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उत्तराखंडः रावत की नई मुसीबत?

मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि वे हर हाल में उपचुनाव लड़ेंगे और इससे केंद्र को अवगत करा दिया गया है

असमंजस रामनगर में पार्टी के चिंतन शिविर में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत (सबसे दाएं) असमंजस रामनगर में पार्टी के चिंतन शिविर में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत (सबसे दाएं)

उत्तराखंड में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस राज्य में एक संवैधानिक संकट खड़ा होने का सवाल जोर-शोर से उठा रही है. कांग्रेस का कहना है कि राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने 11 मार्च को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. अगर उनको मुख्यमंत्री बने रहना है तो 10 सितंबर, 2021 तक यानी छह महीने के भीतर उनको विधानसभा सदस्य बन सदन में चुनकर आना होगा. लेकिन मुख्यमंत्री ने अब तक यह भी ऐलान नहीं किया कि वे कहां से चुनाव लड़ेंगे न ही उन्होंने लोकसभा सदस्यता से अब तक इस्तीफा दिया. ऐसे में यह भी चर्चा होने लगी है कि क्या वे लोकसभा सदस्यता से इसलिए इस्तीफा नहीं दे रहे कि उन्हें खुद भी विधानसभा सदस्य बनना संदेहास्पद लग रहा है?

वहीं, भाजपा कह रही थी कि नैनीताल जिले के रामनगर में तीन दिवसीय चिंतन शिविर में यह तय कर लिया जाएगा कि मुख्यमंत्री कहां से चुनाव लडेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस चिंतन शिविर के बाद मुख्यमंत्री ने बयान दिया कि वह हर हाल में उपचुनाव लड़ेंगे और जल्द ही उपचुनाव होगा. उन्होंने कहा कि इस संबंध में केंद्र को अवगत करा दिया गया है और केंद्र जहां से कहेगा, वहां से वह उपचुनाव लड़ेंगे.

दूसरी ओर, कांग्रेस नेता एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री नवप्रभात कह रहे हैं कि राज्य की गंगोत्री और हल्द्वानी विधानसभा सीटें यहां के विधायकों की मौत के कारण खाली तो हैं, लेकिन लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 151 (ए) के तहत आम चुनाव के लिए केवल एक साल का समय ही शेष होने पर उप-चुनाव नहीं हो सकता. राज्य में मार्च 2022 तक ही विधानसभा का कार्यकाल बचा है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह का कहना है कि मुख्यमंत्री रावत छह महीने के भीतर विधानसभा सदस्य बनने का अवसर गंवा चुके हैं, जिससे राज्य में संवैधानिक संकट पैदा होना तय है.

वे कहते हैं कि चुनाव आयोग ने तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की विधान परिषदों की 12 सीटों के चुनाव कराने से यह कहकर इनकार कर दिया था कि कोविड के चलते ऐसा करना संभव नहीं है. वे पूछते हैं कि ऐसे में क्या वह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 151 ए के तहत अब विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने में केवल 9 महीने ही बचे होने के बावजूद उपचुनाव कराएगा? वहीं, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक कहते हैं, ''संविधान की अनुच्छेद 164(4) के अनुसार जो मुख्यमंत्री या मंत्री सदन का सदस्य नहीं है, उनको 6 महीने में सदस्य बनना होता है. संविधान की इसी व्यवस्था के तहत चुनाव आयोग को इस अवधि में चुनाव करवाना भी होता है. इसलिए यह कहा जाना कि प्रदेश में संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है तथ्यहीन है.''

भाजपा समर्थक यह भी कह रहे हैं कि लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा-151क (क) रिक्ति की पदावधि का शेष भाग एक वर्ष से कम होने पर उप चुनाव की अनुमति नहीं देता है. मगर वे इसके साथ यह भी कहते हैं कि धारा-151क (ख) ऐसी स्थिति में भी उपचुनाव कराने की पूरी गुंजाइश रखता है. दरअसल, इसमें धारा-151 क ऐसी रिक्तियों को भरने के लिए छह महीने के भीतर उपनिर्वाचन करने की बात कहता है. लेकिन धारा-151 क (क) में कहा गया है कि अगर रिक्ति से संबंधित सदस्य की पदावधि एक साल से कम है तो उपर्युक्त धारा की बात लागू नहीं होगी. वहीं धारा-151 क (ख) के मुताबिक, चुनाव आयोग केंद्र सरकार से परामर्श करके यह प्रमाणित करता है कि उस अवधि के भीतर उपनिर्वाचन करना कठिन है, तब भी उपर्युक्त धारा की बात लागू नहीं होगी.

संविधान के जानकार भी यह कहते हैं कि अगर राज्य पर किसी उपचुनाव के न होने पर संवैधानिक संकट जैसी कोई स्थिति बनती है तो चुनाव आयोग उपचुनाव कराने में समर्थ है. इसके लिए केवल उसे यह लगना चाहिए कि उपचुनाव न होने से यह संकट आ सकता है.

सबसे हाल में महाराष्ट्र में कुछ ऐसा ही वाकया हुआ था. नवंबर 2019 में महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने थे तब वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे. उनको विधान परिषद से सदन में आने के लिए चुनाव करवाने में चुनाव आयोग ने कोविड संक्रमण के बढ़ने के चलते असमर्थता जता दी थी. उसके बाद एक विकल्प उनको मनोनीत कर विधान परिषद भेजे जाने का था. इसके लिए कैबिनेट से प्रस्ताव गवर्नर को भेजा गया लेकिन गवर्नर ने इस प्रस्ताव पर चुप्पी साध ली. राज्य में संवैधानिक संकट बढ़ने के चलते अंतत: उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री को फोन किया और गवर्नर को इसके समाधान के लिए कहा. तब जाकर गवर्नर ने उन्हें विधान परिषद में मनोनीत करने के लिए चुनाव आयोग से नोटिफिकेशन जारी करने को कहा. इस तरह ठाकरे मुख्यमंत्री पद पर बरकरार रहने में सफल हुए थे.

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