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कमजोर पड़ती किसानों की आवाज

चुनाव के दौरान राकेश टिकैत ने रालोद का खुलकर समर्थन किया था जो कई नेताओं को पसंद नहीं था

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अपना राग : भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के सदस्य अपना राग : भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के सदस्य

भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत किसान नेताओं के बीच असंतोष की भनक लगते ही लखनऊ में चिनहट ब्लॉक के तकरोही गांव में 14 मई की शाम चार बजे पहुंच गए थे. यहां अवध के प्रभावी किसान नेता हरिनाम सिंह वर्मा के आवास पर भाकियू के कई बड़े नेता भी पहुंचे थे. देर रात तक आरोप-प्रत्यारोप और गिले-शिकवों का दौर चला, बैठक बेनतीजा रही. अगले दिन 15 मई को किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर खचाखच भरे लखनऊ के गन्ना संस्थान सभागार में आयोजित सभा में भाकियू के राष्ट्रीय सचिव रहे अनिल तालान ने मंच से भाकियू (अराजनैतिक) नाम से नया संगठन बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे सर्वसम्मति से स्वीकृत कर लिया गया. इस तरह महेंद्र सिंह टिकैत के बेटों नरेश टिकैत और राकेश टिकैत की अगुआई वाली भाकियू दो फाड़ हो गई. दूसरे गुट की कमान फतेहपुर के रहने वाले राजेश चौहान को सौंपी गई. किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर भाकियू में विभाजन से किसान हितों की लड़ाई कमजोर पड़ी है.

अक्तूबर 1988 में जब भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत ने बोट क्लब पर धरना समाप्त किया था तब कुछ असंतुष्ट किसान नेताओं ने अलग राह पकड़ी थी. इसके बाद से अब तक 34 वर्षों में भाकियू का 11 बार विभाजन हो चुका है (देखें बॉक्स) लेकिन अबकी पहली बार संगठन का राष्ट्रीय स्तर पर विभाजन हुआ है. भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत और राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत की कार्यप्रणाली को किसान संगठन में विभाजन की बजह बताया जा रहा है.

भाकियू (अराजनैतिक) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश सिंह चौहान कहते हैं, ''भाकियू के भीतर कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है. यह संगठन महेंद्र सिंह‍ टिकैत के आदर्शों से भटक चुका है. 13 महीने चले किसान आंदोलन के बाद टिकैत बंधु भाजपा के विरोध और समाजवादी पार्टी-राष्ट्रीय लोकदल के समर्थन में बयानबाजी करते रहे. इन्होंने किसान संगठन को एक राजनैतिक दल में तब्दील कर दिया था. इससे किसान नेता असंतुष्ट थे.'' राजेश सिंह चौहान के मुताबिक, किसान आंदोलन चलाने वाले संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल 38 किसान संगठनों में से 22 ने पंजाब के विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया, जिससे साबित होता है कि किसान आंदोलन महज राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति की खातिर माहौल बनाने के लिए किया गया था.

नवंबर, 2021 में कृषि कानून वापसी के बाद भाकियू नेताओं ने सरकार के खिलाफ जो आक्रामक रवैया अपना रखा था, उससे संगठन के कुछ नेता असंतुष्ट थे. यूपी में विधानसभा चुनाव के दौरान भाकियू नेताओं में असंतोष बढ़ता जा रहा था. विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिमी यूपी के प्रभावी भाकियू नेता राजू अहलावत ने भाजपा का दामन थाम लिया था. यूपी के विधानसभा चुनाव में मतगणना से पहले सपा और रालोद की तरह किसानों से ईवीएम मशीनों की रखवाली करने की राकेश टिकैत की अपील भी असंतुष्ट किसान नेताओं को रास नहीं आई थी.

नए संगठन के चेयरमैन और गठवाला खाप के चौधरी राजेंद्र सिंह कहते हैं, ''किसान आंदोलन के नाम पर उपद्रव करना, सड़क रोकना ठीक नहीं है. इन हरकतों ने किसानों के हितों की लड़ाई को कमजोर किया है.'' असल में भाकियू में असंतुष्ट किसान नेता विधानसभा चुनाव के नतीजों का इंतजार कर रहे थे. किसान आंदोलन और विधानसभा चुनाव के दौरान राकेश टिकैत और रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी एक दूसरे के पक्ष में खुल कर सामने आ गए थे. किसान आंदोलन का रालोद को फायदा न मिलने की बात चुनाव नतीजों से जाहिर हुई थी. सपा से गठबंधन करके रालोद ने पश्चिमी यूपी की 33 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ा था, जिनमें वह केवल आठ ही जीत सका था.

विधानसभा चुनाव के नतीजों में किसान आंदोलन के प्रभावहीन रहने से भाकियू के असंतुष्ट नेताओं को रणनीति को बल मिला और नतीजा दो महीने बाद संगठन में बंटवारे के रूप में सामने आया. भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत असंतुष्ट खेमे के सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं. राकेश टिकैत बताते हैं, ''प्रदेश की भाजपा सरकार से डर कर कुछ कमजोर लोगों ने एक अलग किसान संगठन बनाया है. इन्हें आम किसानों का समर्थन नहीं है. किसी भी राजनैतिक दल के पक्ष में मेरे बयान देने की बात भी गलत है.''

किसान यूनियन के दो भागों में बंट जाने से पश्चिमी यूपी की खाप राजनीति में भी हलचल दिखाई देगी. बालियान खाप के चौधरी नरेश टिकैत भाकियू के अध्यक्ष हैं तो गठवाला खाप के चौधरी राजेंद्र मलिक को भाकियू (अराजनैतिक) का संरक्षक और धर्मेंद्र मलिक को राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया गया है. बालियान और गठवाला पश्चिमी यूपी की दो प्रमुख खापें हैं, जिनके बीच अब किसान संगठन को लेकर होड़ दिखाई दे सकती है. मुजफ्फरनगर और शामली के राजस्व रिकॉर्ड में गठवाला खाप के 84 गांव हैं और इतने ही बालियान खाप के भी हैं.

मुजफ्फरनगर की बुढ़ाना तहसील में मलिक बिरादारी के सबसे ज्यादा गांव हैं. किसान आंदोलन के समय से ही गठवाला खाप के चौधरी राजेंद्र सिंह मलि‍क के भाकियू से अंदरूनी मतभेद बढ़ गए थे. इस कारण एक वक्त गठवाला खाप ने संयुक्त किसान मोर्चा के आंदोलन से अपने को अलग रखने का निर्णय लिया था. किसान आंदोलन के दौरान ही सिसौली, मुजफ्फरनगर में भाजपा के तत्कालीन बुढ़ाना विधायक उमेश मलिक के ऊपर कालिख डालने का गठवाला खाप चौधरी ने विरोध किया था. इसके बाद से गठवाला और बालियान खाप में दूरियां बढ़ने लगी थीं. बालियान खाप के चौधरियों में आपसी होड़ भी नए समीकरण तैयार कर रही है. पश्चिमी यूपी के खाप चौधरियों ने किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए 17 अक्तूबर, 1986 को भारतीय किसान यूनियन की नींव रखी थी. बालियान खाप के चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत को इसका अध्यक्ष बनाया गया था.

इसके बाद 25 वर्ष तक महेंद्र सिंह टिकैत ने भाकियू का नेतृत्व किया और इस दौरान बालियान खाप उनके साथ पूरे समर्पण के साथ खड़ी रही. महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु के बाद पिछले 11 साल से भाकियू की कमान उनके बड़े बेटे और बालियान खाप के चौधरी नरेश टिकैत के हाथों में है. बालियान खाप से ही मुजफ्फरनगर से दो बार सांसद संजीव बालियान भी आते हैं. बालियान खाप से मिले समर्थन के बल पर ही संजीव बालियान ने 2019 के लोकसभा चुनाव में रालोद के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अजित सिंह को हरा दिया था. तीन साल बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में नरेश टिकैत को बालियान खाप का समर्थन मिला. नरेश टिकैत के संकेत पर बालियान खाप के एक बड़े तबके ने भाजपा के विरोध में मतदान किया. नतीजा: भाजपा मुजफ्फरनगर की छह विधानसभा सीटों में से चार पर चुनाव हार गई.

चरथावल और बुढ़ाना विधानसभा सीट पर भाजपा से स्पष्ट रूप से बालियान खाप की नाराजगी झेलनी पड़ी. श्री दिगंबर जैन कॉलेज बुढ़ाना में राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रमुख स्नेहवीर पुंडीर बताते हैं, ''पिछली हर फूट में बालियान खाप भाकियू के साथ खड़ी रही. इस बार भाकियू के विघटन के बाद बालियान खाप टिकैत बंधुओं के पक्ष में कितनी मजबूती से खड़ी हो पाएगी? इससे ही भाकियू का भविष्य भी तय होगा.'' भाकियू में मची हलचल के बीच नरेश टिकैत का दावा है ''जब जब भाकियू को कमजोर करने की कोशिश हुई है तब तब वह और मजबूती से उभरी है.'' देखना है कि टिकैत का दावा इस बार कितना सही साबित होता है.

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