scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

विधानसभा चुनाव 2022ः आपदा में खोज लिया अवसर

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कहीं भी लड़ाई में नहीं है. ऐसे समय में जहां जाति का नशा सिर चढ़कर बोल रहा हो, वह 40 फीसद सीटें महिलाओं को देकर राजनीति को नारी केंद्रित बनाते हुए आपदा में अवसर तलाश रही

X
मिलना है जरूरी प्रियंका गांधी दिसंबर 2021 में फिरोजाबाद में एक शक्ति संवाद कार्यक्रम में मिलना है जरूरी प्रियंका गांधी दिसंबर 2021 में फिरोजाबाद में एक शक्ति संवाद कार्यक्रम में

प्रशांत श्रीवास्तव

किसी चुनावी लड़ाई में पहले ही फैसला दे देना कभी अच्छा नहीं होता. लेकिन खुली आंखों से देखें तो मैदान में दो ही खिलाड़ी दिख रहे हैं: सत्तारूढ़ भाजपा और हाल ही में ऊर्जावान हुई समाजवादी पार्टी.बिसात के छोटे-छोटे मोहरे इन्हीं दोनों के इर्द-गिर्द जमा हैं. दोतरफा हुए इस खेल ने जाहिर तौर पर मायावती की बहुजन समाज पार्टी के लिए भी कोई खास जगह नहीं छोड़ी है. तो फिर उत्तर प्रदेश में तीन दशकों से ज्यादा समय तक गिनती से बाहर रही कांग्रेस की क्या बिसात? पर प्रियंका गांधी अपने को प्रासंगिक बनाने की इस पुरातन पार्टी की बेताब कोशिशों की अगुआई कर रही हैं. इसमें उन्होंने अनुर्वर हो चुकी मिट्टी में एक नई फसल बोकर बुरे वक्त में नई राह निकालने की कोशिश की है.

ऐसे समय में जब हर कोई जाति की बात कर रहा हो, वे इस बहस को महिलाओं की एकदम दूसरी ही धुरी पर ले जाने की कोशिश में हैं. उत्तर प्रदेश में पार्टी की 40 फीसद उम्मीदवार महिलाएं होंगी. यह अच्छी-संख्या है, यहां तक कि महिला आरक्षण विधेयक में भी महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों की ही मांग की गई थी. इस बड़े पैमाने पर भारतीय राजनीति में नारीकरण की कोशिश हैरत में डालने वाला दांव है. उत्तर प्रदेश की प्रभारी कांग्रेस महासचिव अभी भी गहराई में तैरना सीख रही हैं लेकिन उन्हें इस हिसाब में गलत नहीं ठहराया जा सकता. उत्तर प्रदेश में महिलाओं की आबादी 46 फीसद से ज्यादा है. पर क्या उन्हें महिला की अपनी पहचान को ध्यान में रखकर वोट डालने के लिए मनाया जा सकता है? क्या महिलाएं धर्म, जाति और विचारधारा जैसी बातों को एक ओर रखकर वोट डालेंगी?

इस बार की फसल बेशक कमजोर उपजेगी, लेकिन प्रियंका को यकीन है और वे जोर देकर कहती हैं कि ऐसे प्रश्न भविष्य को ध्यान में रखकर पूछे जाने चाहिए (देखें बातचीत). तर्क सोने-सा खरा है. पार्टियों ने अक्सर महिला मतदाताओं का दोहन किया है—लेकिन चतुराई भरी नारों वाली सियासत से. कभी शराबबंदी जैसी 'महिला-समर्थक' नीतियों तो कभी यूं ही किसी नारे से. उन्हें सीधे सशक्त करने की भाषा किसी ने ज्यादा नहीं बोली.

यही तो प्रियंका की डिक्शनरी का जुमला है. और इसके लिए अच्छी-खासी जगह है. भारत की कुछ महिला राजनेताओं को राजनीति विरासत में मिली है—प्रियंका खुद इसकी मिसाल हैं. इसमें आई कई महिलाएं अगर सियासी खानदान में पैदा नहीं हुईं तो ब्याह कर आई हैं. और हर पार्टी में ऐसे सेलेब्रिटी चेहरे हैं. इसके उलट, कांग्रेस की 125 उम्मीदवारों की पहली सूची में शामिल 50 महिलाओं में बलात्कार पीडि़ता की मां, सीएएए विरोधी आंदोलन के दौरान कोई तीन हफ्ते जेल में रही एक एक्टिविस्ट, एक आशा कार्यकर्ता जिसने अपने बहुत कम वेतन के चलते मानदेय में वृद्धि के लिए आंदोलन किया, और एक जिला स्तर की नेता जिसका स्थानीय चुनावों के दौरान यौन उत्पीड़न किया गया था. इन नामों को क्रमवार याद कीजिए: आशा सिंह उन्नाव से, लखनऊ की सदफ जफर, शाहजहांपुर से पूनम पांडे और रितु सिंह लखीमपुर खीरी से. असली औरतें, धरती की बेटियां जिनके हिस्से एक हिंसक समाज में आधा आसमान है. इस फेहरिस्त में और भी नाम हैं, न्यूज एंकर निदा अहमद, मेरठ में जन्मी अभिनेत्री अर्चना गौतम और पार्टी की अपने कार्यकर्ताओं में पंखुड़ी पाठक, उपाध्यक्ष (सोशल मीडिया) और महिला कांग्रेस नेता ममता चौधरी, शमीना शफीक और शेहला अरहरी.

कांग्रेस ने महिलाओं के लिए एक अलग घोषणापत्र भी जारी किया है, जिसमें सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 40 फीसद आरक्षण का वादा किया गया है, इसके अलावा छात्राओं के लिए बहुत-सी मुक्रत सुविधाएं, जो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आजमाने के बाद लगभग हर किसी ने कामयाबी से अपनाया है. इसमें एक मुफ्त साइकिल को अपग्रेड करके मुफ्त स्कूटी बना दीजिए और एक मोबाइल फोन, जो ग्रामीण भारत में युवतियों के लिए स्वतंत्रता का प्रतीक है.

बातें तो बहुत अच्छी हैं इसमें लेकिन खब्त से भरे और सख्त सियासी मिज़ाज वाले उत्तर प्रदेश में इसे कौन मानेगा? एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता कहते हैं, ''यहां हमारे पास महज एक सांसद और सात विधायक हैं. हमारे पास खोने को कुछ नहीं, पाने को बहुत कुछ है.'' प्रियंका की टीम के एक अहम सदस्य कहते हैं, ''2017 में हमारा वोट शेयर 6.25 फीसद था. अब हमने आधी आबादी के इर्द-गिर्द एक समांतर नैरेटिव खड़ा कर दिया है. अगर हम आंशिक तौर पर भी उन्हें आकर्षित करने में कामयाब हुए, तो हम लगभग हर विधानसभा क्षेत्र में खुद को स्थापित कर पाएंगे जो पिछले कई बरसों में नहीं कर पाए हैं.'' वे कहते हैं, ''हमने यूपी की 403 सीटों को तीन वर्गों में बांट दिया है—एक वे जहां विधायक हमारे हैं या जहां हम 2012 या 2007 में जीते थे; दूसरे में वे सीटें जहां 2017 और 2012 में हम उप-विजेता रहे थे, और तीसरे में वे सीटें जहां हम नवागंतुकों को टिकट दे सकते हैं. पर हम किसी योग्य पुरुष उम्मीदवार का टिकट काटकर ऐसा नहीं कर रहे.''

यह सब उठ खड़े होने के सीधे आह्वान के साथ होता है. ''लड़की हूं, लड़ सकती हूं'' जैसे ध्येय वाक्य का जन्म प्रियंका के उन्नाव बलात्कार पीडि़ता से मिलने के बाद हुआ था, जिसने कहा था कि दरिंदों के खिलाफ अपनी लड़ाई में वह कभी हिम्मत नहीं हारेगी. उसके बाद प्रियंका ने अन्य पीड़ित परिवारों, कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ जुड़ने का फैसला किया, और उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया गया. उम्मीदवारों में भी यह जज्बा दिखता है. लखनऊ (सेंट्रल) से टिकट पाने वाली सदफ कहती हैं, ''प्रियंका जी हम जैसी बहुत-सी महिलाओं से मिली हैं जिन्होंने असली संघर्ष झेला है. मेरे जेल में रहते हुए मुझे पीटा गया, धमकी दी गई, तब वे मेरे समर्थन में आगे आईं. कानूनी मसलों पर उनकी टीम ने मेरी मदद की.'' राजनाथ सिंह के मौजूदा विधायक पुत्र पंकज सिंह के खिलाफ नोएडा से टिकट पाने वाली पंखुड़ी पाठक कहती हैं, ''भाजपा वाले इसे सुरक्षित सीट मान रहे हैं...सपा-बसपा यहां कभी मजबूत उम्मीदवार नहीं उतारेंगी. अब एक लड़की उन्हें चुनौती देगी. यह बात खासा आत्मविश्वास भरती है.''

अध्येताओं का मानना है कि कांग्रेस की इस पहल का सकारात्मक प्रभाव सब ओर पड़ेगा. एएमयू में एडवांस्ड सेंटर फॉर वूमेन स्टडीज की डॉ. तरुशिखा सर्वेश कहती हैं, ''पहले पार्टियां सांकेतिक प्रतिनिधित्व देती थीं. यह पहल महिलाओं के बारे में समाज की सोच को बदलने की आशा पैदा करती है. यह भविष्य में अन्य दलों को भी प्रभावित करेगी.'' लखनऊ में गिरि इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज की डॉ. शिल्पशिखा सिंह भी इससे सहमत हैं, ''यह यूपी से परे भी सियासी विमर्श को बदल सकता है. इससे कांग्रेस को सीटों का बहुत लाभ भले न हो पर वोट शेयर बेशक बढ़ेगा.'' प्रियंका की टीम के एक सदस्य इसे इस प्रकार कहते हैं, ''मोदी ने एक बार महिलाओं को भाजपा का मूक मतदाता कहा था. हम उम्मीद करते हैं कि वे हमारी मुखर मतदाता बनें.''

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें