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महाराष्ट्रः शुरू हुई कांग्रेस की नखरेबाजी

मुंबई में खुद को महत्वपूर्ण बनाए रखने को कांग्रेस के लिए बीएमसी का चुनाव मारने-मरने की लड़ाई होगी. उसने 1997 में नगर निगम का चुनाव शिवसेना के हाथों गवां दिया था

मजबूरी का मेल मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे एनसीपी नेता शरद पवार (बाएं) और कांग्रेस के बालासाहेब थोरात के साथ गठबंधन सरकार की शुरुआत के मौके पर मजबूरी का मेल मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे एनसीपी नेता शरद पवार (बाएं) और कांग्रेस के बालासाहेब थोरात के साथ गठबंधन सरकार की शुरुआत के मौके पर

कांग्रेस ने 28 दिसंबर को अपने 136वें स्थापना दिवस पर महाराष्ट्र में एकाएक आक्रामक रुख दिखाते हुए अपने गठबंधन के घटक दल शिवसेना को साफ शब्दों में चेतावनी दी कि महाविकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार के स्थायित्व का जिम्मा कांग्रेस पर ही नहीं है. इसके दो प्रमुख नेताओं—लोक निर्माण कार्य मंत्री अशोक चव्हाण और प्रचार समिति के अध्यक्ष नसीम खान—ने शिवसेना से कहा कि वह उसके आंतरिक मामलों में दखलअंदाजी न करे. तीन दिन बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बालासाहेब थोरात ने औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजी नगर किए जाने के प्रस्ताव की आलोचना की, यह भी कहा कि उसे अन्य पार्टी की राजनीति में नहीं घसीटा जाना चाहिए.

कांग्रेस नेताओं ने समय के गुणा-गणित के हिसाब से यह गुस्सा जताया है. महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव फरवरी में होने हैं, इसलिए पार्टी के लिए यह सही समय है कि वह धीरे-धीरे घटती अपनी हैसियत को फिर से उठाने की कोशिश करे. चव्हाण ने कहा कि वे शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत की ओर से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्यक्ष शरद पवार को युनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) का अध्यक्ष बनाए जाने का समर्थन किए जाने से नाराज हैं. यह पद कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास है. पर नाराजगी की असल वजह यह है कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे लोक निर्माण विभाग की पूरी तरह उपेक्षा करते आ रहे हैं. चव्हाण मराठों के आरक्षण के लिए बनी कैबिनेट की एक उप-समिति के भी प्रमुख हैं. उन्हें लगता है कि उन्हें जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट में इस कदम का बचाव करने में राज्य की विफलता के लिए बलि का बकरा बनाया जा रहा है.

इस तरह खफा होने वाले चव्हाण कांग्रेस के अकेले मंत्री नहीं हैं. राजस्व मंत्री थोरात, बिजली मंत्री नितिन राउत, जनजाति कल्याण मंत्री के.सी. पडवी और ओबीसी विकास मंत्री विजय वाडेट्टिवार भी नाराज चल रहे हैं. उनकी शिकायत उनके विभागों में पैसा न होने की है. यह भी कि शिवसेना और एनसीपी परोक्ष रूप से उन्हें असफल मंत्री के तौर पर पेश करना चाहते हैं.

असंतोष को भांपते हुए सोनिया गांधी ने उनकी शिकायतों को आवाज देने के लिए कदम उठाया है. 14 दिसंबर को मुख्यमंत्री ठाकरे को पत्र लिखकर उन्होंने एमवीए के साझा न्यूनतम कार्यक्रम की याद दिलाई और मांग की कि सरकार दलितों और आदिवासियों के कल्याण के लिए कार्यक्रमों को लागू करे, वह अनुसूचित जाति और जनजाति के प्रोफेशनल लोगों को सरकारी ठेकों में आरक्षण दे ताकि उनमें उद्यमिता को प्रोत्साहन मिल सके. ठाकरे ने उनके पत्र पर ज्यादा ध्यान न दिया तो कांग्रेस नेताओं की नाराजगी और बढ़ गई.

कांग्रेस नेता दरअसल शिवसेना और एनसीपी में बढ़ती नजदीकी से भी खफा हैं. पार्टी ने 24 दिसंबर को उपमुख्यमंत्री अजित पवार की ओर से एनसीपी कार्यकर्ताओं से की गई उस अपील को भी आशंका की नजर से देखा जिसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा था कि वे जमीनी स्तर पर शिवसेना के कार्यकर्ताओं के लिए जगह बनाएं क्योंकि एक गठबंधन के तौर पर दोनों ही पार्टियों को भविष्य में लंबी पारी खेलनी है. ऐसी भी अपुष्ट खबरें हैं कि शरद पवार राज्य में सेना के साथ गठबंधन कर जल्दी ही विधानसभा चुनाव कराने का विचार कर रहे हैं, पर उसमें कांग्रेस को शामिल नहीं किया जाएगा. शिवसेना-एनसीपी में बढ़ती करीबी इस योजना में भी साफ दिखती है जिसके तहत वे फरवरी 2022 में साथ मिलकर बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) का चुनाव लडऩा चाहती हैं.

कांग्रेस की इस आक्रामकता को खुद को प्रदेश की राजनीति में अहम बनाए रखने के प्रयास के तौर पर देखा जा सकता है. कोंकण और उत्तरी महाराष्ट्र के इलाकों में पार्टी की उपस्थिति नगण्य हो चुकी है. पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाड़ा में भी पार्टी जमीन गवां चुकी है. विदर्भ एकमात्र इलाका है जहां उसकी जमीन बची है. वह अब मुंबई मेट्रोपालिटन रीजन (एमएमआर) पर ध्यान देगी जहां इसके पांच विधायक हैं.

मुंबई में खुद को महत्वपूर्ण बनाए रखने को कांग्रेस के लिए बीएमसी का चुनाव मारने-मरने की लड़ाई होगी. उसने 1997 में नगर निगम का चुनाव शिवसेना के हाथों गवां दिया था. 2017 में पार्टी को केवल 16 प्रतिशत वोट के साथ मात्र 31 सीटें ही मिली थीं. एक विश्वस्त सूत्र का कहना है कि कांग्रेस ने सरकार के 'सुचारु रूप से चलने' के लिए ठाकरे के सामने छह शर्तें रखी हैं. इस सूची में पार्टी के मंत्रियों के विभागों को पर्याप्त राशि का आबंटन सबसे ऊपर है. वित्त मंत्री अजित पवार कहते हैं कि एमवीए सरकार के लिए कोई खतरा नहीं है.

उन्होंने 4 जनवरी को रिपोर्टरों को बताया, ''कोविड के कारण इस साल पैसे की कमी है...इस वजह से पैसे का आबंटन प्रभावित हुआ है.'' ठाकरे भी कांग्रेस के साथ रिश्तों को सहज बनाने की कोशिश कर रहे हैं, शायद इसीलिए उन्होंने 28 दिसंबर को एमवीए की समन्वय समिति की बैठक बुलाई थी. उस बैठक का कोई खास नतीजा नहीं निकला जिसके चलते कांग्रेस को अपना विरोध तेज करना पड़ा. फरवरी में होने वाले स्थानीय निकायों का चुनाव यह तय करेगा कि कांग्रेस अपना यह रुख कायम रखती है या पीछे हट जाती है.

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