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नौनिहाल भी करने लगे भेदभाव

यहां छठी कक्षा के सवर्ण बच्चे भी जातीय श्रेष्ठता का अर्थ समझते हैं और स्कूल में पका खाना नहीं खाते.

उत्तराखंड में पिछले दिनों कुछ ऐसी चौंकाने वाली घटनाएं हुई हैं जिनसे पता चलता है कि राज्य के विद्यालय अस्पृश्यता को दूर करने की बजाए उसे बढ़ाने में भूमिका निभा रहे हैं. चमोली जिले के जोशीमठ विकासखंड में स्थित गांव ढाक के सरकारी जूनियर हाइस्कूल में पिछले छह माह से सवर्ण परिवारों से संबंध रखने वाले छात्र-छात्राएं स्कूल में पकने वाला भोजन नहीं खा रहे हैं क्योंकि यह भोजन पकाने वाली महिला यानी भोजन माता निचली जाति से संबंध रखती हैं.

ऊंची जाति के इन किशोर-किशोरियों को मनाने के लिए राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के अपर सचिव से लेकर चमोली के मुख्य शिक्षा अधिकारी तक स्कूल में पहुंच चुके हैं. तहसील और पुलिस के अधिकारी बच्चों के अभिभावकों को समझा चुके हैं. जिले के मुख्य शिक्षा अधिकारी ने तो अभिभावकों की सहमति पर अपने खर्चे से स्कूल में सामूहिक भोज का आयोजन तक करा डाला, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा. आज भी स्कूल में हर रोज छात्र-छात्राएं आते हैं, मगर दोपहर का खाना केवल अनुसूचित जाति के बच्चे ही खाते हैं.

इस जूनियर हाइस्कूल में कक्षा छह से आठवीं तक की पढ़ाई होती है, जहां ढाक, कुंडीखोला और चमतोली आदि मिश्रित आबादी वाले गांवों के 36 बच्चे पढऩे आते हैं. सवर्ण छात्र-छात्राओं के भोजन न करने के कारण अब केवल अनुसूचित जाति के छात्रों की उपस्थिति के आधार पर ही यहां खाना पकता है. इस स्कूल में 36 में से 17 छात्र सवर्ण जाति के हैं, जो अप्रैल से ही मिड डे मील का खाना नहीं खा रहे हैं.  कार्यवाहक हेडमास्टर एस. कुमार कहते हैं,  ‘‘इस सत्र की शुरुआत में कुछ दिन तक तो सभी के लिए खाना पकता रहा, लेकिन जब बच्चों ने खाना न खाने की जिद नहीं छोड़ी तो सवर्ण बच्चों के हिस्से का खाद्यान्न पकाना बंद कर दिया गया, जो स्कूल के स्टोर में पड़ा है.”

इस स्कूल में चार साल पहले मिड डे मील योजना के तहत खाना पकना शुरू हुआ था. चार साल तक तो सभी बच्चे खाना खाते रहे. लेकिन 2012-13 के सत्र की शुरुआत से कुछ बच्चों को एकाएक भूख लगनी बंद हो गई. पहले जब सवर्ण जाति की भोजन माता सुप्पी देवी खाना पकाती थीं, तब सभी बच्चे खाना खाते थे. लेकिन छह माह पहले जब भोजन माता के लिए अनुसूचित जाति की अनिता देवी की नियुक्ति हुई तो सवर्ण बच्चों ने भोजन करना बंद कर दिया.

अनिता देवी तो इस वाकये से बहुत आहत और डरी हुई हैं. मार्च में स्कूल की प्रबंध समिति ने 1,500 रु. प्रति माह पर उनकी नियुक्ति की, लेकिन उनके किचन में घुसते ही खाने का बहिष्कार शुरू हो गया. वे कहती हैं, ‘‘बच्चे खाने के लिए बैठते ही नहीं थे. मैं इस अन्याय के खिलाफ और आत्मसम्मान के लिए हर स्तर पर संघर्ष के लिए तैयार हूं.” गांव के पूर्व प्रधान एवं पर्वतीय शिल्पकार सभा के जिलाध्यक्ष एम.एल. बजवाल कहते हैं, ‘‘यह बहुत दुखदायी है. पहले भी यहां जातीय भेदभाव के मामले उठ चुके हैं.”

लेकिन दूसरी ओर अभिभावक भेदभाव की बात को सिरे से नकारते हैं. ढाक गांव से कुछ ही दूरी पर दुकान चलाने वाले हरीश सिंह का बेटा इसी स्कूल में पढ़ता है. हरीश कहते हैं, ‘‘मेरे बच्चे को भूख ही नहीं लगती है.” वहीं बच्चे भी बहाना करते हैं कि हमें भूख ही नहीं लगती. चमोली के मुख्य शिक्षा अधिकारी भूपेंद्र सिंह नेगी कहते हैं, ‘‘यह बहुत ही दुखद है. जातीय भेदभाव हमारे समाज में बहुत गहरे पैठा हुआ है. यह स्कूल और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि बच्चों की मानसिकता को बदलने की कोशिश करें.” हालांकि सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और शिक्षा विभाग एवं जिले के कई अधिकारी इस स्कूल में आ चुके हैं, लेकिन  स्थिति ज्यों की त्यों है.

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