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उत्तर प्रदेशः कोविड प्रभावित गांव हैं चुनाव की समरभूमि

इस बात को ध्यान में रखते हुए योगी ने नवनिर्वाचित ग्राम प्रधानों के साथ वर्चुअल मीटिंग की कि 2022 के विभानसभा चुनावों में उनका समर्थन अहम साबित होगा

समीक्षा इटावा जिले में 22 मई को कोविड तैयारियों की समीक्षा के दौरान स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से बातचीत करते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समीक्षा इटावा जिले में 22 मई को कोविड तैयारियों की समीक्षा के दौरान स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से बातचीत करते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

मई की 22 तारीख को, समाजवादी पार्टी (सपा) के संरक्षक मुलायम सिंह यादव के पैतृक गांव सैफई का पहली बार किसी गैर-सपाई मुख्यमंत्री ने दौरा किया. दरअसल, उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, इटावा जिले के सैफई में स्थित उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं. सैफई विश्वविद्यालय के 200 बिस्तरों वाले एल-3 कोविड अस्पताल और सैफई ब्लॉक के गीजा गांव में कोविड को लेकर सरकारी तैयारियों का निरीक्षण करने के बहाने, योगी का गांव का यह दौरा एक सुविचारित कदम था.

सैफई गांव मुलायम सिंह के संसदीय क्षेत्र मैनपुरी का हिस्सा होने के साथ-साथ जसवंत नगर विधानसभा क्षेत्र का भी हिस्सा है जिसका प्रतिनिधित्व उनके भाई और सपा के बागी नेता शिवपाल सिंह यादव करते हैं. तो, सैफई एक तरह से इटावा और आसपास के कई जिलों में सपा की राजनीति का केंद्र बिंदु है. साल 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में इटावा संसदीय क्षेत्र में जीत हासिल करने वाली भाजपा का, इस साल अप्रैल में हुए पंचायत चुनाव में प्रदर्शन काफी खराब रहा. सत्ताधारी दल, इटावा की जिला पंचायत की 24 सीटों में से केवल एक ही जीत सका. सपा और शिवपाल सिंह यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) ने एक साथ चुनाव लड़ा और इटावा की 24 में से 20 सीटों पर जीत हासिल की.

पंचायत चुनाव के नतीजों ने भाजपा में खतरे की घंटी बजा दी है. योगी पिछले चार साल में दो बार इटावा आए थे, लेकिन उन्होंने जान-बूझकर सैफई जाने से परहेज किया था. उनके इस दौरे को पंचायत चुनाव में हार के बाद अपनी खोई जमीन को वापस पाने का एक प्रयास माना गया. योगी ने सैफई विश्वविद्यालय में ऑक्सीजन संयंत्र का काम दो सप्ताह में पूरा करने का आदेश दिया और अधिकारियों को क्षेत्र में कोविड पीड़ितों का पता लगाने और गांवों में निगरानी समितियों के माध्यम से उन्हें तत्काल उपचार प्रदान करने के लिए कहा. यूपी के करीब 89,512 गांवों में अब सक्रिय निगरानी समितियां हैं. उनके प्रयासों से 28,742 गांवों में कोविड के मरीज पाए गए हैं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि यूपी के एक-तिहाई गांव कोविड वायरस से प्रभावित हुए हैं.  

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) सेंटर फॉर कम्परेटिव लिटरेचर में पढ़ाने वाले प्रो. जसीम मोहम्मद कहते हैं, ''2022 के विधानसभा चुनाव में अब आठ महीने से भी कम समय बचा है. उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार गांवों में कोविड के प्रसार को रोकने में पूरी तरह असफल साबित हुई है. पंचायत चुनावों में भाजपा के बेहद खराब प्रदर्शन की वजह यही रही. आदित्यनाथ अब डैमेज कंट्रोल मोड में हैं, इसलिए वे गांव-गांव जा रहे हैं.''

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने इसका खंडन करते हुए कहा, ''पंचायत चुनाव में भाजपा के खराब प्रदर्शन की बातें पूरी तरह से निराधार हैं. 2015 में, हमने केवल 200 जिला पंचायत सदस्य सीटें जीतीं थीं; इस बार हमने 954 सीटें जीती हैं. गांवों में भाजपा का जनाधार और मजबूत हुआ है.''

पंचायत चुनाव खत्म होने के बाद गांवों में कोविड के मामले तेजी से बढऩे लगे. मई के पहले सप्ताह में यूपी में हर दिन 25,000 से अधिक कोविड के नए मामले देखे गए. योगी ने 8 मई को मुरादाबाद दौरे के बाद जिलों में अपने दौरे शुरू किए. मुख्यमंत्री 31 मई तक यूपी के सभी 18 संभागों के 50 जिलों का दौरा कर चुके थे. वे हर जिले में कम-से-कम एक गांव का दौरा करते हैं और स्वास्थ्य सुविधाओं पर मरीजों से फीडबैक भी लेते हैं.

जय नारायण पीजी कॉलेज, लखनऊ में राजनीति विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर बृजेश मिश्र योगी के दौरों को संदर्भ में रखते हुए संख्याओं की व्याख्या करते हैं. मिश्र कहते हैं, ''यूपी की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी गांवों में रहती है. अनुपात में देखा जाए तो राज्य की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 250 से ज्यादा सीटों पर ग्रामीण मतदाता निर्णायक हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 312 सीटें जीती थीं, लेकिन पंचायत चुनावों में उसका खराब प्रदर्शन गांवों में पार्टी की पकड़ के कमजोर होने का संकेत देता है. यही कारण है कि विपक्षी दलों को गांवों में अपना आधार बढ़ता दिख रहा है.''

पंचायत चुनाव आमतौर पर पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नहीं लड़े जाते, इसलिए पार्टियां चुनाव परिणामों को लेकर तरह-तरह के दावे कर रही हैं. लेकिन इस साल पहली बार राजनैतिक दलों ने यूपी की 3,051 जिला पंचायत सदस्य सीटों पर चुनाव लड़ा. भाजपा और सपा, दोनों पार्टियां अब दावा कर रही हैं कि उन्होंने 900 से ज्यादा जिला पंचायत सदस्य सीटें जीती हैं. बसपा का कहना है कि उसने 500 सीटों पर कब्जा किया है, जबकि कांग्रेस का 200 से अधिक सीटों पर जीत का दावा है. अगर इन पार्टियों के दावों को ही सही मानकर चलें तो भाजपा जिला पंचायत सदस्यों की कुल सीटों में से एक तिहाई भी नहीं जीत पाई है.

डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ में इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर सुशील पांडे ने यूपी की जाति की राजनीति पर शोध किया है. वे कहते हैं, ''2017 के विधानसभा चुनाव में, भाजपा को गांवों में कुर्मी, निषाद, बिंद, विश्वकर्मा, कश्यप, कुशवाहा और भुरजी जैसी कई पिछड़ी जातियों का समर्थन मिला था. सामूहिक रूप से, ये जातियां उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या का 10 प्रतिशत से अधिक हैं. ये गरीब पिछड़ी जातियां कोविड संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान गांवों में मची अफरा-तफरी के कारण भाजपा से नाराज हैं. इन जातियों का समर्थन हासिल करने के लिए विपक्षी दल, गांवों में कोविड पीड़ितों की मदद के लिए डेरा डाले हुए हैं.''

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी के युवा नेताओं के साथ समाजवादी पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ को यह जिम्मेदारी सौंपी है. अखिलेश ने अगस्त 2020 में युवा नेता और एमएलसी राजपाल कश्यप (जो पिछड़ी निषाद जाति के हैं) को समाजवादी पिछड़ा प्रकोष्ठ का प्रदेश अध्यक्ष बनाया था. यह कोविड की पहली लहर के संक्रमण काल के दौरान हुआ था.

कश्यप ने पहली बार सपा पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ की प्रदेश से लेकर ब्लॉक स्तर तक, कार्यकारिणी समितियों का गठन किया जो अब पार्टी के लिए सक्रिय रूप से काम करने लगी हैं. कश्यप कहते हैं, ''हम 21 सदस्यीय कार्यकारी समिति के माध्यम से गांवों में कोविड पीड़ितों की पहचान करने और ब्लॉक स्तर पर तुरंत उपचार प्रदान करने में सक्षम हुए हैं. कार्यकारिणी के प्रत्येक नेता को 20-25 गांवों की जिम्मेदारी दी गई है. वे कोविड पीड़ितों की जानकारी लेने और उनकी पहचान करने के लिए नियमित रूप से अपने निर्धारित गांवों के दौरे कर रहे हैं.''

सपा नेता 'समाजवादी किचन' भी चला रहे हैं, जो कोविड मरीजों और पृथकवास (आइसोलेशन) में रह रहे लोगों के परिवारों को खाना मुहैया कराता है. इसके अलावा पिछड़े प्रकोष्ठ के नेताओं ने कोविड मरीजों को आवश्यक दवाओं से युक्त आइसोलेशन किट बांटी है. पार्टी ने दूरदराज के गांवों में गंभीर रूप से बीमार कोविड मरीजों को जिला कोविड अस्पतालों तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस की भी व्यवस्था की है. मेरठ में सपा के जिलाध्यक्ष राजपाल सिंह ने मई में खुद गांवों के 100 से अधिक कोविड रोगियों को शहर के एल-2 कोविड अस्पतालों (अधिक गंभीर मामलों के लिए) में भर्ती कराया है. कश्यप कहते हैं, ''सपा हर गांव में जरूरतमंदों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. हम कोविड से प्रभावित लोगों को भोजन और दवाएं उपलब्ध कराने के अलावा बच्चों को किताबें भी उपलब्ध करा रहे हैं.''

अब गांवों में विपक्षी दलों की बढ़ती सक्रियता से निबटने के लिए योगी सरकार ने भी आपनी ताकत झोंक दी है. मुख्यमंत्री योगी ने सभी जिलों के जिलाधि‍कारियों को गांवों में 'मेरा गांव-कोरोना मुक्त गांव' अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं. इसमें कोरोना नियंत्रण को लेकर सबसे अच्छा काम करने वाले तीन गांवों को पुरस्कार दिया जाएगा. इसके अलावा इन गांवों को सरकार की तरफ से विकास के लिए अतिरिक्त धनराशि‍ भी मुहैया कराई जाएगी. योगी ने सभी भाजपा विधायकों से गांव के अस्पतालों को भी गोद लेकर वहां चिकित्सकीय सुविधाएं मुहैया कराने की अपील की है.

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में यूपी की 59,000 ग्राम पंचायतों में नवनिर्वाचित प्रधानों का समर्थन महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. मेरठ कॉलेज के अर्थशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और यूपी की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरी जानकारी रखने वाले मनोज सिवाच कहते हैं, ''हर गांव में, नवनिर्वाचित ग्राम प्रधानों के पास बड़ी संख्या में उनके समर्थक होंगे. ऐसे में इन प्रधानों का समर्थन पार्टियों के लिए गांवों में अपनी स्थिति मजबूत करने में काफी मददगार साबित हो सकता है.'' इसे ध्यान में रखते हुए, योगी आदित्यनाथ ने 28 मई को नवनिर्वाचित प्रधानों के साथ एक वर्चुअल मीटिंग की, जिसमें उन्होंने अन्य बातों के अलावा गांवों में मुफ्त राशन वितरण पर चर्चा की.

योगी की वर्चुअल मीटिंग से दो दिन पहले 26 मई को कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव और यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी ने प्रदेश के सभी नए ग्राम प्रधानों को पत्र लिखकर चुनाव जीतने पर बधाई दी और उनसे अपील की कि कोविड के खिलाफ इस युद्ध को एकजुट होकर लड़ने के लिए कांग्रेस के साथ आएं. पार्टी ने गांवों में कोविड-देखभाल सहायता प्रदान करने के लिए 'सेवा सत्याग्रह' कार्यक्रम भी शुरू किया है. अभियान के तहत, प्रियंका ने 10 लाख होम आइसोलेशन किट की व्यवस्था की है, जो मुख्य रूप से यूपी के गांवों में वितरित की जाएंगी. 26 मई को कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने लखनऊ में कांग्रेस मुख्यालय से आइसोलेशन किट वाले वाहनों को जिलों में भेजा.

पार्टी प्रवक्ता प्रियंका गुप्ता कहती हैं, ''अप्रैल में जैसे ही कोविड संक्रमण बढ़ने लगा, हमने लखनऊ स्थित राज्य मुख्यालय के अलावा सभी जिलों में कोविड हेल्प डेस्क शुरू कर दिए थे. इसके जरिए कोविड पीड़ितों की हर संभव मदद की जा रही है.'' कांग्रेस ने यूपी में सेवा सत्याग्रह के तहत 'मेरा गांव, मेरा अभियान' कार्यक्रम भी शुरू किया है. लल्लू बताते हैं, ''इसके तहत राज्य के सभी गांवों में सेनिटाइजेशन का काम शुरू कर दिया गया है. पार्टी ने इसके लिए 15 लाख लीटर सैनिटाइजर की व्यवस्था की है. गांवों में भी सैनिटाइजर टैंक भेजे जा रहे हैं. गांवों में होम आइसोलेशन में रह रहे कोविड पीड़ितों के लिए कांग्रेस के पदाधिकारी भी दवाओं का इंतजाम कर रहे हैं. यह पंचायत स्तर पर पार्टी समितियों के माध्यम से किया जा रहा है.''

ग्रामीण वोट
ग्रामीण वोट

यूपी के गांवों में कोरोना से हुई मौतों के आंकड़े सार्वजनिक नहीं करने के लिए कांग्रेस, भाजपा सरकार पर आरोप लगा रही है. पार्टी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद की अध्यक्षता में इसके लिए एक सात सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमिटी का गठन किया है. कमिटी एक महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट देगी. हालांकि भाजपा, कांग्रेस के इन कदमों को दिखावा बताती है. स्वतंत्र देव सिंह कहते हैं, ''मई के पहले सप्ताह में यूपी में कोविड संक्रमण दर 10 फीसद से ज्यादा थी, अब एक फीसद से भी कम है. ऐसा इसलिए है क्योंकि योगी सरकार ने त्वरित कदम उठाए; हमने अपनी 72,000 निगरानी समितियों के 4,00,000 सदस्यों को स्क्रीनिंग करने के लिए गांवों और कस्बों में घर-घर भेजा.''

जाहिर है, हर पार्टी को इस बात का एहसास है कि यूपी के गांव ही विधानसभा के लिए आगामी चुनावी समर के केंद्र बिंदु होंगे. गांव जिनके साथ खड़े हो जाएंगे, उसके लिए लखनऊ की राह आसान हो जाएगी.

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