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किसान आंदोलनः अडिग डगर

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि कृषि कानून को लेकर उन्हें भी विरोध का सामना करना पड़ा था लेकिन वे पीछे नहीं हटे थे

गतिरोध कायम मोदी सरकार का दावा है कि किसानों का प्रदर्शन अब बस धरने तक सीमित गतिरोध कायम मोदी सरकार का दावा है कि किसानों का प्रदर्शन अब बस धरने तक सीमित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10 फरवरी को जब लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने के लिए उठे तो अपने भाषण में उन्होंने किसानों के आंदोलन को न सिर्फ पवित्र बताया बल्कि दो-टूक कहा, ''आंदोलन कर रहे सभी किसान साथियों की भावनाओं का सदन और सरकार भी आदर करती है और करती रहेगी.'' इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने किसानों से बातचीत करने का आग्रह करके उस डेडलॉक को तोड़ने का प्रयास भी किया जो 26 जनवरी को किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान लाल किले पर हुए हुड़दंग के बाद से बना हुआ है.

दरअसल, 75 दिनों से ज्यादा समय से जारी किसान आंदोलन के नहीं सुलझने की असली वजह, बातचीत के लिए सरकार की ओर से नियुक्त मंत्रियों का रुख और आंदोलन को समर्थन दे रही सियासी हस्तियों का हस्तक्षेप है. सरकार के एक मंत्री स्वीकार करते हैं, ''चूक हुई क्योंकि आंदोलन में शामिल होने वाले लोगों में उन लोगों का बोलबाला अधिक था जिनके लिए प्रधानमंत्री ने आंदोलनजीवी शब्द का इस्तेमाल किया है.'' सरकार से क्या चूक हुई? कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कहते हैं, ''कहीं से किसानों को खालिस्तानी, नक्सली बताया जाने लगा, जबकि सरकार की तरफ से इन शब्दों का इस्तेमाल कभी नहीं हुआ. बाद में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी एक साक्षात्कार में स्पष्ट रूप से कहा कि किसान हमारे अन्नदाता हैं और उनके प्रति ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं है.''

तो क्या अब जल्द ही किसानों के साथ सरकार बातचीत करेगी और बीच का रास्ता निकलेगा? केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं कि निश्चित रूप से बातचीत होगी. हालांकि, सरकार के मंत्री दो-टूक कहते हैं कि कृषि कानून वापस नहीं लिए जाएंगे, अलबत्ता इनके किसी प्रावधान पर कोई सुझाव किसान संगठनों की तरफ से आता है तो उसमें सुधार करने के लिए सरकार खुले मन से विचार करेगी.

सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का उत्तर राज्यसभा में 8 फरवरी को प्रधानमंत्री देने आए तो उससे पहले प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी किसान आंदोलन से जुड़ी हर कड़ी का प्रजेंटेशन करके उससे उन्हें अवगत करा चुके थे. आंदोलन की फंडिग से लेकर, मीडिया और सोशल मीडिया पर आंदोलन का प्रचार करने वाले, किसान नेताओं को ब्रीफिंग करने वाले और देश भर के किसानों के रुख को लेकर दिए गए प्रजेंटेशन में यह बात सामने आई कि तीनों कृषि कानून की खामियों को लेकर कोई ठोस तर्क न तो सियासी दलों ने और न ही किसान संगठनों ने दिया है. सूत्रों का कहना है कि प्रजेंटेशन में यह बताया गया कि किसानों का विरोध महज धरने तक सीमित है और आंदोलन का हौव्वा सिर्फ सोशल मीडिया के जरिए पंजाब और हरियाणा के आढ़तियों की शह पर खड़ा किया जा रहा है. इसका पुख्ता तर्क देते हुए कहा गया कि बीती 6 फरवरी को चक्का-जाम का असर कुछ राज्यों में छिटपुट जगह पर ही पड़ा.

तो क्या आंदोलन खत्म करने पर किसान राजी हो जाएंगे? तोमर की राय में वार्ता से ही हल निकलेगा और जो लोग कानून रद्द करने की बात करते हैं उन्हें बताना चाहिए कि कानून में क्या गड़बड़ी है? वे कहते हैं, ''किसानों की एक मांग यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) खत्म न किया जाए. सरकार पहले ही साफ कर चुकी है कि एमएसपी खत्म नहीं होगा, कई मंत्रियों ने और अब तो प्रधानमंत्री ने भी कह दिया है कि एमएसपी खत्म नहीं होगा. इसी तरह यह भ्रम फैलाया गया कि मंडी व्यवस्था खत्म होगी. हम कह चुके हैं कि मंडी खत्म नहीं हो रही.''

प्रधानमंत्री की अपील के बाद क्या किसान संगठन सरकार से बातचीत के लिए जाएंगे? किसान नेता राकेश टिकैत कहते हैं, ''किसान सार्थक बातचीत के लिए हमेशा तैयार हैं. हम प्रधानमंत्री का और प्रधानमंत्री किसानों का सम्मान रखेंगे, इस सोच के साथ बातचीत हो सकती है. फिलहाल हमारी मांग और आंदोलन कायम है.''

आगे क्या

सरकार की पहली रणनीति इस आंदोलन को कुछ किसानों (बड़ी जोत) का विरोध बताकर प्रचारित करने की है. प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इसका उल्लेख करते हुए कहा कि 86 फीसद किसान छोटी जोत (2 एकड़ से कम) वाले हैं. इसके लिए उन्होंने चौधरी चरण सिंह का जिक्र करते हुए कहा, ''छोटे किसानों की दयनीय स्थिति हमेशा चौधरी चरण सिंह को परेशान करती थी.'' दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर किसान ही गाजीपुर बॉर्डर पर डटे हैं जिनमें बहुत-से छोटी जोत के किसान हैं. चौधरी चरण सिंह का जिक्र करके मोदी ने इन्हें ही साधने की कोशिश की है.

सरकार की दूसरी रणनीति खुद को देश भर के 86 फीसद किसानों से जोड़ने की है. मोदी जब कहते हैं कि उन्हें छोटे किसानों की चिंता है और उनकी बेहतरी के लिए कानून लाया गया है तो वे दिल्ली के आसपास के आंदोलन से बाकी देश के किसानों को अलग करने की कोशिश करते हुए दिखते हैं. सरकार की एक और कोशिश किसानों के विरोध को धरने तक सीमित और इसके समर्थन में उतरने वालों को अपनी सियासत साधने वाला बताने की है. मोदी की ओर से 'आंदोलनजीवी जमात' शब्द का प्रयोग इसी संदर्भ में देखा जा रहा है.

इन सब के बीच सरकार इस आंदोलन को खत्म करने के लिए चर्चा की टेबल पर नए चेहरों को उतार सकती है. किसानों से बातचीत के लिए राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी जैसे चेहरे उतारने पर सरकार विचार कर रही है. सूत्रों का कहना है कि 26 जनवरी की घटना के बाद कई लोगों पर मामले दर्ज हैं. किसानों से बातचीत के दौरान यह मुद्दा उठ सकता है कि जेल में बंद किसानों या जिन किसानों पर मामले दर्ज हैं, उन मामलों को खत्म किया जाए. अगर यह मुद्दा आता है तो सरकार इस मांग पर विचार करेगी और किसानों के खिलाफ दर्ज मामले वापस ले सकती है.

बहरहाल, सरकार इस बात को लेकर साफ है कि कृषि कानून वापस नहीं होंगे. खासकर जब मोदी पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जिक्र करते हुए कहते हैं, ''कृषि कानून को लेकर शास्त्रीजी को भी विरोध का सामना करना पड़ा. उनका विरोध तो योजना आयोग तक कर रहा था लेकिन शास्त्रीजी पीछे नहीं हटे.'' सरकार उम्मीद कर रही है कि अभी अडिग दिख रहा आंदोलन, बातचीत के जरिए डिगेगा जरूर.

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