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विपक्षः गठबंधन का तानाबाना

अपने तीसरे कार्यकाल में व्यवस्थित हो जाने के बाद ममता बनर्जी ने सबसे पहले प्रशांत किशोर को विपक्षी दलों को एक छतरी के नीचे लाने के काम में जुटा दिया

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एक और कोशिश कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी से मिलने के बाद बाहर निकलतीं ममता बनर्जी एक और कोशिश कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी से मिलने के बाद बाहर निकलतीं ममता बनर्जी

ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की तस्वीर के साथ एक ट्वीट 25 जुलाई को कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से किया गया. इसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की चर्चित टिप्पणी 'आप क्रोनोलॉजी समझिए' को टेक की तरह दोहराते हुए एक छोटी-सी कैफियत थी. जाहिर तौर पर शाह ने विपक्ष पर संसद ठप करने की साजिश का आरोप लगाया था. लेकिन इस ट्वीट में उन्हीं की टिप्पणी का इस्तेमाल करते हुए आरोप लगाया गया कि तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव 2021 के बंगाल चुनाव के दौरान पेगासस स्पाइवेयर का शिकार हुए. ट्वीट के लिए चुना गया वक्त भी कोई इत्तफाक नहीं था. साल 2024 में भाजपा से निपटने के लिए संभावित रणनीति पर विपक्ष के नेताओं के साथ बातचीत करने के लिए ममता अगले दिन राष्ट्रीय राजधानी के पांच दिनों के दौरे पर आ रही थीं.

ममता ने 28 जुलाई की शाम सोनिया गांधी से मुलाकात की, जिसे उन्होंने 'चाय पे चर्चा' कहा और इस तरह अपने सियासी विरोधी पर निशाना साधा. बाद में रिपोर्टरों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि 'होप 24' की खातिर मोदी-विरोधी गठबंधन का तानाबाना बुनने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष भी बराबर उत्सुक हैं. होप 24, यानी '24 की उम्मीद, अगले आम चुनाव को ममता का दिया उपनाम है. उन्होंने कहा, ''हमने 'अच्छे दिन' बहुत देख लिए, अब हम 'सच्चे दिन' देखना चाहते हैं.''

कांग्रेस, टीएमसी और दूसरी समानधर्मा पार्टियों ने पहले भी भाजपा की प्रचंड ताकत का मुकाबला करने के लिए मजबूत राष्ट्रीय विपक्ष की जरूरत को लेकर काफी हो-हल्ला मचाया है. खासकर तब तो और भी जब भाजपा ने सत्ता हथियाने के लिए तीन-तिकड़म से गुरेज नहीं किया. तो इस बार क्या फर्क है? अपने राज्य में विभिन्न चुनौतियों के बावजूद अपनी सत्ता को बचाने के बाद ममता इस ओर बढ़ी हैं. इस प्रक्रिया में उन्होंने दिखा दिया है कि उनमें मोदी की भाजपा को चुनौती देने की हिम्मत है. इस बार इस जमावड़े में कुछ और अहम खिलाड़ी भी आ जुटे हैं. मसलन, चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) जिन्होंने बंगाल में ममता की जीत में उनकी मदद की. किशोर देश भर के विपक्षी नेताओं से मुलाकात में व्यस्त हैं. वे एनसीपी के दिग्गज नेता शरद पवार से भी मिले. साल 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए विपक्षी ताकतों को एकजुट करने की कोशिश में पवार भी सक्रिय हैं.

इस बीच 28 जुलाई को दिल्ली स्थित बंग भवन में विपक्षी नेताओं की बैठक का ममता का बड़ा मनसूबा भले परवान न चढ़ सका, पर अलग-अलग कई नेता उनसे मिलने आए. इनमें कांग्रेस के कमलनाथ और आनंद शर्मा भी थे. वे आप प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी मिलीं और संजय राउत (शिवसेना) तथा अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी) के साथ भी उनकी मुलाकात तय हैं.

हालांकि कई पर्यवेक्षक अभी इस बात से सहमत नहीं होंगे कि यह सारा शुरुआती उत्साह वाकई भाजपा के लिए वास्तविक खतरे में तब्दील हो पाएगा. समाज विज्ञानी और प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस प्रशांत रे कहते हैं, ''मैं कुछ पकता हुआ देख सकता हूं और दोनों पार्टियां साझा लक्ष्य (मोदी की हुकूमत का खात्मा) की तलाश में अपने मतभेद छोड़ने को राजी दिखाई देती हैं.'' वे ध्यान दिलाते हैं कि इससे पहले कांग्रेस कभी-भी अपने दंभ और गुरूर के घोड़े से नीचे नहीं उतरी थी और किसी दूसरी पार्टी के नेता का नाम सामने नहीं रखा था.

कुछ पक रहा है

इससे पहले 13 जुलाई को दिल्ली में जब किशोर राहुल गांधी के घर गए और उनके, प्रियंका तथा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के.सी. वेणुगोपाल और हरीश रावत (पंजाब मामलों के प्रभारी) के साथ लंबी बैठक की, तो दिल्ली में कानाफूसी शुरू हो गई. नतीजा यह हुआ कि पी. चिदंबरम और दिग्विजय सिंह सरीखे शीर्ष कांग्रेसी नेता 21 जुलाई को दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में टीएमसी की सालाना शहीद दिवस रैली में दिखाई दिए. इस रैली को ममता ने वर्चुअल माध्यम से संबोधित किया और इसमें मौजूद दूसरे नेताओं में पवार और सुप्रिया सुले (राकांपा), राम गोपाल यादव (सपा), मनोज झा (राजद), तिरुचि शिवा (द्रमुक) और प्रियंका चतुर्वेदी (शिवसेना) भी थे. ममता ने कांग्रेस आलाकमान का आभार जताने में जरा देर नहीं की और साल के आखिर में बंगाल में विपक्ष की महारैली का न्यौता भी फटाफट भेज दिया.

एक महीने पहले टीएमसी ने बंगाल में एक नए नारे का आगाज किया था, 'भारत निजेर मेके चाय (भारत अपनी बेटी चाहता है)'. यह 'बंगाल निजेर मेके चाय (बंगाल अपनी बेटी चाहता है)' नारे का ही तार्किक विस्तार था, जिसने महज कुछ महीनों पहले इतनी जबरदस्त जीत दिलाई थी. टीएमसी संभावनाएं टटोलती नजर आ रही है, क्योंकि जल्द ही सोशल मीडिया पर #बंगाली प्राइममिनिस्टर घूमने लगा. मगर दिल्ली आते ही ममता ने अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की तमाम अफवाहों को किनारे लगा दिया. सोनिया गांधी के साथ मुलाकात के बाद उनसे पूछा गया कि अगर विपक्ष का पचमेल गठबंधन बन भी गया तो उसकी अगुआई कौन करेगा. उन्होंने दो-टूक जवाब दिया, ''मुझे कोई परेशानी नहीं है अगर कोई दूसरा भी नेतृत्व करता है. जब इस पर बात होगी, हम फैसला कर सकते हैं. मैं किसी पर कुछ थोप नहीं सकती हूं.''

बंगाल का चुनाव हाल का बहुत बारीकी से देखा-परखा गया चुनावी मुकाबला था. कई सारे नेताओं—जिनमें पवार, राजद के नेता तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, केजरीवाल, द्रमुक के एम.के. स्टालिन शामिल थे—ने न केवल इसमें गहरी दिलचस्पी ली बल्कि चुनाव आयोग के कथित 'मनमानेपन' के खिलाफ ममता के साथ डटकर खड़े रहे. इन सभी ने जीत के बाद ममता की खूब तारीफ की.

टीएमसी के अंदरूनी जानकारों का कहना है कि मोदी-शाह के नेतृत्व में भाजपा जब ममता की सरकार और पार्टी के खिलाफ आक्रामक चुनाव अभियान चला रहा था, तो पवार ने उन्हें बहुत ढाढस बंधाकर शांत किया और उनका मार्गदर्शन किया था. आज, वाम मोर्चे सरीखे पुराने दुश्मन भी ममता के साथ काम करने को राजी हैं. मई में सीबीआइ के हाथों तीन टीएमसी नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ बोलते हुए माकपा के वरिष्ठ नेता विमान बोस ने ऐसा कहा भी.

जीत का फॉर्मूला

अपने तीसरे कार्यकाल में रचने-बसने के बाद ममता का पहला कदम यह था कि उन्होंने किशोर को विपक्षी दलों को एक छतरी के नीचे लाने के काम में लगा दिया. बताया जाता है कि पवार और भाजपा के पूर्व नेता यशवंत सिन्हा, जो अब टीएमसी में आ गए हैं, इसमें उनकी मदद कर रहे हैं. सिन्हा कहते हैं, ''हम सबसे अच्छे को अच्छे का दुश्मन नहीं बनने दे सकते. एक बात साफ है कि कांग्रेस के बिना कोई प्रभावी विपक्षी गठबंधन नहीं बन सकता है.'' हो सकता है, राहुल और प्रियंका गांधी के साथ किशोर की हालिया मेल-मुलाकात ने भी धुंध छांटने में मदद की है. मगर इस बीच बेसुरे राग भी कायम हैं. यहां तक कि ममता जब दिल्ली में थीं, राहुल गांधी ने सदन में विपक्ष की संयुक्त रणनीति तय करने के लिए संसद में बैठक बुलाई. उस बैठक में चौदह पार्टियों के प्रतिनिधि मौजूद थे, लेकिन टीएमसी का कोई नुमाइंदा उनमें नहीं था.

अभी तक ममता का फॉर्मूला सीधा-सादा है और यह वही है जो उन्होंने बहुत पहले जनवरी 2019 में आम चुनावों से भी पहले विपक्ष की महारैली में सामने रखा था. जिन जगहों पर कांग्रेस या तो सत्ता में है या भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी है, वहां गठबंधन के दूसरे दलों को मिलकर अपना समर्थन कांग्रेस को देना चाहिए. मगर जिन राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा को चुनौती देने की मजबूत स्थिति में हैं, वहां कांग्रेस को उनके लिए मैदान खुला छोड़ देना चाहिए. उस वक्त सार्वजनिक तमाशे के अलावा, यह परवान नहीं चढ़ पाया.

इस बार पवार और सिन्हा सरीखे दिग्गज नेता अलग-अलग सियासी पार्टियों और असमान विचारधाराओं को जोडऩे के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम (सीएमपी) पर काम कर रहे हैं. विवादास्पद कृषि कानून, पेगासस जासूसी मामला, महंगाई, तेल की कीमत और बेरोजगारी कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें संसद में भाजपा पर दबाव डालने के लिए सीएमपी के हिस्से के तौर पर उठाया जा सकता है. अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह कसरत कितनी दूर तक जाती है, लेकिन अगर यह क्षेत्रीय पार्टियां एकजुट हो गईं तो तो भाजपा को 2024 में जोरदार टक्कर मिल सकती है.

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