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तमिलनाडुः आखिरी दांव

अन्नाद्रमुक ऊंचे-ऊंचे वादों के सहारे, द्रमुक पर वार का जिम्मा सहयोगियों पर छोड़ा

चांद उतार लाने का वादा  मदुरै की रैली में मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी चांद उतार लाने का वादा मदुरै की रैली में मुख्यमंत्री ई. पलानीस्वामी

आगामी 6 अप्रैल को तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री ई.के. पलानीस्वामी के सामने महती चुनौती है. उन्हें ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्नाद्रमुक) को लगातार तीसरी बार जीत दिलानी है. ऐसा हो पाता है तो वे पार्टी के संस्थापक एम.जी. रामचंद्रन की बराबरी कर लेंगे जिनके करिश्मे और कल्याणकारी योजनाओं से पार्टी को 1977, 1980, और 1984 में लगातार तीन बार विधानसभा चुनावों में जीत मिली थी. 235 सदस्यों वाली विधानसभा में पार्टी के पास 124 सीटें हैं. मुख्यमंत्री विपक्षी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) का मुकाबला करने के लिए अपनी सहयोगी पार्टियों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और पाट्टाली मक्कल काची (पीएमके) पर भरोसा करने के अलावा पिछले एक दशक में अपनी पार्टी की उपलब्धियों को प्रचारित करने पर जोर दे रहे हैं. मार्च के शुरू में अन्नाद्रमुक ने भाजपा के साथ गठबंधन करके उसे विधानसभा चुनावों के लिए 20 सीटें दे दी.

पिछले साल 19 दिसंबर से ही मुख्यमंत्री दिन-रात चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं—23 मार्च से अब तक वे 200 से ज्यादा सभाएं, रैलियां और रोडशो के जरिए 100 से ज्यादा चुनाव क्षेत्रों में प्रचार कर चुके हैं. इस अभियान की शुरुआत उन्होंने सलेम जिले में अपने गृहनगर इडापड्डी से की थी. वे अपनी सरकार के कार्यों पर जोर दे रहे हैं जैसे 16.4 लाख किसानों का कर्ज माफ करना, जल के बेहतर प्रबंधन के लिए कुडीमरमथु योजना पर 1,300 करोड़ रु. खर्च करना, प्राकृतिक आपदा से प्रभावित किसानों की राहत के लिए 2,247 करोड़ रु. देना, और राज्य की फसल बीमा योजना के जरिए किसानों को 9,300 करोड़ रु. का भुगतान करना. अन्नाद्रमुक के चुनावी वादों में भूमिहीन किसानों के लिए जमीन और मकान देना, अनुसूचित जाति के परिवारों के लिए उच्च शिक्षा की छात्रवृत्ति देना, हर परिवार को साल में छह कुकिंग गैस सिलिंडर देना, महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों का कर्ज माफ करना और हज के लिए दी जाने वाली सब्सिडी में इजाफा करना शामिल है.

इसके अलावा पार्टी कुछ ऐसे वादे भी कर रही है जिन पर एकबारगी विश्वास नहीं किया जा सकता है. 21 मार्च को तिरुअन्नामलाई के अरनी निर्वाचन क्षेत्र की सभा में मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि एक नया जिला बनाया जाएगा जिसका मुख्यालय अरनी में होगा. 24 मार्च के फिर घोषणा की कि एक और जिला बनाया जाएगा जिसका मुख्यालय पलानी में होगा. वास्तविकता यह है कि तमिलनाडु में मूल रूप से कुल 13 जिले थे जिन्हें बांटकर अब तक 38 जिले बनाए जा चुके हैं.

अन्नाद्रमुक की सहयोगी पार्टियां भी ऊंचे-ऊंचे वादे कर रही हैं. भाजपा ने 50 लाख नई नौकरियां देने और फिर से शराबबंदी लागू करने का वादा किया है. उसने द्रमुक पर हमले के लिए एक पुस्तिका प्रकाशित की है, जिसमें द्रमुक को वोट न देने के 100 कारण बताए गए हैं. मसलन, 2018 में द्रमुक प्रमुख स्टालिन ने कहा था कि वे ऐसी स्थिति का स्वागत करेंगे जिसमें सभी दक्षिण भारतीय राज्य आपस में मिलकर 'द्रविड़ नाडु' बनाने की मांग करें.

इसे अलगाववादी मांग बताते हुए भाजपा ने द्रमुक पर इस बात को लेकर भी निशाना साधा है कि उसने कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध किया था. भाजपा ने यह भी कहा कि द्रमुक युवा शाखा के नेता उदयनिधि स्टालिन ने एक ऐसा वीडियो जारी किया था जिसमें दिखाए गए नक्शे में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं था. पीएमके के युवा नेता अंबुमणि रामदास कहते हैं, ''अन्नाद्रमुक के (तीसरी बार) आने से लोकतंत्र को बल मिलेगा जबकि द्रमुक के आने से वंशवाद बना रहेगा. यह केवल राज्य स्तर के नेतृत्व का मामला नहीं है, बल्कि हर जिले में है.''

सवाल है कि सत्ता विरोधी भावनाओं को दूर करने के लिए क्या यह सब पर्याप्त होगा. गठबंधन के सहयोगियों का कहना है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं होगी. तमिल मानिला कांग्रेस (मूपनार) के प्रमुख जी.के. वासन कहते हैं, ''10 साल सत्ता में रहने के बावजूद अन्नाद्रमुक के प्रति सत्ता विरोधी भावनाएं बहुत कम हैं.'' बाकी लोगों का कहना है कि अन्नाद्रमुक के लिए यह बड़ी समस्या है, खासकर करीब 30 निर्वाचन क्षेत्रों में जहां उसका सामना द्रमुक और टी.टी.वी. दिनकरन के नेतृत्व वाले गुट एएमएमके (अम्मा मक्कल मुन्नेत्र कड़गम) दोनों से है.

चुनाव में मुकाबला इतना कड़ा हो चुका है कि डी. जयकुमार, एस.पी. वेलुमणि, के.ए. सेनगोत्तयियान, के.टी. राजेंद्र भालाजी और आर.बी. उदयकुमार जैसे अन्नाद्रमुक के कई वरिष्ठ मंत्री अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों में सिमटकर रह गए हैं. केवल मुख्यमंत्री पलानीस्वामी और उपमुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम ही राज्य के तमाम जिलों में प्रचार कर रहे हैं. कई निर्वाचन क्षेत्रों में अन्नाद्रमुक के काडर उन चुनाव क्षेत्रों में नहीं जा रहे हैं जहां भाजपा का उम्मीदवार है. असल में भाजपा के प्रति लोगों में आकर्षण कम है. जाहिर है, लड़ाई कठिन है और द्रमुक की चुनौती भी बड़ी है. ऐसे में अन्नाद्रमुक को कई मोर्चों पर जूझना है.

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