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जांच में फर्जीवाड़ा?

बचाव में पुलिस कहती है कि 750 एफआइआर और 200 चार्जशीट दाखिल होने के साथ 1,430 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं

बंदीप सिंह बंदीप सिंह

दिल्ली में इस साल फरवरी में हुए दंगों की जांच ने इस सप्ताह नया मोड़ ले लिया जब दिल्ली सरकार और दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की तथ्यान्वेषी रिपोर्ट, में दिल्ली पुलिस पर जांच में 'पक्षपात' और हिंसा में 'लिप्तता' का आरोप लगाया. रिपोर्ट को नौ सदस्यों के पैनल ने तैयार किया है जिसका नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.आर. शमशाद कर रहे थे. यह दंगों पर अधिकृत किसी एजेंसी की पहली रिपोर्ट है. दंगों में तीन दिनों में 53 लोगों की जानें गई थीं और करोड़ों रुपए की संपत्ति का नुक्सान हुआ था. शमशाद का कहना है, ''यह कानून व व्यवस्था को कायम रखने वाली मशीनरी की नाकामी का सुबूत है. जांच को जानबूझकर गलत दिशा दी गई है ताकि हिंसा के कारणों का समूचा कथानक बदल दिया जाए.''

इस बीच, 28 जुलाई को आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार ने दंगों के मामलों की सुनवाई के लिए पुलिस की ओर से प्रस्तावित वकीलों के नामों को खारिज कर दिया. इसका मतलब यह है कि राज्य सरकार की उपराज्यपाल अनिल बैजल के साथ फिर भिडं़त होगी. सरकारी बयान में जिन बातों पर जोर दिया गया है उनमें ''पक्षपात के आरोप'' के अलावा दिल्ली हाइकोर्ट में जस्टिस सुरेश मेहता की टिप्पणी भी शामिल है कि ''दिल्ली पुलिस दंगों के मामलों में कानून-व्यवस्था को ठेंगे पर लेकर चल रही है.''

अदालतों ने भी जांच पर आलोचनात्मक टिप्पणियां की हैं. 24 जुलाई को, दिल्ली की एक कोर्ट ने पुलिस की ''रहस्यमय निष्क्रियता की स्थिति'' का संज्ञान लिया और उससे अनुरोध किया कि वह मामले में निष्पक्ष जांच को सुनिश्चित करे. जज धर्मेंद्र राणा ने यह अनुरोध करते हुए भी पिंजड़ा तोड़ कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों की न्यायिक हिरासत की अवधि को 14 अगस्त तक बढ़ा दिया. दिसंबर 2019 में शुरू हुए देशव्यापी सीएए (नागरिकता [संशोधन] अधिनियम) विरोधी प्रदर्शनों का केंद्र शाहीन बाग बन गया था और दिल्ली पुलिस का कहना है कि इसी की परिणति दिल्ली में दंगों में हुई.

दंगों के एक ही दिन बाद 27 फरवरी को दिल्ली हाइकोर्ट ने भड़काऊ भाषण देने वालों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने का निर्देश दिया था. कोर्ट ने पूर्व विधायक कपिल मिश्रा और भाजपा सांसदों अनुराग ठाकुर तथा प्रवेश सिंह वर्मा के भाषणों की ऑडियो क्लिप भी सुनी. महीनों बीत गए और फिर 13 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने हाइकोर्ट को बताया कि ''अभी तक ऐसा साक्ष्य सामने नहीं आया है जिससे किसी प्रमुख राजनैतिक नेता के दंगे भड़काने या उनमें हिस्सा लेने का कोई भी संकेत मिलता हो. '' पुलिस ने कोर्ट को बताया कि अभी तक ''किसी पुलिस अधिकारी की भागीदारी की बात भी'' सामने नहीं आई है.

पुलिस आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि इन मामलों में करीब 750 एफआइआर दर्ज की गई हैं, 200 चार्जशीट दाखिल की गई हैं और 1,430 लोगों को गिरफ्तार किया गया है (11 जुलाई तक). दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एम.एस. रंधावा ने इंडिया टुडे को बताया कि ''जांच का काम चल रहा है और किसी भी समुदाय के साथ भेदभाव का कोई सवाल ही नहीं उठता है. हमने दोनों समुदायों की तरफ से दायर की गई शिकायतों के आधार पर मामले दर्ज किए हैं.''

आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह का कहना है कि दंगे ''जान-बूझकर'' फैलाए गए थे और ''गहरी साजिश का हिस्सा'' थे. संजय सिंह ने 19 जुलाई को पत्रकारों को कहा, ''मैं पहले दिन से यह बात कह रहा हूं. यही बात मैंने संसद में भी कही है—भाजपा ने ही दंगे करवाए थे.'' मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का रुख इसमें कूटनीतिपूर्ण रहा है. वे कहते हैं, ''अगर जांच में कोई पक्षपात हुआ है तो वह गलत है. दोषी पाए जाने वाले सभी व्यक्तियों को सजा मिलनी चाहिए.''

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