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कारोबारः शटर गिराकर चल दिए!

महामारी के दौरान राजस्व पर असर पड़ने के कारण दुनिया भर में ऑटो कंपनियां बड़े सुधार के दौर से गुजर रही हैं. इसके अलावा, दुनिया का रुझान एसीईएस (आटोनॉमस, कनेक्टेड, इलेक्ट्रिक ऐंड शेयर्ड) वाहनों की ओर बढ़ रहा है

बंद होते दरवाजे गुजरात के साणंद में स्थित फोर्ड का मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बंद होते दरवाजे गुजरात के साणंद में स्थित फोर्ड का मैन्युफैक्चरिंग प्लांट

अपने कामकाज के केवल 25 वर्षों में—किसी ऑटो निर्माता के लिए यह बहुत लंबा समय नहीं होता—अमेरिका की फोर्ड मोटर कंपनी ने भारत छोड़ने का फैसला कर लिया है. ऐसा भी नहीं कि मॉडल टी, थंडरबर्ड और मस्टैंग जैसी कारों के इस प्रतिष्ठित निर्माता के लिए ये 25 साल आसान थे. फोर्ड को भारत में जहां आइकॉन, एंडेवर और ईकोस्पोर्ट जैसे मॉडलों में बड़ी सफलता मिली, वहीं मोंडेओ और फ्यूजन सरीखे मॉडलों ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया. कंपनी ने अपने कार्य-व्यापार में दो अरब डॉलर (करीब 14,700 करोड़ रुपए) से ज्यादा का घाटा दर्ज किया था और इसके वाहनों की मांग कमजोर थी. फोर्ड इंडिया के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक अनुराग मेहरोत्रा के मुताबिक, कंपनी दीर्घकालिक लाभ का स्थायी रास्ता नहीं खोज पाई.

महामारी का हवाला देते हुए 2019 में महिंद्रा ऐंड महिंद्रा के साथ साझा उद्यम को बंद करने से फोर्ड के लिए स्थिति और खराब हो गई. साझा उद्यम का लक्ष्य भारत में फोर्ड वाहनों के विकास, विपणन और वितरण के साथ-साथ कुछ फोर्ड और महिंद्रा उत्पादों को ऊंची विकास दर वाले अंतरराष्ट्रीय बाजारों में वितरित करना था. साझा उद्यम खत्म होने के साथ ही भारतीय बाजार में फोर्ड के जीवित रहने की संभावना धूमिल हो गई.

फोर्ड का कहना है कि वह 2021 की चौथी तिमाही तक अपने साणंद (गुजरात) संयंत्र को बंद कर देगी और 2022 तक चेन्नै संयंत्र में वाहन और इंजीनियरिंग मैन्युफैक्चरिंग बंद कर देगी. इस फैसले से देश भर में उसके 4,000 कर्मचारियों पर असर पड़ेगा. साणंद संयंत्र की सालाना क्षमता 2,40,000 वाहन उत्पादन की है और चेन्नै संयंत्र में 2,00,000 वाहन सालाना तैयार हो सकते हैं. खैर, फोर्ड भारत में आयात के जरिए कारें बेचती रहेगी. इस बारे में आए समाचारों के मुताबिक, इनमें मस्टैंग माक-ई, मस्टैंग और रेंजर जैसे हाइ-एंड मॉडल होंगे. कंपनी मौजूदा ग्राहकों को सेवा देती रहेगी.

पिछले कुछेक वर्षों में तीन प्रमुख बहुराष्ट्रीय ऑटो कंपनियों की विदाई भारत के लिए शुभ संकेत नहीं. भारत, रूस और पश्चिमी यूरोप सहित कुछ क्षेत्रों में गैर-लाभकारी संचालन से बाहर निकलने का निर्णय लेने के बाद जनरल मोटर्स ने 2017 में देश छोड़ दिया था. टॉप-एंड मोटरसाइकिल निर्माता हार्ले डेविडसन ने उत्तरी अमेरिका, यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों जैसे चुनिंदा बाजारों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अपनी 'रीवायर' रणनीति के तहत 2020 में भारत छोड़ा. हार्ले को अप्रैल-जून 2020 में 9.6 करोड़ डॉलर (करीब 710 करोड़ रुपए) का घाटा हुआ था. यह बड़ा नुक्सान भले न हो पर स्पष्ट रूप से कंपनी को निकट भविष्य में अच्छी मांग की उम्मीद न थी. महामारी ने ऑटो कंपनियों के लिए चुनौती और बढ़ा दी है क्योंकि लॉकडाउन के दौरान उन्हें रीटेल दुकानें बंद रखने के लिए मजबूर होना पड़ा था.

जापानी और कोरियाई कार निर्माताओं के प्रभुत्व के कारण इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारतीय बाजार विशेष रूप से कठिन रहा है. मारुति सुजुकी की बाजार में करीब 48 फीसद और हुंडई इंडिया की करीब 17 फीसद हिस्सेदारी है. उदारीकरण के बाद के दौर में बढ़ते मध्यम वर्ग और भारतीय परिवारों में ऑटोमोबाइल की कम मौजूदगी के कारण व्यापार संभावनाओं से प्रेरित होकर कई बहुराष्ट्रीय ऑटो कंपनियों ने भारत में प्रवेश किया था. उनके सामने मारुति सुजुकी (पहले मारुति उद्योग) की सफलता की कहानी थी जिसके पास शुरुआती चरण में बाजार का 80 प्रतिशत तक हिस्सा था.

जीएम, फोर्ड और टोयोटा सरीखी जिन कंपनियों ने भारत में आधार बनाया उन्होंने भविष्य की संभावित मांग का दोहन करने के लिए व्यापक क्षमता स्थापित की. पर बाजार उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ा, खासकर बड़ी कारों के लिए. ऑटो इंटेलिजेंस फर्म, जाटो डायनेमिक्स इंडिया के अध्यक्ष और निदेशक रवि भाटिया कहते हैं, ''भारत जैसे महंगी पूंजी वाले देश में ऑटो जैसे ऊंचे पूंजीगत व्यय वाले उद्योग के लिए ज्यादा क्षमता गले में पड़े मरे सांप जैसी हो सकती है.'' मसलन, 1980 के दशक में मारुति के निर्धारित मूल्य—गैर-वातानुकूलित मॉडल के लिए 47,000 रुपए और वातानुकूलित मॉडल के लिए 70,000 रुपए—से बेहतर विकल्प दे पाना मुश्किल था.

मारुति ने अच्छे वितरण और सेवा नेटवर्क के साथ उचित गुणवत्ता की सस्ती कार पेश करने पर ध्यान केंद्रित किया. इसके अलावा, चार मीटर से छोटी कारों पर उत्पाद शुल्क में कटौती से जापानी और कोरियाई कंपनियों को और मदद मिली. भाटिया बताते हैं कि अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों को चार मीटर से कम की कार बनाना मुश्किल लगा क्योंकि उनकी विशेषज्ञता बड़े वाहनों में थी.

दूसरी ओर मांग भी नीची होती गई. पिछले पांच वर्षों में भारत में ऑटो बिक्री सिर्फ 1.5 प्रतिशत की संयुक्त वार्षिक वृद्धि दर दर्ज कर रही है, जिससे भारतीय बाजार में भारी निवेश करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की योजनाएं प्रभावित हुई हैं. सरकार ने एक स्क्रैपेज नीति का ऐलान किया है जिसमें पंजीकरण समाप्त होने पर कार का निरीक्षण करवाना अनिवार्य है. पर यह स्पष्ट नहीं कि इसका ऑटोमोबाइल की बिक्री पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा या नहीं.

अगस्त में ऑटो क्षेत्र की थोक बिक्री में पिछले साल की तुलना में 12 फीसद की गिरावट आई. उद्योग ने इसके लिए उत्पादन पर बुरा असर डालने वाले सेमी कंडक्टरों की कमी और वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण वाहनों की लागत में वृद्धि को जिम्मेदार ठहराया. इसके साथ ही ईंधन की बढ़ती लागत के कारण भी वाहनों की मांग पर दबाव बना रहने का अंदेशा है जिसके चलते भारत जैसे 'लागत-सचेत' बाजार में कंपनियों को अपनी रणनीतियां बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

महामारी के दौरान राजस्व पर असर पड़ने के कारण दुनिया भर में ऑटो कंपनियां बड़े सुधार के दौर से गुजर रही हैं. इसके अलावा, दुनिया का रुझान एसीईएस (आटोनॉमस, कनेक्टेड, इलेक्ट्रिक ऐंड शेयर्ड) वाहनों की ओर बढ़ रहा है. फर्मों को इसमें भारी निवेश करने की जरूरत है. पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, 2020 तक पूरे विश्व में इलेक्ट्रिक कारों की संख्या एक करोड़ तक पहुंच गई थी जो 2019 की तुलना में 43 प्रतिशत ज्यादा है. 2020 में पंजीकृत हुए सभी नए विद्युतचालित वाहनों में से दो-तिहाई बैटरी कारें थीं. 45 लाख इलेक्ट्रिक कारों के साथ चीन इस क्षेत्र में अग्रणी है, जबकि 2020 में सबसे ज्यादा वार्षिक वृद्धि यूरोप में हुई जहां इनकी संख्या 32 लाख तक पहुंच गई.

कुछ ऑटो कंपनियों ने भारत छोड़ा है तो कुछ अन्य ने प्रवेश किया है. चीनी वाहन निर्माता एसएआइसी मोटर की सहायक कंपनी एमजी मोटर इंडिया ने 2019 में भारत में परिचालन शुरू किया. इस साल के शुरू में अमेरिकी इलेक्ट्रिक कार निर्माता टेस्ला ने भारतीय इकाई पंजीकृत कराई. उम्मीद की जा रही है कि यहां पर्याप्त मांग दिखने पर वह यहां एक मैन्युफैक्चरिंग इकाई स्थापित करेगी.

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