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वाह! ताज के इंतजार में ताज महल

जो इमारत पूरी दुनिया में इतिहास और स्थापत्य की महान धरोहर मानी जाती है, अपने ही देश में उसकी बेकद्री  हो रही है. बचाने की बजाए नेता और अधिकारी एक-दूसरे के सिर फोड़ रहे हैं जिम्मेदारी का ठीकरा

अगर आप बेमिसाल ताज महल के संगमरमरी हुस्न के दीदार की हसरत लिए आगरा पधारे हैं तो जरा रूमाल निकाल लीजिए. सबसे ज्यादा भीड़भाड़ वाले ताजमहल के पश्चिमी गेट के सामने मौजूद वीरांगना झलकारीबाई चौराहा पहुंचते ही यहां फैली दुर्गंध आपको नाक बंद करने को मजबूर कर देगी. इस चौराहे के बगल से ही शहर भर की गंदगी बटोरे 'नाला मंटोला' अचानक यमुना नदी में समाने के लिए प्रकट होता है. यहां आपकी पहली कोशिश यही होगी कि जितनी जल्दी हो सके, इस जगह से चले जाएं. इसी चौराहे के सामने डूबते सूरज की रोशनी में ताज को निहारने के लिए बना और बदहाल पड़ा 'सनसेट प्वाइंट' भी है. आलम ये है कि भीषण बदबूदार माहौल में पर्यटक चंद मिनट भी यहां खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाता. यही विडंबना है. विश्व की धरोहर ताज महल जहां अपने सौंदर्य से पूरे विश्व में ख्यात है, वहीं इसके अगल-बगल बह रहे गंदे नाले माहौल में दुर्गंध भर रहे हैं. 17वीं शताब्दि में मुगल बादशाह शाहजहां को अपनी बेगम मुमताज महल की याद में मुगल वास्तुकला के इस अनोखे स्मारक को बनवाने में 22 साल लगे थे, लेकिन विश्व धरोहर का दर्जा पाने के 32 साल बाद भी ताज महल अपनी दुर्दशा के दूर होने का सिर्फ इंतजार ही कर रहा है.

ताज महल की इसी दुर्दशा से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस कुरियन जोसेफ भी रू-ब-रू हुए, जब सितंबर में वे अपने परिवार के साथ यहां पहुंचे थे. जस्टिस जोसेफ ने यमुना किनारे ताज महल के बगल में स्थित श्मशान घाट से उठने वाले धुंए से नुकसान की आशंका जताते हुए एक अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र भी लिखा. न्यायाधीश के पत्र का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने श्मशान घाट को दूसरी जगह स्थानांतरित करने के लिए 16 नवंबर को यूपी सरकार से जवाब मांगा है.

इससे पहले 11 अप्रैल की सुबह पौने दस बजे ताज महल पहुंची संसद की पर्यावरण संबंधी स्थाई समिति भी ताजमहल की बदहाली देखकर चौंक गई थी. समिति के अध्यक्ष अश्वनी कुमार प्रदूषण की वजह से ताजमहल की मीनारों के काले पड़े छज्जों, धुंधली होती गलियारे की दीवारों, उन पर जमी धूल और जालों को देखकर दंग रह गए थे. कुमार कहते हैं, ''ताज का रख-रखाव और संरक्षण जिस तरह का होना चाहिए, वैसा नहीं है. इसमें सुधार की जरूरत है. ताज को प्रदूषण से बचाने के लिए सतत कदम उठाने होंगे."

1983 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल होने के अगले ही साल ताजमहल की दुर्दशा का मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया था. इसके बाद सरकारें कुछ चेतीं. इन 30 वर्षों से ज्यादा के समय के दौरान ताज महल के संरक्षण की कई योजनाएं बनीं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ), ताज ट्रिपेजियम जोन प्राधिकरण, राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण, यमुना एक्शन प्लान, जवाहर लाल नेहरू अरबन रीन्यूवल मिशन (जेएनएनयूआरएम) जैसी संस्थाएं ताज महल को संवारने की मशक्कत करती रहीं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा.

भ्रष्टाचार ने बिगाड़े हालात

ताज महल के आसपास का इलाका संवारने के लिए शुरू किए गए ताजगंज प्रोजेक्ट को लेकर 16 नवंबर को की गई सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर जरा गौर करें. ''चार सौ साल पहले हाथों से छेनी हथौड़ी के जरिए ताज महल बनाया गया और यूपी सरकार से इस आधुनिक जमाने में एक सड़क भी नहीं बन रही. इंजीनियरों और ठेकेदारों ने सड़क बनाने में इतनी गड़बड़ी फैला रखी है." यही विडंबना है. खूबसूरती के लिए प्रसिद्घ ताज महल के आसपास का इलाका सरकारी भ्रष्टाचार के आरोपों से ज्यादा प्रसिद्घि पा रहा है. पिछली बीएसपी सरकार में ताज कॉरिडोर प्रोजेक्ट के बाद अब सपा सरकार का महत्वाकांक्षी ताज गंज प्रोजेक्ट विवादों में घिर गया है. ताज महल की ओर जाने वाले रास्तों को विश्वस्तरीय और खूबसूरत बनाने के लिए दिसंबर, 2013 में 137 करोड़ रु. की लागत से शुरू हुए ताज गंज प्रोजेक्ट से जैसे ही सरकार की एक चहेती कंसल्टेंट कंपनी जुड़ी तो योजना की लागत 197 करोड़ रु. पहुंच गई. कंसल्टेंट कंपनी के सुझाव पर ताज महल तक जाने वाली सड़कों पर ग्रेनाइट के पत्थर लगाए जाने हैं. इसकी अनुमति लेने सुप्रीम कोर्ट पहुंची यूपी सरकार को डांट खानी पड़ी. कोर्ट ने अब एएसआइ से इस बारे में रिपोर्ट मांगी है. सवाल कास्ट आयरन की जगह पत्थर के लैंपपोस्ट लगाने पर भी उठ रहे हैं. ताज गंज प्रोजेक्ट में आठ करोड़ रु. की लागत से कुल 266 लैंपपोस्ट लगेंगे. कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली के चौराहों पर बनाए गए ज्यादातर स्टोन ट्रैफिक पोस्ट अब जमीदोंज हो चुके हैं. ऐसे में ताज गंज प्रोजेक्ट में महंगे स्टोन लैंपपोस्ट के जीवन पर भी संशय बना हुआ है.

राज बना ताज का पीलापन

1980 में हुए एक सर्वे में पहली बार ताज महल के पीले पडऩे की बात सामने आई थी. इसमें कहा गया था कि आगरा और आसपास के इलाकों के वायुमंडल में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड के कारण ताजमहल पीला पड़ रहा है. इस संबंध में 1984 में सुप्रीम कोर्ट में ताज महल के संरक्षण के लिए याचिका दायर हुई. सुप्रीम कोर्ट ने 'नेशनल इंजीनियरिंग ऐंड एनवायरमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट' (नीरी) को एक कमेटी बनाकर रिपोर्ट पेश करने को कहा. नीरी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि वायुमंडल में धूल और कार्बन के तैरते हुए कण (एसपीएम) संगमरमर (कैल्शियम कार्बोनेट) पर इकट्ठा होकर ताज महल को पीला कर रहे हैं. 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने ताज की सुंदर इमारत में कई जगह पीलापन, भूरे और काले धब्बे पाए जाने के पीछे वायु प्रदूषण को ही जिम्मेदार ठहराया था.

बढ़ते प्रदूषण से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट से निर्देश मिलने के बाद आगरा में ताज महल के आसपास सौ से ज्यादा छोटे-बड़े उद्योगों को बंद कर दिया गया था. बावजूद इसके ताज महल के पीलेपन में कोई कमी नहीं आई है. इससे साफ है कि या तो न्यायालय के आदेश का पालन नहीं हुआ या फिर ताज के पीले पडऩे के पीछे वजह कुछ और है. ताज संरक्षण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखने वाले आगरा छावनी के पूर्व विधायक इंजीनियर केशो मेहरा कहते हैं, ''प्रत्येक शुक्रवार जब ताजमहल सार्वजनिक रूप से जनता के लिए बंद रहता है, उस वक्त इसे शुद्घ जल की हल्की बौछारों से धोया जाए. इससे इस पर जमे धूल और कार्बन के कण हट जाएंगे." हालांकि एएसआइ ने अब एक नया प्रयोग करते हुए ताज महल पर चरणबद्घ ढंग से मुल्तानी मिट्टी के लेप के जरिए धूल और कार्बन के कण हटाने की कार्रवाई शुरू की है.

बेअसर हुआ टीटीजेड

ताज महल को वायु प्रदूषण के कुप्रभाव से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में ताज ट्रिपेजियम जोन (टीटीजेड) में विभिन्न विकास योजनाओं की जद में आए पेड़ों की एवज में 2,58,208 पौधे लगाने का आदेश दिया था. ये पौधे 10,400 वर्ग किमी में फैले ताज ट्रिपेजियम जोन में लगाए जाने थे. इस जोन में आगरा, मथुरा, हाथरस, अलीगढ़, फिरोजाबाद और कासगंज का 860 हेक्टेयर क्षेत्र आ रहा था. 27 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में पेश राज्य सरकार का हलफनामा अपने आप में अदालती आदेशों के उल्लंघन की गाथा है. इसके मुताबिक पिछले 19 साल के दौरान टीटीजेड के 28 हेक्टेयर भूभाग पर 5,524 पौधे ही लगाए जा सके हैं. यह निर्धारित लक्ष्य का महज 2.1 फीसदी ही है.

वृक्षारोपण अभियान को सही ढंग से न चला पाने के कारण सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगते हुए अगले साल अगस्त तक कुल 5.28 लाख पौधे लगाने का वादा किया है. सुप्रीम कोर्ट अनुश्रवण समिति के सदस्य डी.के. जोशी कहते हैं, ''ताज को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए टीटीजेड बनाया गया था. मगर ताज को महफूज रखने के लिए सारी योजनाएं विफल हो गई हैं. सीबीआइ से इसकी जांच होनी चाहिए."

जोशी ने ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को ताज महल के पूर्वी हिस्से में यमुना में गिरने वाले नाले से निकलने वाली भीषण गंदगी की फोटो भेजकर प्रदूषण नियंत्रण रोकथाम की पोल खोल दी. 16 को एनजीटी की नाराजगी के बाद आगरा नगर निगम के अधिकारी कुछ हरकत में आए, लेकिन हालात आज भी बदतर ही हैं. ताज महल के पीछे गंदगी और कूड़े का लगा हुआ अंबार सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी को ठेंगा दिखा रहा है. आगरा में कुल 41 नाले हैं, लेकिन अब तक केवल 21 ही टैप किए गए हैं. बाकी शहर भर की गंदगी लेकर यमुना में समा रहे हैं. इंडिया टुडे के पास मौजूद जल निगम की रिपोर्ट खुद ही विभागीय कारस्तानी की पोल खोल देती है. जल निगम के महाप्रबंधक के मुताबिक, ''वर्तमान में नाले टैप्ड हैं परंतु डिस्चार्ज बढ़ जाने पर ओवरक्रलो हो जाते हैं." साफ है कि नाले यमुना को गंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे, जो ताज के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होंगे.

 

एएसआइ पर उठ रहे सवाल

ताज महल के संरक्षण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) कितना गंभीर है, यह इसी बात से जाहिर हो जाता है कि आगरा सर्किल में सुपरिटेंडेंट के सहयोग के लिए डिप्टी सुपरिटेंडेंट के दोनों पद खाली पड़े हैं. इतना ही नहीं, निर्धारित से 30 फीसदी कम कर्मचारियों के बूते पूरे ताज महल के संरक्षण का दम एएसआइ भर रहा है. इसी खोखले तंत्र ने ताज महल की रंगत उड़ा दी है. (देखें बॉक्स)

छह मई की सुबह साढ़े पांच बजे ताज पूर्वी गेट पर सरहिंदी बेगम के मकबरे के छज्जों में लगा पत्थर टूटकर सैलानियों के लिए बने शेड को चीरता हुआ जमीन पर आ गिरा. गनीमत थी कि सूर्योदय से पहले कोई पर्यटक नहीं था वरना बड़ी अनहोनी भी हो सकती थी. इसके बाद तीन जून को ताज के रॉयल गेट पर कैलीग्राफी के किनारे लगे बॉर्डर के पत्थर टूटकर गिरने से ही अफरातफरी मच गई थी. डी.के. जोशी कहते हैं, ''सरकार ने ताज महल को कमर्शियल बिल्डिंग समझ लिया है. इनका पूरा ध्यान कमाई पर है, न कि संरक्षण पर. अनदेखी से ताज के पत्थर टूट-टूट कर गिर रहे हैं." वहीं दूसरी ओर एएसआइ पर उठने वाले सवालों का बखूबी बचाव ताज महल के संरक्षण का जिम्मा उठाने वाले आगरा सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. भुवन विक्रम करते हैं. वे कहते हैं, ''ताज महल के संरक्षण के लिए हर संभव प्रयास किया जा रहा है. रोज के तापमान में उतार-चढ़ाव से पत्थर ढीले हुए हैं. टूटने वाले पत्थरों की तुरंत मरक्वमत की जा रही है."

 घट रहे विदेशी पर्यटक

विडंबना यह है कि एक ओर जहां प्रदेश में विदेशी पर्यटक बढ़े हैं, वहीं यूपी के सबसे बड़े दर्शनीय स्थल ताज महल के दीदार के लिए विदेश से आने वाले सैलानियों की संख्या लगातार घट रही है. 2012 में करीब आठ लाख विदेशी पर्यटक ताजमहल को देखने पहुंचे थे. वहीं दो साल बाद 2014 में इनकी संख्या घटकर साढ़े छह लाख ही रह गई. इस साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि अब तक पिछले साल की तुलना में दस फीसदी कम विदेशी पर्यटक ताज के दीदार को पहुंचे हैं. (देखें चार्ट)

आगरा के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में पर्यटन एवं होटल संस्थान के निदेशक डॉ. लवकुश मिश्र कहते हैं, ''दूसरे प्रदेशों ने जिस तरह अपने पर्यटक स्थलों की ब्रांडिंग की है, वैसी सरकार ने ताज महल की ब्रांडिंग नहीं की है. शायद यही वजह है कि विदेशी युवा पर्यटकों के बीच ताज धीरे-धीरे अपना आकर्षण खो रहा है."

हेरिटेज आर्क, गोल्डन ट्राएंगल के पर्यटन स्थलों में शामिल ताज का प्रचार करने के बाद भी बुनियादी सुविधाओं में कमी और बेहद महंगे टिकट को भी पर्यटकों की घटती संख्या के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है. आगरा टूरिस्ट वेलफेयर चेंबर के अध्यक्ष प्रहलाद कुमार अग्रवाल कहते हैं, ''विदेशी पर्यटकों के मनोरंजन के लिए 'नाइट विजन' जैसी कोई व्यवस्था ताज महल में नहीं है." इसके अलावा आगरा में बढ़ती जाम की समस्या ने भी विदेशी पर्यटकों के बीच मुहब्बत के इस स्मारक की चमक को फीका किया है. हालांकि पर्यटन विभाग के एक बड़े अधिकारी टिकटों की रीसेलिंग को भी विदेशी पर्यटकों के आंकड़े घटने का कारण बताते हैं.

विश्व के लिए ताजमहल भारत की अमूल्य ऐतिहासिक विरासत है, लेकिन खुद भारत में ही यह विरासत उपेक्षित पड़ी है. दुनिया को दीवाना बनाने वाले मुहब्बत के इस स्मारक को लेकर राजनीतिक खींचतान ही जारी है. यह मुगलिया तामीर की मिसाल है या फिर प्राचीन शिव मंदिर. लोग इसी में उलझे हैं और ताज महल को एक बार फिर इंतजार है अपने 'शाहजहां' का.

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