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जम्मू और कश्मीरः घाटी में खौफ की वापसी

उग्रवादियों की ओर से हालिया हत्याएं प्रतिशोध में की गई हैं. यह संदेश देने के लिए कि उग्रवाद पर हालिया लगाम के बाद भी घाटी में वह खत्म नहीं हुआ है

शोक मार्च उग्रवादियों की ओर से मारी गईं स्कूल शिक्षिका सुपिंदर कौर के शव के साथ श्रीनगर में सिख प्रदर्शनकारी शोक मार्च उग्रवादियों की ओर से मारी गईं स्कूल शिक्षिका सुपिंदर कौर के शव के साथ श्रीनगर में सिख प्रदर्शनकारी

मोअज्जम मोहम्मद

जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर के एक कश्मीरी पंडित सामाजिक कार्यकर्ता (सुरक्षा कारणों से नाम नहीं दिया जा रहा है) पिछले एक पखवाड़े से पुलिस की हिफाजत में रह रहे हैं. 5 अक्तूबर की मध्यरात्रि पुलिस का एक जत्था आया और उन्हें उनके घर से एक किलोमीटर दूर ज्यादा सुरक्षित जगह ले गया. वे कहते हैं, ''उन्होंने कहा कि मैं उग्रवादियों की रडार पर हूं और मुझे उनके साथ चलना होगा.''

कुछ ही घंटों पहले उग्रवादियों ने श्रीनगर के इकबाल पार्क इलाके में फार्मेसी मालिक 68 वर्षीय कश्मीरी पंडित माखन लाल बिंदरू की हत्या कर दी थी. सामाजिक कार्यकर्ता की तरह बिंदरू भी उन 808 कश्मीरी पंडित परिवारों में थे, जिन्होंने 1990 के दशक में तब भी घाटी में रहना चुना जब उग्रवाद ने हिंदुओं को घाटी से सामूहिक रूप से पलायन करने को मजबूर कर दिया था.

इस महीने घाटी में खौफ और पहले जैसी अशुभ घटनाओं के घटित होने का डरावना एहसास लौट आया, जब उग्रवादियों ने निशाना बनाकर एक के बाद सात लोगों को मार डाला. मारे गए लोगों में तीन हिंदू और एक सिख महिला थीं. सबसे जघन्य वह थी जिसमें उग्रवादियों ने बॉयज हायर सेकंडरी स्कूल में हर व्यक्ति के पहचान पत्र की जांच करके दो शिक्षकों—बडगाम के बीरवाह गांव की सुपिंदर कौर और जम्मू के दीपक चंद—को अलग किया और स्कूल के भीतर ही गोली मारकर हत्या कर दी. कश्मीरी पंडितों के अधिकारों के लिए लड़ रहे संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के प्रमुख संजय टिक्कू कहते हैं, ''यह डोडा और राजौरी के नरसंहारों की तरह था जहां एक समुदाय विशेष के लोगों को अलग करके मार डाला गया था.'' टिक्कू उन लोगों में हैं जो उग्रवाद के बावजूद यहां रुके रहे.

साल 2010 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के पटल पर रखे गए आंकड़ों के मुताबिक, '90 के दशक से मारे गए कश्मीरी पंडितों की तादाद 209 थी. केपीएसएस के मुताबिक, ताजा आंकड़ा 677 है. गृह मंत्रालय का आंकड़ा कहता है कि 62,000 से ज्यादा परिवार, जिनमें ज्यादातर कश्मीरी पंडित थे, घर छोड़कर चले गए. उनमें से करीब 40,000 अब जम्मू में, 20,000 दिल्ली में और बाकी भारत के दूसरे हिस्सों में रह रहे हैं.

एक हिंसक पलायन
एक हिंसक पलायन

स्कूल शिक्षकों की हत्या से घाटी में हिंदुओं और सिखों में खौफ तारी हो गया है. टिक्कू के मुताबिक, सात परिवार फिलहाल कश्मीर छोड़कर चले गए और जम्मू-कश्मीर के लिए प्रधानमंत्री विकास पैकेज (पीएमडीपी) के तहत काम कर रहे 1,400 से ज्यादा लोगों को जम्मू ले जाया गया. ये हत्याएं असल में 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 खत्म करने और राज्य को दो हिस्सों में बांटने के बाद सरकार की ओर से की जा रही मेलजोल की कोशिशों के लिए जबरदस्त झटका हैं. मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने 2008 में कश्मीरी प्रवासियों की वापसी और पुनर्वास को प्रोत्साहित करने के लिए पीएमडीपी का ऐलान किया था. उसे मोदी सरकार ने 2015 में और ज्यादा नौकरियों और मकानों का ऐलान करके आगे बढ़ाया.

वेसु कल्याण समिति के प्रेसिडेंट और सड़क और भवन निर्माण विभाग में जूनियर इंजीनियर सनी रैना के मुताबिक, श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग के नजदीक दक्षिण कश्मीर के काजीगुंड स्थित वेसु के सुरक्षित क्लस्टर में बने घाटी के सबसे बड़े ट्रांजिट कैंप से 400 में से 350 कश्मीरी पंडित परिवार जम्मू चले गए हैं. वे कहते हैं, ''बाकी परिवार भी चले जाएंगे क्योंकि सरकार सुरक्षा मुहैया करवाने में नाकाम रही है.''

सिलसिलेवार छापों और संदिग्धों की धर-पकड़ के अलावा पूरी घाटी में सुरक्षा अलर्ट बढ़ा दिए जाने के कारण उग्रवादी हमलों का खूनी ज्वार फिलहाल थम गया है. आने-जाने वालों की बेतरतीब तलाशी बढ़ गई है और सड़कों पर जांच नाकों की तादाद में कई गुना इजाफा हुआ है. 8 अक्तूबर के बाद सुरक्षाबलों ने सात उग्रवादियों को मार गिराया, जबकि पीरपंजाल इलाके में एक जूनियर कमिशंड ऑफिसर सहित पांच जवान उग्रवादियों के साथ लड़ाई में मारे गए. मारे गए उग्रवादियों में दो द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) के हैं. पुलिस का कहना है कि ये दोनों 5 अक्तूबर को बांदीपोरा के शाहगुंड इलाके में एक नागरिक और श्रीनगर के आलमगीर बाजार मेंपानी-पूरी खोमचे लगाने वाले बिहार के व्यक्ति की हत्या के लिए जिम्मेदार थे. पुलिस के मुताबिक, टीआरएफ लश्कर-ए-तैयबा का ही दूसरा अवतार है और हाल की हत्याओं को 'मिले-जुले' उग्रवादियों ने अंजाम दिया. ये अंशकालिक उग्रवादी सुरक्षा एजेंसियों की रडार से इसलिए बच निकले क्योंकि जाहिरा तौर पर ये सामान्य जिंदगी बसर करते हैं, जबकि असल में बेहद कट्टरपंथी बनाए जा चुके हैं. कश्मीर के पुलिस इंस्पेक्टर जनरल विजय कुमार के मुताबिक, बीते 10 महीनों में उग्रवादियों ने 28 नागरिकों की जानें ली हैं.

ऐसा लगता है कि 15 अगस्त को अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद हमलों में तेजी आई है. नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर युद्धविराम समझौते के छोटे-मोटे उल्लंघन भी हुए और सीमा पार से घुसपैठ भी बढ़ गई है. माना जा रहा है कि इस साल जुलाई से अब तक करीब 50 विदेशी उग्रवादी घुस आए हैं और एलओसी के नजदीक उत्तर कश्मीर में सक्रिय हैं. सितंबर में उड़ी में सात उग्रवादी मारे गए थे और एलओसी के नजदीक विभिन्न उग्रवाद-विरोधी कार्रवाइयों में एक जिंदा पकड़ा गया था. उग्रवाद-विरोधी अभियानों के तजुर्बेकार एक अफसर कहते हैं, ''ये (हाल के) हमले ऐसे वक्त हुए जब उग्रवादियों का नेतृत्व खत्म किया जा चुका है. ये डराने और यह संदेश देने के इरादे से किए गए हैं कि उग्रवाद जिंदा है.''

जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने ''मुंहतोड़ जवाब'' देने का वादा करते हुए कहा कि निर्दोष नागरिकों के खून का बदला लिया जाएगा. उन्होंने कहा, ''मैं आपको भरोसा दिलाता हूं कि हमने मानवता के दुश्मनों को खत्म करने के लिए सुरक्षा एजेंसियों को खुली छूट दी है और आतंकवादियों के साथ उन्हें मदद और बढ़ावा देने वालों को भी अपने जघन्य अपराधों की कीमत चुकानी होगी.''

मगर कश्मीरी विश्लेषक माजिद हैदरी की तरह कई लोग सरकार के आश्वासनों के आश्वस्त नहीं हैं. हैदरी कहते हैं कि जिन लोगों को धमकियां मिली हैं, उनकी जिंदगियां बचाने की पूरी कोशिश सरकार नहीं कर रही है. वे कहते हैं, ''पुलिस ने सियासतदानों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं सहित जाने-माने कश्मीरियों को धमकी की कई एफआइआर दर्ज की हैं, पर जम्मू-कश्मीर प्रशासन संगीत और नृत्य महोत्सव करने में मशगूल है.'' इससे खौफ तो दूर नहीं ही होता.

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