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ब्लैक फंगसः नई महामारी से लड़ने की चुनौती

जिन मरीजों की प्रतिरोधी क्षमता कमजोर है या जिनके इलाज में स्टेरॉयड का इस्तेमाल हुआ है, उनका इलाज बहुत स्वच्छ चिकित्सा इंतजामों में किए जाने की आवश्यकता होती है

भारी पीड़ा जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में 21 मई को ब्लैक फंगस के मरीज के साथ तीमारदार भारी पीड़ा जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में 21 मई को ब्लैक फंगस के मरीज के साथ तीमारदार

सोनाली आचार्जी

अप्रैल के अंत में, 27 वर्षीया शालू राणे के माता-पिता इससे बहुत खुश थे कि कोविड-19 से गंभीर रूप से ग्रस्त उनकी बेटी ने अंतत: बीमारी को मात दे दी है और वह पूरी तरह उबर चुकी हैं. राणे एक हफ्ते तक मुंबई के सायन अस्पताल में भर्ती थीं. हालांकि, दो हफ्ते बाद परिवार को तब एक बड़ा सदमा लगा जब राणे की आंख की आपातकालीन सर्जरी करनी पड़ी. तीन घंटे तक चली सर्जरी में उनकी आंख निकालनी पड़ी क्योंकि म्यूकरमायकोसिस जिस तेजी से फैल रहा था, उससे मस्तिष्क के ऊतकों पर असर पड़ने का खतरा पैदा हो गया था और इससे उनकी मृत्यु भी हो सकती थी.

दिल्ली स्थित साकेत मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में ईएनटी के प्रमुख निदेशक डॉ. संजय सचदेवा कहते हैं, ''म्यूकरमायकोसिस को सबसे घातक कवक (फन्जाइ) में से एक माना जाता है जो मनुष्यों को प्रभावित करता है. यह एक आक्रामक प्रजाति है जो नाक, साइनस से मस्तिष्क के ऊतकों तक फैलकर रक्त वाहिकाओं और आंख के क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है. इसके कारण गैंगरीन हो जाता है और प्रभावित हिस्सा काला पड़ जाता है. इसलिए इसका नाम 'ब्लैक फंगस' पड़ा. जब यह पहली बार दिखाई देता है तो नाक, गाल या माथे के आस-पास के हिस्से काले पड़ने लगते हैं.''

भारत में अब तक कोविड से ठीक हुए लगभग 9,000 रोगियों में म्यूकरमायकोसिस के मामले सामने आए हैं. इसमें अचानक वृद्धि हुई है जैसे, इंदौर के महाराजा यशवंतराव अस्पताल में मई के मध्य में एक सप्ताह के भीतर रोगियों की संख्या बढ़कर 180 हो गई; अकेले मुंबई के सायन अस्पताल में दो महीने में 24 मामले दर्ज किए जबकि साल में औसतन छह मामले ही सामने आते थे. ब्लैक फंगस के देश के आधे से अधिक मामले गुजरात और महाराष्ट्र में दर्ज किए गए हैं. कोविड के लिए गठित राष्ट्रीय टास्क फोर्स ने राज्य सरकारों को कहा है कि वे संक्रमण को तत्काल नियंत्रित करें. 24 मई तक तमिलनाडु, गुजरात, ओडिशा, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, तेलंगाना और चंडीगढ़ ने इसे महामारी घोषित कर दिया था.

क्यों इतना घातक माना जाता है ब्लैक फंगस
क्यों इतना घातक माना जाता है ब्लैक फंगस

मुंबई के मुलुंड स्थित फोर्टिस अस्पताल में सीनियर कंसल्टेंट एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. श्वेता बुदयाल कहती हैं, ''यह दस लाख लोगों में से केवल एक को संक्रमित कर सकता है, लेकिन इसके कारण मृत्यु दर बहुत उच्च, लगभग 50 प्रतिशत है. कई प्रमुख संकेतक हैं जिनसे म्यूकरमायकोसिस के संक्रमण का इशारा मिल सकता है. इनमें से एक तो यह है कि रक्त वाहिकाओं में फन्जाइ के प्रवेश के फलस्वरूप रक्त के थक्के बनने लगते हैं और उसके आसपास के ऊतक नष्ट हो जाते हैं. इस तरह रक्त की आपूर्ति में बाधा आने से मौत भी हो सकती है.

लक्षणों में आंखों के पीछे एक ओर सिरदर्द, चेहरे में दर्द, बुखार, नाक जाम रहना और बाद में नाक से काले पदार्थ का स्राव और आंखों की सूजन के साथ तीव्र साइनसाइटिस शामिल हैं. संक्रमण के प्रारंभिक चरण में प्रभावित त्वचा अपेक्षाकृत सामान्य दिखाई दे सकती है लेकिन जल्द ही यह लाल होने लगती है, इसके बाद सूजन हो जाती है. अंत में ऊतकों के नष्ट होने के कारण काली पड़ने लगती है.'' म्यूकरमायकोसिस के अन्य प्रकार फेफड़े, त्वचा या पूरे शरीर में भी फैल सकते हैं. इनके लक्षणों में भी सांस लेने में कठिनाई और लगातार खांसी शामिल हैं. ऊतकों के नष्ट होने के मामलों में, मतली और उल्टी हो सकती है, खांसी के साथ खून आने और पेट में दर्द की शिकायत हो सकती है.

डॉक्टरों का कहना है कि कोविड मरीजों के ठीक होने के 12 से 18 दिनों बाद ब्लैक फंगस के संक्रमण के लक्षण उभर रहे हैं. डॉ. सचदेवा कहते हैं, ''ब्लैक फंगस रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करता है, प्रभावित क्षेत्र में रक्त प्रवाह को रोकता है. फिर ऊतकों का नष्ट होना और गैंगरीन तक हो सकता है. ऐंटी-फंगल दवा मृत या नष्ट हो चुके उत्तकों तक नहीं पहुंच सकती है, जहां संक्रमण मौजूद हो सकता है. उस हिस्से को सर्जरी से हटाना चाहिए इसलिए ब्लैक फंगस के उपचार में मरीजों को ऐंटी-फंगल दवाएं देने के साथ संक्रमित क्षेत्र से मृत ऊतकों को हटाना भी शामिल है.'' यह एक वजह है कि ब्लैक फंगस के रोगियों के शरीर से सभी संक्रमित ऊतक हटाने के लिए अंतत: उनकी आंखें निकालनी पड़ती हैं. डॉक्टरों का कहना है कि संक्रमण की देर से पहचान और इलाज में देरी, घातक साबित होती है.

नेशनल टास्क फोर्स के अध्यक्ष डॉ. वी.के. पॉल ''कोविड उपचार में स्टेरॉयड के जरूरत से ज्यादा उपयोग'' को भी म्यूकरमायकोसिस महामारी के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं. हालांकि स्टेरॉयड कोविड के कारण फेफड़ों में आई सूजन को कम करते हैं और जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस से लड़ती है तो उसके कारण होने वाले नुक्सान को कुछ कम करते हैं, लेकिन वे प्रतिरक्षा शक्ति को भी कम कर देते हैं और मधुमेह और गैर-मधुमेह दोनों कोविड रोगियों में ब्लड शुगर का स्तर बढ़ा देते हैं. चार भारतीय डॉक्टरों—मुंबई के लीलावती अस्पताल के शशांक जोशी, कोलकाता के जीडी हॉस्पिटल ऐंड डायबिटिक इंस्टीट्यूट के अवधेश कुमार सिंह और ऋतु सिंह तथा नई दिल्ली के नेशनल डायबिटीज, ओबेसिटी ऐंड कोलेस्ट्रॉल फाउंडेशन के अनूप मिश्रा का ब्लैक फंगस पर अध्ययन जल्द ही एल्सेवियर पत्रिका में प्रकाशित होगा. यह अध्ययन 100 से अधिक ऐसे कोविड रोगियों पर किया गया जिन्हें म्यूकरमायकोसिस हुआ था. उनमें से तिरासी को मधुमेह था.

डॉ. बुदयाल कहती हैं, ''मधुमेह पीड़ितों और जिनकी रोग प्रतिरक्षा शक्ति बहुत कमजोर है, उनके इस संक्रमण के चपेट में आने की आशंका अधिक है. देश भर के मधुमेह विशेषज्ञ कोविड-19 के दौरान म्यूकरमायकोसिस के बढ़ते प्रसार के प्रति आगाह कर रहे हैं और मधुमेह रोगियों से शुगर लेवल नियंत्रण में रखने को कह रहे हैं. कोविड के मामलों के इलाज के लिए स्टेरॉयड का उपयोग न केवल शर्करा के स्तर को बढ़ाता है, बल्कि शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण मधुमेह रोगियों को अधिक जोखिम में डालता है.''

वैसे, म्यूकरमायकोसिस न तो कोई नई बीमारी है और न ही यह केवल स्टेरॉयड के उपयोग से जुड़ी हुई है. मेडिकल जर्नल माइक्रोऑर्गेनिज्म्स में प्रकाशित एक पेपर के अनुसार, पिछले साल सितंबर से दिसंबर के बीच भारत के 16 केंद्रों में ब्लैक फंगस के मामले 2.5 गुना बढ़ गए थे. संक्रमण की संख्या पर 2019-2020 के एक अन्य अनुमान में कहा गया है कि पश्चिमी जगत की तुलना में भारत में इसका प्रसार 80 गुना अधिक था.

एक कारण जिंक सप्लीमेंट्स का जरूरत से अधिक प्रयोग हो सकता है. आइएमए के अध्यक्ष डॉ. राजीव जयदेवन कहते हैं, ''शरीर में जिंक और आयरन की मौजूदगी ब्लैक फंगस के विकास के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान करती है.'' इंदौर के महाराजा यशवंतराव अस्पताल के डॉक्टरों ने पाया कि सभी 210 रोगियों को जिन्हें कोविड के इलाज के लिए ऐंटीबायोटिक्स दिए गए थे, उनमें म्यूकरमायकोसिस विकसित हुआ. भारत में कोविड के लिए निर्धारित ऐंटीबायोटिक दवाएं जैसे एजिथ्रोमाइसिन, डॉक्सीसाइक्लिन और कार्बापेन्स्त फंगस संक्रमण का जोखिम बढ़ाने के लिए जानी जाती हैं.

कोविड-19 के इलाज के लिए सांस से अत्यधिक भाप लेने को भी एक अन्य कारक बताया जा रहा है. भारत में पहले रिपोर्ट किए गए म्यूकरमायकोसिस के 10-20 प्रतिशत मामले श्वसन अंग में जलन से जुड़े थे. अन्य कारण जो लोगों को संक्रमण के प्रति संवेदनशील बनाते हैं, उनमें ऑक्सीजन कंसंट्रेटर में दूषित पानी और कोविड सुविधाओं में साफ-सफाई की खराब व्यवस्था शामिल हैं. गाय के गोबर सहित सड़ने वाले अन्य कार्बनिक पदार्थों में फंगल स्पोर भी पाए जाते हैं, जिसका इस्तेमाल कुछ मरीज कोविड के 'इलाज' के रूप में करते रहे हैं.

विशेषज्ञ कोविड के इलाज के लिए दवाओं के बेजा उपयोग को लेकर लोगों को अधिक जागरूक करने की सलाह देते हैं. जिन मरीजों की प्रतिरोधी क्षमता कमजोर है या जिनके इलाज में स्टेरॉयड का इस्तेमाल हुआ है, उनका इलाज बहुत स्वच्छ चिकित्सा इंतजामों में किए जाने की आवश्यकता होती है.

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