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आप-बीटीपी: कारगर होगा?

बीटीपी और आप का गठजोड़ कांग्रेस और भाजपा के लिए चिंता खड़ी कर सकता है क्योंकि राजस्थान में 2018 के विधानसभा चुनाव में 6 जिलों की 12 सीटों पर चुनाव लड़कर बीटीपी ने कई जगह कांग्रेस-भाजपा के समीकरण बिगाड़ दिए

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कितना कारगर गठजोड़? गुजरात में आम आदमी पार्टी और भारतीय ट्राइबल पार्टी के बीच चुनावी गठबंधन हो चुका है कितना कारगर गठजोड़? गुजरात में आम आदमी पार्टी और भारतीय ट्राइबल पार्टी के बीच चुनावी गठबंधन हो चुका है

आनंद चौधरी

राजस्थान के वागड़ यानी, आदिवासी वोटों पर कांग्रेस और भाजपा के साथ अब भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के सहयोग से आम आदमी पार्टी (आप) भी नजरें गड़ा रही है. गुजरात की तर्ज पर आप राजस्थान में भी बीटीपी के साथ गठबंधन की तैयारी कर रही है. अगर आप और बीटीपी का गठबंधन होता है तो आने वाले चुनाव में दक्षिण राजस्थान में अलग तरह का घमासान देखने को मिल सकता है.

इस गठबंधन को लेकर पहला घमासान तो बीटीपी के भीतर ही मचा है. राजस्थान में बीटीपी के दोनों विधायकों ने दोटूक कहा है कि यहां अगर आप के साथ गठबंधन हुआ तो वे नेशनल ट्राइबल पार्टी के नाम से नया दल बनाएंगे. बीटीपी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. वेलाराम घोघरा ने भी साफ कर दिया है कि दोनों विधायक चाहे नई पार्टी बना लें, आप के साथ गठबंधन होकर रहेगा. इस घमासान से यह तो साफ हो गया है कि आने वाले समय में पार्टी की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं. बीटीपी  अगर दो-फाड़ हुई तो इसका फायदा कांग्रेस और भाजपा को मिलेगा क्योंकि दोनों पार्टियों की नजरें बीटीपी के नाराज नेताओं को अपने खेमे में शामिल करने पर टिकी हैं. 

गठबंधन को लेकर वेलाराम घोघरा कहते हैं, ''गुजरात में आप और बीटीपी का गठबंधन हो चुका है, राजस्थान के लिए भी कोशिश चल रही है. अगर इस गठबंधन से विधायक राजकुमार रोत और रामप्रसाद को आपत्ति है तो वे अपनी नई पार्टी बना सकते हैं. वैसे भी राजकुमार रोत के बारे में यह कहा जाता है कि वे कांग्रेस के कुल्हाड़े का हत्था हैं. वे बीटीपी के नाम पर चुनाव जीते हैं और अब अलग पार्टी का राग अलाप रहे हैं. हम आने वाले चुनाव में बीटीपी के इन दोनों विधायकों को फिर से मौका नहीं देंगे क्योंकि इन्होंने बीटीपी को तोड़ने की साजिशें चलाई हैं. जो अपना घर नहीं संभाल पाए, उनसे और क्या उम्मीद की जाए. आप से गठबंधन से हमें कोई ऐतराज नही है. गठबंधन के बाद आदिवासी इलाके की किसी भी सीट का बंटवारा नहीं होगा, आप और बीटीपी में जो जिस सीट पर मजबूत होंगे, उसका परस्पर सहयोग करेंगे.'' 

डूंगरपुर जिले की चौरासी सीट से बीटीपी के विधायक राजकुमार रोत कहते हैं, ''राजस्थान में बीटीपी के कार्यकर्ता गठबंधन नहीं चाहते, लेकिन गुजरात के बीटीपी नेता मनमानी कर राजस्थान में भी आप के साथ गठबंधन करना चाहते हैं. दोनों के बीच काफी अरसे से वार्ता चल रही है. अगर गुजरात बीटीपी के नेताओं ने राजस्थान में जबरन आप और बीटीपी का गठबंधन कराया तो हम नेशनल ट्राइबल पार्टी (एनटीपी) बनाएंगे.'' वहीं सागवाड़ा से बीटीपी विधायक रामप्रसाद डिंडोर का कहना है, ''बीटीपी हाइकमान के साथ हमारा धरियावद उपचुनाव में प्रत्याशी चयन को लेकर विवाद था. हमारी बात नहीं मानने का खामियाजा पार्टी वहां भुगत चुकी है. हम तो खुद को बीटीपी का मान ही नहीं रहे हैं. धरियावाद चुनाव में भी बीटीपी का उम्मीदवार अलग था और हमारा अलग. राजस्थान के पार्टी प्रदेशाध्यक्ष हड़बड़ाहट में सारा काम कर रहे हैं.''

पार्टी में खींचतान के बावजूद आप और बीटीपी के गठबंधन को लेकर बातचीत लगातार जारी है. इस साल के अंत में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद दोनों दल राजस्थान में भी आपसी तालमेल बढ़ा सकते हैं. इस गठबंधन की संभावना इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि इसमें आप और बीटीपी दोनों को फायदा नजर आ रहा है. 10 साल पहले 2012 में जन्मी आप 2 राज्यों में सत्तासीन हो चुकी है. अब उसकी नजर इस साल हिमाचल प्रदेश, गुजरात और फिर अगले साल राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव पर टिकी है. पार्टी ने गुजरात में पांच साल पहले राजनीति में उतरने वाली नई पार्टी बीटीपी से गठबंधन की घोषणा कर दी है. आप के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया और बीटीपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और दडियापाड़ा के विधायक महेशभाई वसावा ने गठबंधन के बाद कहा, ''भाजपा सरकार तीन दशक से सत्ता में है, लेकिन इसने राज्य के सामने पानी, जंगल, जमीन और आदिवासी मुद्दों के संबंध में कुछ नहीं किया.''

यह भी तय माना जा रहा है कि राजस्थान में भी पार्टी गठबंधन पर आगे बढ़ेगी. अगर बीटीपी और आप का परफॉरमेंस गुजरात के आदिवासी इलाकों में अच्छा रहता है तो 2023 के अंत में राजस्थान में भी दोनों पार्टियां एक साथ मैदान में उतरती नजर आएंगी. राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन का मानना है, ''राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा से नाराजगी का फायदा आप और बीटीपी को मिल सकता है. साल 1998 के बाद से राजस्थान में ऐसे हालात बन रहे हैं जिसमें निर्दलीय और छोटे दलों के काफी सदस्य जीत कर आ रहे हैं. पिछले पांच चुनावों में मतदाताओं ने एक पार्टी को दूसरी बार जिताकर विधानसभा नहीं भेजा है.'' 

बीटीपी और आप का गठजोड़ कांग्रेस और भाजपा के लिए चिंता खड़ी कर सकता है क्योंकि राजस्थान में 2018 के विधानसभा चुनाव में 6 जिलों की 12 सीटों पर चुनाव लड़कर बीटीपी ने कई जगह कांग्रेस-भाजपा के समीकरण बिगाड़ दिए थे. इन चुनावों में बीटीपी को डूंगरपुर जिले की दो सीटों (सागवाड़ा और चौरासी) पर जीत हासिल हुई, वहीं एक सीट पर वह दूसरे स्थान और चार सीटों पर तीसरे स्थान पर रही थी. दिसंबर 2020 में हुए जिला परिषद के चुनाव में भी बीटीपी समर्थित उम्मीदवारों ने 27 में से 13 सीटों पर जीत हासिल की. भाजपा और कांग्रेस को यहां बीटीपी से इस कदर भय था कि बीटीपी को बाहर रखने के लिए दोनों ने अपनी दुश्मनी भुलाकर आपस में हाथ मिला लिया.

असल में, 182 सीटों वाली गुजरात विधानसभा में अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 27 सीटें आरक्षित हैं. वहीं 200 सीटों वाली राजस्थान विधानसभा में 25 सीटें इस वर्ग के लिए रिजर्व हैं. गुजरात में एसटी आबादी करीब 14 फीसद और राजस्थान में 13.5 फीसद है. 

राजस्थान में लोकसभा चुनाव में भी बीटीपी ने तीन जगहों से भाग्य आजमाया है. 2019 में बीटीपी ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बसपा के बराबर वोट हासिल किए. बांसवाड़ा से कांतिलाल रोत को 2,50,761 वोट मिले थे. उदयपुर से बिरधीलाल छंवाल ने 51,643 वोट हासिल किए. गुजरात और राजस्थान में बीटीपी की उपस्थिति का सबसे बड़ा नुकसान जनता दल यूनाइटेड को उठाना पड़ा है. गुजरात में तो बीटीपी के संस्थापक छोटू भाई वसावा ने जनता दल यूनाइटेड छोड़कर ही बीटीपी बनाई थी. 

महज छह साल पुराना बीटीपी का इतिहास
आप के गठन को 12 साल हो चुके हैं, वहीं बीटीपी की उम्र इससे आधी है. गुजरात में छोटू भाई बसावा ने 2017 में बीटीपी का गठन किया था. राजस्थान के साथ गुजरात, मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में बीटीपी का प्रभाव है. बीटीपी की प्रमुख मांगों में भील प्रदेश का गठन और आदिवासी क्षेत्र में वन अधिकार मान्यता कानून एवं पेसा कानून पूरी तरह से लागू करवाना है. इनमें संविधान की 5वीं अनुसूची के अनुसार अधिकारों की मांग भी शामिल है.

आदिवासी वोटों पर सबकी नजर
दक्षिण राजस्थान में बीटीपी की उपस्थिति से कांग्रेस और भाजपा, दोनों की चिंताएं बढ़ी  हैं. यही कारण है कि दोनों सबसे ज्यादा ताकत इसी क्षेत्र में लगा रही हैं. कांग्रेस ने नवसंकल्प चिंतन शिविर के बाद 16 मई को बेणेश्वर धाम में राष्ट्रीय नेताओं की सभा बुलाकर अपने परंपरागत वोट बैंक को साधने की कोशिश की है. वहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा यहां एसटी मोर्चे के सम्मेलन में शामिल हो चुके हैं. कांग्रेस डूंगरपुर में आदिवासी नायक राणा पुंजा भील की प्रतिमा स्थापित करने जा रही है, ताकि लंबे समय से चल रही आदिवासियों की इस मांग को पूरा कर उन्हें अपने साथ लाया जा सके. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पिछले एक माह में पांच बार आदिवासी क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं. भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का भी मेवाड़ दौरे का कार्यक्रम है.

आप ने भी राजस्थान में चुनावी शंखनाद फूंक दिया है. जयपुर में 26-27 मार्च को उसका दो-दिवसीय सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसे विजय उत्सव नाम दिया गया. पंजाब से सटे श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में अपने पांव जमाने के लिए आप ने दो हास्य कलाकारों को अपने साथ मिलाया है. इनमें श्याम रंगीला और ख्याली सहारण प्रमुख हैं. श्याम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री के लिए देशभर में चर्चित हैं. ख्याली सहारण भी अपने चुटीले बयानों के लिए जाने जाते हैं. जाहिर है, राजस्थान में अपनी पैठ बनाने के लिए आप अपने सारे दांव आजमा रही है.

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