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जातियों के भरोसे जीत की नई जुगत

राजस्थान में विप्र (ब्राह्मण) कल्याण बोर्ड बनाकर अशोक गहलोत सरकार इस जाति समूह को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन इस बीच अन्य जातियों से भी ऐसी मांग उठने लगी है

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नई रणनीति : जयपुर के आंबेडकर बालिका स्कूल को राजस्थान राज्य विप्र कल्याण बोर्ड को सौंप दिया गया है नई रणनीति : जयपुर के आंबेडकर बालिका स्कूल को राजस्थान राज्य विप्र कल्याण बोर्ड को सौंप दिया गया है

आनंद चौधरी

बीती 11 जुलाई को दोपहर एक बजे का वक्त था. जयपुर के आंबेडकर सर्किल के पास इंदिरा गांधी नहर मंडल में राजस्थान विप्र (ब्राह्मण) कल्याण बोर्ड के कार्यालय का उद्घाटन कार्यक्रम चल रहा था. ठीक इसी दौरान यहां से तीन किलोमीटर दूर बजाज नगर की हरिजन बस्ती में आंबेडकर बालिका स्कूल की दीवारों पर रंग पोतकर विप्र कल्याण बोर्ड लिखा जा रहा था. इंदिरा गांधी नहर मंडल में जहां पूरे लवाजमे के साथ कार्यालय का उद्घाटन किया जा रहा था, वहीं बजाज नगर में गुपचुप तरीके से आंबेडकर के नाम को मिटाकर उस पर विप्र कल्याण बोर्ड लिख दिया गया.

इस स्कूल को पूर्ववर्ती वसुंधरा राजे सरकार ने समानीकरण योजना के नाम पर बंद कर दिया था. इस योजना के तहत जिन स्कूलों में बच्चों की संख्या के एक निश्चित अनुपात से ज्यादा शिक्षक थे, उन्हें हटाया गया था और जहां शिक्षकों के अनुपात में बच्चे कम थे, उन स्कूलों को बंद किया गया था. हालांकि स्थानीय लोग इसके पक्ष में नहीं थे और वे पिछले छह साल से इस स्कूल को खुलवाने के लिए शिक्षा विभाग के दफ्तरों में चक्कर काट रहे हैं. लेकिन इस बीच यहां स्कूल की जगह विप्र कल्याण बोर्ड का कार्यालय बन गया है.

बजाज नगर विकास समिति से जुड़े मदन लाल बैरवा कहते हैं कि उनके साथी स्कूल की जमीन को एक जातिगत संगठन के नाम पर बने बोर्ड को किसी भी सूरत में नहीं सौंपने देंगे और सरकार के इस कदम के खिलाफ प्रदर्शन करेंगे. शिक्षाविद् डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी भी इस कदम को गलत मानते हैं और कहते हैं, ''शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे सरकार के बुनियादी काम हैं, लेकिन यह पहली बार देखा जा रहा है कि शिक्षण संस्थाओं को बंद करके उनकी जमीन और संसाधनों को जातिगत संस्थाओं को सौंपा जा रहा है. ऐसा लग रहा है कि सरकार शिक्षा की जगह जातिगत मूल्यों को बढ़ावा दे रही है.''

स्थानीय लोगों ने इस मामले में राजस्थान के शिक्षामंत्री डॉ. बी.डी. कल्ला से भी मुलाकात की है और उन्हें एक ज्ञापन दिया है. हालांकि इन लोगों को शिक्षा मंत्री से ज्यादा उम्मीद नहीं है. शिक्षा मंत्री से मिलने गए बजाज नगर विकास समिति के अध्यक्ष ललित कुमार कहते हैं, ''हमें नहीं लगता कि शिक्षा मंत्री आंबेडकर बालिका स्कूल फिर से शुरू करवाने के मामले में कोई कार्रवाई करेंगे. अब स्कूल की यह जमीन विप्र (ब्राह्मण) कल्याण बोर्ड को दे दी जाएगी.'' 

लोगों की यह नाउम्मीदी बेवजह नहीं है. राजस्थान में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं और सरकार जातिगत समूहों को खुश करने की कवायद में जुटी है. राजस्थान सरकार की यह कोशिश कर्नाटक की तर्ज पर है, जहां राज्य सरकार ने जातिगत आधार पर सरकारी बोर्ड बनाए हैं. कर्नाटक में ब्राह्मण विकास बोर्ड सहित जातिगत आधार पर करीब 20 बोर्ड बनाए गए हैं. 

वहीं राजस्थान की पूर्ववर्ती वसुंधरा राजे सरकार के कार्यकाल में गुर्जर समाज के लिए देवनारायण बोर्ड का गठन कर इसकी नींव रख दी गई थी. वैसे तो इस समाज की आबादी ज्यादातर उत्तर भारतीय राज्यों में फैली है, लेकिन उत्तर-पश्चिमी राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में इसका खास असर माना जाता है. जाहिर है कि वसुंधरा राजे इस फैसले से इस समाज को लुभाने की कोशिश कर रही थीं. यह भी दिलचस्प है कि  इसके बाद मध्य प्रदेश में भी अक्तूबर, 2020 में गुर्जर समाज के लिए देवनारायण बोर्ड के गठन की घोषणा की गई है.

राजनैतिक लिहाज से यह चतुराई भरी रणनीति है, इसलिए 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस इसको लेकर गंभीर हो गई. उस समय सचिन पायलट पार्टी अध्यक्ष हुआ करते थे और उनकी अगुआई में पार्टी का जो घोषणापत्र जारी हुआ, उसमें विप्र कल्याण बोर्ड के गठन का वादा किया गया था. हालांकि इस घोषणा पर सरकार बनने केबाद तुरंत अमल नहीं हुआ, लेकिन विधानसभा चुनाव जो 2023 में होना है, को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसी साल 11 फरवरी को विप्र कल्याण बोर्ड के गठन का ऐलान किया और इसके एक दिन बाद ही 12 फरवरी को महेश शर्मा को इस बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया. 

महेश शर्मा राजस्थान कांग्रेस के पूर्व संगठन मंत्री रहे हैं. अध्यक्ष बनते ही महेश शर्मा का कहना था, ''ब्राह्मण समाज पिछले कुछ सालों से किसी न किसी वजह से कांग्रेस पार्टी से दूर हो गया था. ऐसे में मेरी पहली व्यक्तिगत जिम्मेदारी है कि ब्राह्मण समाज जो कांग्रेस से दूर हुआ है, उसे वापस पार्टी के करीब लाऊं. मैं कांग्रेस पार्टी और ब्राह्मण समाज के बीच सेतु का काम करूंगा. बोर्ड के जरिए ब्राह्मण समाज के शिक्षित और बेरोजगार युवाओं को रोजगार दिलाने का प्रयास करूंगा.''

राजस्थान में गुर्जर और ब्राह्मण समाज के नाम पर दो बोर्ड बनने के बाद अब प्रदेश में अन्य जातियां भी अपनी जाति के नाम से बोर्ड बनाने के लिए दबाव बना रही हैं. राज्य की दो प्रमुख जातियों राजपूत और जाट समाज ने विप्र और देवनारायण बोर्ड की तरह अपने बोर्ड बनाए जाने की मांग की है. राजपूत आदर्श महासभा के महासचिव जितेंद्र सिंह तंवर कहते हैं, ''देशहित के लिए 500 से ज्यादा राजपूत रियासतों ने अपनी रियासत, धन-दौलत, मान-सम्मान सब कुछ त्याग दिया, लेकिन आज राजपूत समाज बहुत दयनीय हालत में है. समाज का अधिकांश वर्ग बेहद गरीबी में जी रहा है, समाज के युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार की कोई व्यवस्था नहीं है. ऐसे में हम राजस्थान सरकार से मांग करते हैं कि वह देवनारायण बोर्ड और विप्र कल्याण बोर्ड की तर्ज पर राजपूत कल्याण बोर्ड का गठन करे''.

राजस्थान में बहुसंख्यक जनसंख्या वाली जाट जाति ने भी जाट कल्याण बोर्ड बनाने के लिए सरकार को ज्ञापन दिया है. जाट महासभा के प्रदेशाध्यक्ष राजाराम मील बताते हैं कि राजस्थान में जाट आबादी 15-20 फीसद के बीच है और 15 जिले तो ऐसे हैं, जिनमें जाट समाज की जनसंख्या 40 फीसद तक है, ऐसे में जाट समाज के लिए अलग से बोर्ड बनना ही चाहिए. हालांकि, मील यह भी कहते हैं, ''जातिगत नाम से बोर्ड बनाने से वोट मिल ही जाएंगे यह तय नहीं है.'' 

जाहिर कि राजनीतिक दल जातियों को लुभाने की इस नई रणनीति में अपना फायदा देख रहे हैं, लेकिन जानकार इसे एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा चलन नहीं मानते. समाजशास्त्री डॉ. राजीव गुप्ता कहते हैं, ''जातिगत राजनीति वाले इस नए किस्म के सामंतवाद ने हमारे लोकतांत्रिक ढांचे को खत्म कर दिया है. राजनैतिक दलों ने यह समझ लिया है कि अगर सत्ता में खुद को बनाए रखना है तो जाति आधारित वोट बैंक को साधे रखना होगा. विचारधारा की जगह अब जाति और धर्म की लोकप्रियता की राजनीति का दौर चल पड़ा है जो भविष्य में बड़ी चुनौती साबित होगा.'' 

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