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उत्तराखंडः नाम बदलने की जिद

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क का नाम बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क किए जाने की कोशिश के खिलाफ आवाज उठने लगी है

बाघों की राजधानी माने जाने वाले जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में नदी पार करता बाघ बाघों की राजधानी माने जाने वाले जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में नदी पार करता बाघ

उत्तराखंड में स्थित जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के नाम को बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क करने की केंद्रीय वन और पर्यावरण राज्य मंत्री अश्विनी चौबे की जिद से प्रदेश में यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है. अश्विनी चौबे ने 10 अक्तूबर को एक बार फिर यह कहा कि उनके मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार से इस संबंध में प्रस्ताव बनाकर भेजने के लिए कहा है. उन्होंने कहा कि भारत की आजादी के बाद यही इसका नामकरण किया गया था. चौबे ने कहा, ''हम नहीं जानते कि रामगंगा से टाइगर रिजर्व का नाम कैसे बदल गया. जिम कॉर्बेट एक महान शिकारी और एक अच्छे इनसान थे. वे जो थे, उसके लिए उन्हें उचित सम्मान दिया गया है. उन्हें एक राजदूत बनाया जा सकता था, लेकिन हम निश्चित रूप से राष्ट्रीय उद्यान को रामगंगा नेशनल पार्क नाम देने के पक्ष में हैं. यह स्थानीय लोगों की इच्छा है. एक बार जब राज्य सरकार हमें प्रस्ताव भेज देगी तो हम पार्क का नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू कर देंगे.''

दरअसल, 3 अक्तूबर को चौबे ने इस पार्क के दौरे के दौरान वन अफसरों से इसके बारे में विस्तार से जानकारी ली. उनके दौरे के दौरान उत्तराखंड के वन एवं पर्यावरण मंत्री हरक सिंह रावत भी उनके साथ थे. चौबे के विचार से उलट, हरक सिंह रावत ने कहा कि जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क का नाम बदलना संभव ही नहीं है. हरक सिंह ने यह भी कहा कि वन विभाग में इसका नाम बदलने को लेकर अब तक न कोई विचार चल रहा है, न ही इसकी कोई फाइल बनी है.

जहां केंद्रीय राज्य मंत्री और उत्तराखंड के वन और पर्यावरण मंत्री इस मामले में आमने-सामने आ गए हैं, वहीं जिम कॉर्बेट पार्क के भरोसे आजीविका चलाने वाले कारोबारियों में उबाल है. वे नाम बदले जाने के खिलाफ लामबंद होने की धमकी देने लगे हैं. एक अनुमान है कि पार्क के चारों ओर दो सौ से अधिक होटल और रिजॉर्ट्स स्थित हैं. इस पार्क से प्रति वर्ष लगभग आठ से नौ करोड़ रुपए के बीच की आमदनी अकेले वन विभाग को होती है. इसके अलावा यहां के विभिन्न ईको पर्यटन क्षेत्रों के आसपास बड़ी संख्या में स्थित होटलों को भी करोड़ों रुपयों की आदमनी इस पार्क से होती है. कोविड से डर के माहौल में भी पिछले साल अक्तूबर से इस साल मार्च यानी पांच महीनों में पार्क में दो लाख से अधिक पर्यटक आए. पार्क में पर्यटन कारोबार से जुड़े ट्रैवल एजेंट दिनेश जोशी का कहना है कि कॉर्बेट का नाम एक ब्रांड बन चुका है. पार्क से लेकर सैकड़ों होटल और अन्य कारोबार कॉर्बेट के नाम से चल रहे हैं. अचानक नाम बदलने से पार्क के सामने नई पहचान बनाने का संकट आ जाएगा.

दरअसल, इस पार्क का नाम ब्रिटिश अधिकारी जिम कॉर्बेट के नाम पर पड़ा था. कॉर्बेट ने स्टेशन मास्टर की नौकरी की, सेना में अधिकारी रहे और अंत में ट्रांसपोर्ट अधिकारी भी बने. उन्होंने मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाई और संरक्षित जीवों के लिए आंदोलन प्रारंभ किया. पर्यावरणविद् और इतिहासकार डॉ. अजय रावत कहते हैं कि नाम बदला जाना जिम कॉर्बेट जैसी शख्सियत के साथ तो अन्याय होगा ही, पहाड़ के उन भोले लोगों के साथ भी अन्याय होगा, जिनमें कॉर्बेट की आत्मा बसती है.

दुनिया में कुमाऊं और पहाड़ को लोगों ने जिम कॉर्बेट की कहानियों से ही जाना है. कॉर्बेट ने लोगों के अनुरोध पर आदमखोर बाघों को मारा और ग्राम वालों की मदद को हमेशा तैयार रहते थे. साल 1907 से 1929 के वर्षों के दौरान कॉर्बेट ने दस से अधिक नरभक्षियों को मार डाला था. वे भारत से बहुत प्यार करते थे और उन्होंने किताबें भी लिखीं. कॉर्बेट ने अपने करियर के आखिरी दौर में नैनीताल जिले के एक छोटे से कस्बे कालाढूंगी में स्थायी रूप से रहना शुरू किया. यहां छोटी हल्द्वानी नामक गांव ही उन्हें वन्य जीवन की समझ देने वाला स्थान था. उसे अब पर्यटन गांव के रूप में तैयार किया गया है. देश-विदेश से लोग यहां कॉर्बेट के बारे में जानने की उत्सुकता से आते हैं.

रामनगर में सामाजिक विषयों पर सक्रिय रहने वाले पत्रकार गणेश रावत, जो भाजपा से भी जुड़े हैं, का कहना है कि आजाद भारत में साल 1956 में काफी सोच-विचार के बाद पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने कॉर्बेट के नाम पर रामगंगा राष्ट्रीय पार्क का नाम जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क करवाया था. कॉर्बेट की छवि अंग्रेज शोषकों की बजाए, मानवीय मूल्यों से भरे, स्थानीय निवासियों के हितैषी और प्रकृतिविद् शख्स के रूप में स्थापित है. कॉर्बेट नैनीताल में ही पैदा हुए और हिंदी और कुमाऊंनी बोलते थे. जब वे देश छोड़कर गए तो अपनी साढ़े तीन सौ एकड़ जमीन उन्होंने छोटी हल्द्वानी गांव के ग्रामीणों को दान दे दी थी. वे नैनीताल में पालिका सभासद रहे और उनका अंतिम संस्कार उनकी लिखी वसीयत के आधार पर हिंदू रीति रिवाज से हुआ. 

जाहिर है, नाम बदलने की इस कवायद से भारत से प्यार करने वाले जिम कॉर्बेट की ख्याति तो कम नहीं की जा सकेगी, लेकिन अनावश्यक विवाद जरूर पैदा हो गया है.

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