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न्यायिक सुधारः लंबे अरसे से लटके मुकदमों का हो निबटारा

कार्यपालिका को जजों की भारी कमी दूर करनी होगी ताकि लंबित पड़े मुकदमों को निबटाया जा सके, अदालतों को आधुनिक बनाना होगा और न्यायिक नियुक्ति समिति का गठन भी करना होगा.

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अभी क्या करें

विशेषज्ञ समूह को नियुक्त किया जाए जो:
एकबारगी वृद्धि के लिए जजों के वेतन की समीक्षा करें.
ऐसा तरीका निकालें जिससे राज्यों पर इस अतिरिक्त बोझ की भरपाई केंद्रीय बजट से हो सके.

न्यायिक नियुक्तियों में कमी की वजह से पड़ताल के लिए एक कार्यदल गठित करें और अगले 100 दिन में सभी पद भरने के लिए कदम उठाए. इन नियुक्तियों में रोड़ा बने नियमों की व्याख्या के बारे में मुकदमा होने पर नियमों को तुरंत संशोधित कर दिया जाए.

सांसदों और कुछ जाने-माने न्यायविदों की संयुक्त समिति गठित की जाए जो 60 दिन के भीतर न्यायिक नियुक्ति समिति विधेयक का मसौदा तैयार करे. इस समिति को न्यायिक नियुक्ति समिति का खाका पेश करना होगा.

समिति को मौजूदा सरकार तथा संवैधानिक अदालतों के बीच तनाव की पड़ताल करके अपनी रिपोर्ट देनी चाहिए. जरूरी हो तो यह भविष्य में आने वाली समस्याओं से निबटने के लिए उपायों का सुझाव भी दे सकती है.

दंड प्रक्रिया संहिता में बदलाव के लिए एक समिति गठित की जाए जो यह तय करे कि:

शर्मिंदगी की स्थितियां पैदा करने वाली सुनवाई की मौजूदा व्यवस्था खत्म हो जाए. अपराधों की छानबीन में पूरी गोपनीयता रखी जाए जब तक कि अदालत में आरोप दाखिल न हो जाएं.

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या, आतंकी गतिविधियों जैसे कुछ हिंसक अपराधों के मुकदमों को छोड़कर ज्यादातर मामलों में जेल नहीं, बेल का जो सिद्धांत चलाया था उसे फिर से अपनाया जाना चाहिए.

100 दिन  में करें
ऐसी सर्वाधिकार प्राप्त न्यायिक नियुक्ति समिति गठित की जाए जिसे जजों को नियुक्त करने और उनके खिलाफ शिकायतें सुनने का अधिकार हासिल हो. यह समिति इतनी सशक्त होनी चाहिए जिसके संविधान पर जनता का भरोसा होना चाहिए.

वाणिज्यिक न्यायालय विधेयक (कॉमर्शियल कोर्ट्स बिल) पर अमल के लिए कार्यदल नियुक्ïत किया जाए.

विधिक सेवा कानून में संशोधन किया जाए ताकि सरकार के हर विभाग के लिए नागरिकों के साथ विवादों के निबटान में अंपायर की भूमिका निभाने के लायक सेवानिवृत्त जिला/हाइकोर्ट जजों की नियुक्ति करना अनिवार्य हो. अंपायर के फैसले का पालन करना सरकार के लिए अनिवार्य हो पर नागरिकों के लिए नहीं.

ऐसा विधिक सहायता कानून बनाने के लिए समिति नियुक्त की जाए जिसके लिए धन का पूरा प्रावधान हो. यह धन आंशिक रूप से वाणिज्यिक अदालतों में लिए जाने वाले शुल्क से मिले और बाकी भारतीय अदालतों में ली जाने वाली मामूली कोर्ट फीस में संशोधन से आए. इस कानून की संरचना ऐसी हो कि आर्थिक रूप से कमजोर वादियों को अच्छी कानूनी सहायता मिले और युवा वकीलों को मुकदमे में अच्छी फीस और अनुभव मिले.

एक न्यायिक सुधार समिति गठित की जाए जिसका काम यह सुनिश्चित करना हो कि:

सभी गठित समितियों की रिपोर्ट उचित समय में मिल जाए और विश्लेषण के बाद उन्हें संसद में पेश कर दिया जाए.
सुधार के इन उपायों को लागू करने के लिए कार्यपालिका, को जो भी कदम उठाने हैं वे समय रहते उठाए जाएं, और
जहां कहीं जरूरी हो, सरकार इन उपायों को लागू करने के लिए संसद से कानूनी मंजूरी लेने के उपाय करे.

एक साल में करें
समूचे न्यायिक तंत्र पर नए सिरे से गौर करने के लिए एक बाहरी विशेषज्ञ की नियुक्ति को अंजाम दिया जाए और उसे निम्नलिखित काम सौंपे जाएं:

अदालतों को कारगर बनाने के लिए जरूरी जजों की संशोधित संख्या का आकलन करे और जजों की कमी की समस्या को दूर करने के लिए सभी आवश्यक उपाय बताए.

अदालतों की कार्यकुशलता सुधारने के लिए उनके बुनियादी ढांचे को उन्नत करने के तरीकों का सुझाव दें.

जमीन और अन्य सरकारी दस्तावेजों को कंप्यूटरीकृत कर दिया जाए.
सभी अदालतों में सारा काम कंप्यूटर से हो.

विभिन्न कानूनों के तहत स्थापित सभी नियमन तंत्रों और ट्राइब्यूनल्स की समीक्षा की जाए. एक बाहरी विशेषज्ञ की नियुक्ति की जाए जो:

ट्राइब्यूनल्स को ज्यादा कारगर बनाने के लिए उनकी बुनियादी सुविधाओं में सुधार सहित विभिन्न उपायों पर विचार करे ताकि उनका काम बेहतर ढंग से हो सके.

किसी भी संबंधित विषय की आवश्यक जानकारी वाले विशेषज्ञों की पहचान और नियुक्ति के लिए उपायों के सुझाव दे ताकि ट्राइब्यूनल वास्तव में विशेषज्ञ नियामक के रूप में अपने काम कर सके.

तीन साल में पूरा करें
अब तक निबटाए न जा सके पुराने मुकदमों का एक साथ निबटारा करने के लिए:
ऐसे सभी दीवानी मुकदमों को मध्यस्थता के लिए भेज दिया जाए जिनमें पीडि़त पक्ष को अंतरिम आदेश मिला हो या अंतरिम आदेश भी न मिल सका हो.

दंड विधि कानून में संशोधन करके अधिकांश अपराधों को समझौता योग्य बना दिया जाए, लेकिन यह शर्त हो कि अदालत इस बात से संतुष्ट हो कि ऐसा करना न्याय के हित में है.

कानूनों में सुधार के लिए विधि आयोग की रिपोर्टों पर विचार के लिए एक कार्यदल नियुक्त किया जाए जो उन्हें लागू करने के उपायों का सुझाव भी दे.

निरंतर जारी प्रोफेशनल विकास कार्यक्रम शुरू किया जाए जिसमें जज और वकील ऐसे सत्रों में हिस्सा लेने पर बाध्य हो जाएं जिनसे उनकी जानकारी में इजाफा होता हो. इनमें अन्य देशों में वाणिज्यिक कानूनों में हो रहे बदलाव से वाकिफ होना भी शामिल है.

एक जवाबदेही लोकपाल नियुक्त किया जाए जहां ऐसा कोई भी नागरिक शिकायत कर सके जो टैक्स अधिकारियों के मनमाने आकलन से पीडि़त महसूस कर रहा हो. अगर शिकायत सही पाई जाती है तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई की जानी चाहिए.

एक कानून बनाया जाए जिसके तहत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लगाए गए बदनाम करने वाले आरोपों की सुनवाई, नागरिक अगर चाहे तो एक समिति करे जिसमें एक न्यायाधीश और उस मीडिया के सदस्य शामिल हों. उस मीडिया के काम के औचित्य का फैसला उसके साथियों पर ही छोड़ दिया जाए. समिति को ऐसे वैधानिक अधिकार होने चाहिए जिनके तहत अगर यह साबित हो जाए कि नागरिक को बदनाम किया गया है तो फैसला दे सके और मुआवजा दिला सके.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं)

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