रहा था, वहां नए सिरे से संक्रमण में तेजी दिख रही है.

अगस्त महीने तक सबसे ज्यादा कुल संक्रमण के मामले वाले राज्य कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम थे. दिल्ली, केरल, गोवा, नगालैंड और मध्य प्रदेश जैसे जो राज्य संक्रमण का ग्राफ नीचे होने का दावा कर रहे थे, वहां फिर तेज इजाफा होने लगा है. 

जानकारों का मानना है कि जिलों में आवाजाही शुरू होने और शहरों में लॉकडाउन में ढील दिए जाने से सही कदम नहीं उठाए गए तो संक्रमण दूर-दराज के इलाकों तक फैल जाएगा. फिर, आर्थिक गतिविधियां शुरू होने से शहरी इलाकों में लोग लौटने लगे हैं, इससे भी बीमारी केफैलने की आशंका बढ़ गई है.

स्वास्थ्य विशेषज्ञ हमें बताते हैं कि गांवों में महामारी फैली तो उससे निपटना शहरों के मुकाबले अधिक चुनौतीपूर्ण होगा. हमारी आवरण कथा 'गांव-गांव महामारी’ इसी चिंताजनक रुझान की पड़ताल करती है. इसे हमारे देश भर के ब्यूरो की रिपोर्ट के साथ एसोसिएट एडिटर सोनाली अचार्जी ने कलमबंद किया है. आश्चर्य यह है कि कोविड के मामलों में इजाफा व्यापक चिंता नहीं पैदा कर रहा है.

राज्य ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र को तेजी से दुरुस्त नहीं कर सकते, इसलिए रोक-टोक का तरीका अपना रहे हैं. कोविड-19 अब जिंदगी की ऐसी हकीकत बन गई है, जिसके मुताबिक हर किसी को ढलना होगा. देश अब अपनी अर्थव्यवस्था को बंद करना नहीं झेल सकता, खासकर जब सकारात्मक संकेत मिलने लगे हैं. जरूरत है टेस्टिंग में इजाफे और जन जागरूकता फैलाने की, ताकि वायरस का प्रसार रुके. इलाज से परहेज बेहतर होता है, खासकर जब इलाज कहीं नजर न आए तो और भी ज्यादा.

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