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नेतृत्व का संकट

राहुल गांधी इस्तीफे पर अड़े हुए हैं और कार्यसमिति ने प्रस्ताव पारित करके उसे नामंजूर भी कर दिया है. अगर राहुल पद छोड़ देते हैं तो कांग्रेस को संभालने वाला संभावित नेतृत्व कहां है?

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ऐसा लगता है कि चुनावों में अपनी पार्टी की इतनी बड़ी हार से दुखी राहुल गांधी अब भी कांग्रेस अध्यक्ष के ओहदे से अपने इस्तीफे पर अड़े हुए हैं. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कांग्रेस पार्टी इस्तीफे से जुड़े हर सवाल के जवाब में आधिकारिक तौर पर कांग्रेस कार्यसमिति के एक प्रस्ताव का हवाला भर दे रही है. असल में, राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से उन्हें मनाने की कोशिशें जारी हैं. राहुल गांधी के इस्तीफे के पेशकश को नामंजूर करने के लिए कांग्रेस कार्यसमिति ने एक प्रस्ताव पारित किया है और इस पर मुहर लगाने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआइसीसी) का एक अधिवेशन बुलाने की तैयारी चल रही है.

पार्टी का कहना है कि इस सम्मेलन के जरिए राहुल को देश भर के कार्यकर्ताओं से संवाद करने का मौका मिलेगा. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि कार्यसमिति में पारित प्रस्तावों को एआइसीसी अधिवेशन में पास करना जरूरी होता है. उनका कहना है कि 2004 में जब तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जब प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया था तब एआइसीसी सम्मेलन के जरिए उन्होंने कार्यकर्ताओं से दबाव नहीं डालने की अपील की थी. इसके बाद पार्टी में माहौल भी सामान्य हो गया था. पार्टी को उम्मीद है कि देश भर से आए कार्यकर्ताओं से संवाद के बाद राहुल भी इस्तीफा वापस लेने के लिए मान सकते हैं.

इस्तीफे वाले प्रकरण की गहमागहमी के बीच रूटीन संवाददाता सम्मेलन में कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा राहुल के बारे में कुछ भी पूछने पर कार्यसमिति के उस प्रस्ताव की तरफ इशारा करते रहे और कहते रहे कि इस मामले में यह प्रस्ताव ही अंतिम है. खेड़ा हर उस सवाल को नजरअंदाज करते रहे कि अगर कार्यसमिति का प्रस्ताव ही अंतिम है तो फिर दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमिटी और राजस्थान कांग्रेस ने भी इस संदर्भ में प्रस्ताव पारित क्यों किया है?

असल में, 29 मई को शीला दीक्षित की अगुआई में दिल्ली कांग्रेस ने न सिर्फ प्रस्ताव पारित करके राहुल को इस्तीफा वापस लेने का अनुरोध किया बल्कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनके आवास के सामने प्रदर्शन भी किया. बाद में, दीक्षित ने कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने की कोशिश भी की पर उनकी मुलाकात मुमकिन नहीं हो पाई. पार्टी के सूत्र बताते हैं कि अब देश के दूसरे राज्यों की कांग्रेस कमेटियां भी राजस्थान और दिल्ली की तर्ज पर प्रस्ताव पारित करने वाली हैं. बताया जाता है राहुल की मां और रिकॉर्ड 19 साल कांग्रेस की अध्यक्ष रही सोनिया गांधी ने कहा है कि राहुल का इस्तीफा गैरजरूरी है और पार्टी में पहले ऐसा कभी नहीं हुआ.

जब वे 'पार्टी' कहती हैं, तो बेशक उस पार्टी का जिक्र कर रही होती हैं जो 2004 में उनके प्रधानमंत्री नहीं बनने के फैसले के बाद सिर के बल खड़ी हो गई थी. टीवी पर घंटे भर चले सियासी ड्रामे, जिसमें रेणुका चौधरी समेत कई कांग्रेसी जार-जार रोते नजर आए थे, के बाद पद संभालने की अनिच्छा को जिद की हद तक ले जाने वाली सोनिया की छवि 'त्याग की देवी' के तौर पर बना दी गई थी. इस बार भी महज 52 सीटों पर सिमटने के बाद जिम्मेदारी उठाते हुए राहुल जब इस्तीफे पर अड़ गए तो शायद वही परिस्थितियां बनती दिख रही हैं.

सोनिया के लिए 'पार्टी' का अर्थ वही है जो उनकी सास इंदिरा गांधी ने 1969 में तख्तापलट के बाद बनाई थी. इसके जरिए उन्होंने कांग्रेस के उन नेताओं के खिलाफ सफलता से अपना दावा पेश किया था जिन्होंने 1967 के विधानसभा चुनावों में हिंदी पट्टी के कई राज्यों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए उन्हें दोषी ठहराया था और गद्दी से उतारना चाहते थे. उनकी पार्टी कांग्रेस (आर) थी और उन्हें अपनी ज्यादातर पार्टी का समर्थन हासिल था. मूल कांग्रेस पहले के. कामराज और फिर मोरारजी देसाई की अगुआई में विपक्ष के साथ मिल गई थी.

साल 1970 और 1977 के बीच इंदिरा ने अपने तीन वफादार सिपहसालारों को पार्टी अध्यक्ष बनाया. उनके एक और वफादार के.बी. रेड्डी 1977 में पार्टी के अध्यक्ष चुने गए. यह खुद इंदिरा के पार्टी की जिम्मेदारी संभालने से एक साल पहले की बात है. तब से पार्टी की कमान गांधी परिवार के हाथ में ही रही है, सिवा उन सालों के जब राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया ने उन पर डाली गई यह जिम्मेदारी उठाने से इनकार कर दिया था. उन सालों में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे सीताराम केसरी को 1988 में बेइज्जत करके हटा दिया गया था.

साफ है कि दो किस्म के नियम हैं—एक गैर-गांधी अध्यक्षों के लिए और एक परिवार के लिए. केसरी को 1998 के आम चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन की जिम्मेदारी का दंश झेलना पड़ा था. बेशक राजीव गांधी को ऐसी किसी निंदा-भर्त्सना का सामना नहीं करना पड़ा, जब लोकसभा में कांग्रेस के सांसदों की तादाद 1984 में 414 से लुढ़ककर 1989 में 197 पर आ गई थी. सोनिया के मातहत कांग्रेस 1999 में भी उतनी भी सीटें नहीं जीत सकी जितनी उससे पिछले साल (1996 के बाद देश में तीन आम चुनाव हुए थे) उसने केसरी के मातहत जीती थीं, पर तब किसी ने सोनिया गांधी से इस्तीफा नहीं मांगा.

इस पृष्ठभूमि में राहुल के इस्तीफे की पेशकश किसी गांधी के जिम्मेदारी अपने सिर लेने की पहली कोशिश है. मगर मोदी की लहर में डूबकर कांग्रेस अप्रासंगिक होकर रह गई है. जिन चार राज्यों में कांग्रेस ने विधानसभा के चुनाव जीते थे, उनमें भी उसे अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा. उसका प्रदर्शन इतना दयनीय था कि कांग्रेस ने राज्य नेतृत्व पर खुलेआम सवाल उठाए.

भाजपा की संगठित और रुपए-पैसे से बहुत ज्यादा मजबूत पार्टी मशीनरी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अध्यक्ष अमित शाह की अगुआई में डराने वाली ताकत का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो संगठन का ढांचा नए सिरे से खड़ा करने के लिए कड़ी मेहनत करने को तैयार हों. बेशक जिन लोगों को कांग्रेस को नए सिरे से खड़ा करने और कई राज्यों में सुस्त पड़ी प्रचार-प्रसार की कोशिशों को फिर से जिंदा करने का काम सौंपा जाएगा, उन्हें इस काम के लिए जरूरी साधनों की जरूरत होगी. क्या कांग्रेस के पास रोकड़ा है? क्या वह पंजाब, केरल और तमिलनाडु में अपनी कामयाबी के इशारे समझ सकती है? तमिलनाडु में शायद उसे नए सिरे से उठ खड़ी हुई डीएमके दम पर जीत हासिल हुई है. पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह स्थिर सहारा साबित हुए हैं, पर क्या यह मुमकिन हो सकता है कि राहुल अपनी कुरसी पकती उम्र के सिंह को सौंप दें, जो उनके नेतृत्व के आलोचक रहे हैं?

सचिन पायलट सरीखे कुछ युवा तुर्क भी हैं जिनकी अगुआई में कांग्रेस ने राजस्थान के विधानसभा चुनाव में असरदार जीत हासिल की थी. हालांकि पायलट के अलावा ऐसा कोई भी नहीं है जिसके पास इतनी राजनैतिक पूंजी या अनुभव हो कि वह अध्यक्षता संभाल सके. राहुल की जगह पायलट या ज्योतिरादित्य सिंधिया सरीखे किसी शख्स को लाते ही पार्टी में अंतर्कलह शुरू हो जाएगी और धड़े बन जाएंगे जो गांधी परिवार को वापस लाने की साजिशें रचना शुरू कर देंगे. पार्टी के भीतर इन नौजवान नेताओं के मजबूत प्रतिद्वंद्वी भी हैं: पायलट के खिलाफ राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हैं; हरियाणा में रणदीप सिंह सुरजेवाला के खिलाफ हुड्डा परिवार है; और सिंधिया के खिलाफ कमलनाथ और दिग्विजय सिंह दोनों हैं.

राहुल के छोडऩे का संभावित नतीजा पार्टी के भीतर गुटबाजी होगा और तब उसके पास अमित शाह सरीखी कोई शख्सियत भी नहीं होगी जो कांग्रेस को एक रख सके और पार्टीजनों की इज्जत हासिल कर सके. राहुल ने कांग्रेस कार्यसमिति से कहा है कि वह नया नेता ढूंढ ले, पर क्या वह ढूंढ सकती है? क्या वह ढूंढना चाहती भी है? क्या पार्टी एक ऐसे भविष्य की कल्पना कर सकती है, जब उसकी पतवार गांधी परिवार के हाथों में न हो?

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