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उत्तर प्रदेशः क्या कांग्रेस को उबार पाएंगी प्रियंका?

प्रियंका की गिरक्रतारी और लखीमपुर खीरी मामले में कांग्रेस की त्वरित प्रतिक्रिया ने यूपी में पार्टी को एक बार फिर से सुर्खियों में ला दिया है

अक्तूबर की 3 तारीख की रात को कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश प्रभारी प्रियंका गांधी ने दिल्ली से लखनऊ के लिए उड़ान भरी. उनकी फ्लाइट रात 9 बजे लखनऊ में उतरी और वे तुरंत लखीमपुर खीरी के लिए रवाना हो गईं. उस दिन लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र 'टेनी' के बेटे आशीष मिश्र के काफिले की गाड़ियों से कुचलने से चार किसानों की मौत हो गई और उसके बाद हिंसा भड़क गई थी.

राज्य सरकार ने सीतापुर से लखीमपुर खीरी जाने वाले सभी रास्तों को सील कर दिया था और आने वाले हर वाहन की जांच की जा रही थी. प्रियंका का काफिला लखनऊ से 100 किलोमीटर दूर सीतापुर, रात 11 बजे पहुंचा. प्रियंका ने सीतापुर से लखीमपुर खीरी तक के हर रास्ते से भली-भांति परिचित कांग्रेस के स्थानीय जिलाध्यक्ष उत्कर्ष अवस्थी को गाड़ी चलाने को कहा. करीब चार घंटे तक पुलिस को चकमा देने के बाद प्रियंका का काफिला लखीमपुर खीरी से सटे कस्बे हरगांव पहुंचा, लेकिन वहां की पुलिस की घेराबंदी को वे चकमा नहीं दे पाए.

प्रियंका को हिरासत में ले लिया गया और सीतापुर के एक पुलिस गेस्टहाउस में नजरबंद कर दिया गया. अगले दिन जब वे भूख हड़ताल पर चली गईं तो पूरे देश का ध्यान लखीमपुर खीरी पर था. प्रियंका तिकुनिया कांड में मारे गए किसानों के परिजनों से मिलने पर अड़ी थीं. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार आखिरकार तीसरे दिन मानी. करीब 57 घंटे तक पुलिस हिरासत में रहने के बाद, प्रियंका ने अपने भाई और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ, जो तब तक वहां पहुंच चुके थे, 6 अक्तूबर की देर रात को मारे गए किसानों के परिवारों से मुलाकात की.

यूपी में किस तरह हाशिए पर चली गई कांग्रेस
यूपी में किस तरह हाशिए पर चली गई कांग्रेस

प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता सचिन रावत कहते हैं, ''जिस तरह से प्रियंका ने भाजपा सरकार को लखीमपुर कांड पर घेरा है, दूसरे दलों के नेता अपने एसी कमरों से बाहर निकलने को मजबूर हो गए हैं.'' मारे गए किसानों के परिवारों से मिलने के बाद प्रियंका लखनऊ लौटीं और 10 अक्तूबर को वाराणसी में कांग्रेस की रैली की तैयारी में जुट गईं. उन्होंने उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र के रोहनिया क्षेत्र के जगतपुर इंटर कॉलेज मैदान में 'न्याय रैली' के साथ पार्टी के मिशन 2022 की शुरुआत की. रैली में प्रियंका ने कहा, ''प्रधानमंत्री मोदी दुनिया घूम सकते हैं लेकिन लखीमपुर नहीं जा सकते. वे 'आजादी के अमृत महोत्सव' के लिए लखनऊ जा सकते हैं, लेकिन इस देश के किसानों का दुख दर्द जानने के लिए वे मात्र 100 किलोमीटर दूर लखीमपुर नहीं जा सकते.''

लखीमपुर खीरी कांड के बाद किसानों के समर्थन में प्रियंका की सक्रियता को लेकर उत्तर प्रदेश में सियासी बहस छिड़ गई है. लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एस.के. द्विवेदी कहते हैं, ''विधानसभा चुनाव में गिनती के कुछ महीने शेष हैं और प्रियंका के अभियान से मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी (सपा) की परेशानी बढ़ जाएगी क्योंकि इससे भाजपा विरोधी वोटों के विभाजन का जोखिम बढ़ेगा. सपा पर अब गठबंधन का और अधिक दबाव होगा.''

उत्तर प्रदेश कांग्रेस, जो लखीमपुर की घटना के तुरंत बाद किसानों के समर्थन में सबसे पहले उतरी थी, अब किसी भी भाजपा विरोधी गठबंधन में अधिक सीटों के लिए सौदेबाजी करने की स्थिति में है. 2017 में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में 114 सीटों पर चुनाव लड़ा था. हालांकि, चुनाव के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने यह कहते हुए गठबंधन तोड़ दिया था कि सपा को इससे कोई फायदा नहीं हुआ. प्रियंका और तिकुनिया कांड पर अखिलेश कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश में होने वाली हर घटना में सबसे पहले मदद के लिए सपा नेता आगे आते हैं. यह विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को संजीवनी देने की भाजपा की रणनीति है.''

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने 8 अक्तूबर को एक ट्वीट में अपना नजरिया रखा, ''लखीमपुर की घटना के आधार पर जिन लोगों को जीओपी (ग्रैंड ओल्ड पार्टी, कांग्रेस से अभिप्राय) के नेतृत्व वाले विपक्ष के त्वरित और सहज पुनरुद्धार की आस हैं, उन्हें बड़ी निराशा होने वाली है. दुर्भाग्य से, जीओपी की गहरी और संरचनात्मक कमजोरियों का कोई त्वरित समाधान नहीं है.''

जनवरी 2019 में पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान संभालने वाली कांग्रेस की वारिस प्रियंका के पास, लोकसभा चुनाव के बाद से पूरे राज्य की जिम्मेदारी है. 2019 में कांग्रेस प्रदेश से महज एक सांसद लोकसभा भेज पाई थी, इसलिए 2022 का विधानसभा चुनाव प्रियंका के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण हो जाता है. इसमें उनकी संगठनात्मक क्षमता की परीक्षा होगी और परिणाम यह तय करेंगे कि एक नेता के रूप में वे कितनी लोकप्रिय हैं. द्विवेदी कहते हैं, ''पिछले तीन दशकों से प्रदेश में कांग्रेस का संगठन लगातार खत्म होता जा रहा है. विधानसभा में भी, कांग्रेस के विधायकों की संख्या फिलहाल अपने सबसे निचले स्तर (सात सीटों) पर है. अगर प्रियंका विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें दिलाने में सफल होती हैं तो वे खुद को एक नेता के रूप में स्थापित कर लेंगी.''

प्रियंका पिछले दो साल से राज्य में संगठन फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं. उन्होंने 500 सदस्यीय राज्य कार्यकारिणी समिति को घटाकर 115 सदस्यीय बना दिया और पिछड़ी जाति के अजय कुमार लल्लू को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया. राज्य कार्यकारिणी के गठन में जातीय संतुलन को साधने की कोशिश की गई. कार्यकारिणी में, 41 सवर्ण, 20 मुस्लिम, 40 ओबीसी और 14 दलित और अन्य जातियों के नेताओं को शामिल किया गया है. द्विवेदी बताते हैं, ''प्रियंका ने उन जातियों (ब्राह्मणों, ठाकुरों और कुर्मियों) पर विशेष ध्यान दिया है, जिन्होंने 2017 में भाजपा को एकमुश्त वोट दिया था. भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश एक अच्छी रणनीति है.''

75 जिला अध्यक्षों की नियुक्ति में भी वही रणनीति अपनाई गई है, हालांकि अजय लल्लू का इस पर एक अलग दृष्टिकोण है. वे कहते हैं, ''प्रियंका ने सभी नेताओं के बारे में पहले लोगों से राय ली और उसके आधार पर प्रतिभावान लोगों को पदाधिकारी और जिला अध्यक्षों के रूप में नियुक्त किया. केवल क्षमतावान और प्रतिभासंपन्न लोगों को ही स्थान मिला है.'' संगठन में एक अन्य बदलाव जो झलकता है वह नए जिला अध्यक्षों के रूप में युवा नेताओं को प्राथमिकता दिया जाना.

कांग्रेस राज्य संगठन को छह क्षेत्रों—आगरा, मेरठ, बरेली, अवध, पूर्वांचल और बुंदेलखंड में विभाजित किया गया है. राज्य और जिला स्तर पर फेरबदल करने के बाद पार्टी ने पंचायत/बूथ स्तर पर भी बदलाव पर ध्यान दिया. अजय लल्लू कहते हैं, ''सभी 59,000 ग्राम पंचायतों में इक्कीस सदस्य समितियां बनाई गई हैं. उनमें बड़ी संख्या में युवा नेताओं को पद दिए गए हैं.'' विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है. इसके लिए नेताओं से 12 अक्तूबर तक आवेदन मांगे गए थे. पार्टी ने उन 200 नेताओं के नाम भी शॉर्टलिस्ट किए हैं, जिन्होंने पूर्व में विधानसभा और लोकसभा सीटें जीती हैं.

लेकिन संगठनात्मक बदलाव के इन प्रयासों से पार्टी में लोकप्रिय और जमीनी पकड़ रखने वाले नेताओं की कमी या इसके कार्यक्रमों की अनिश्चित प्रकृति जैसी परेशानियां हल नहीं होतीं. यह उस ऊब के बारे में बहुत कुछ कह देता है जिसकी शिकायत कांग्रेस के कार्यकर्ता शिकायत करते आए हैं कि उन्हें पार्टी के मामलों में लगातार व्यस्त रखने के लिए बहुत कम प्रयास किए जा रहे हैं. इसके अलावा कांग्रेस, पुराने नेताओं और नए लोगों के बीच पार्टी के भीतर विवाद और चुनाव पूर्व विभिन्न राजनैतिक गतिविधियों में निराशाजनक प्रदर्शन समेत कई परेशानियों से जूझ रही है. हाल ही में संपन्न पंचायत चुनावों को भी इनमें गिना जा सकता है जिसमें कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत निराशाजनक रहा और उसने 3,050 जिला पंचायत सीटों में से सिर्फ 200 जीती थीं.

अगर सांगठनिक बदलाव और लखीमपुर में त्वरित हस्तक्षेप से पार्टी का हौसला कुछ बढ़ा हो, तो एक और आंकड़ा है जो उसके उत्साह को थोड़ा बढ़ा सकता है: 2017 में पार्टी ने भले ही केवल सात सीटें ही जीती थीं, लेकिन अन्य 49 सीटों पर वह दूसरे स्थान पर रही थी. तो अगर प्रियंका के अभियान से पार्टी को चुनाव से पहले कुछ ताकत मिलती है और उस पर लोगों का भरोसा बनता है तो यह राज्य में सत्ता विरोधी लहर की सबसे बड़ी लाभार्थी बन सकती है. इस बीच, लखनऊ के मॉल एवेन्यू स्थित पार्टी के राज्य मुख्यालय में प्रवेश करते ही, प्रियंका की एक तस्वीर एक बड़े होर्डिंग के किनारे देखी जा सकती है जिसके बीच में उगता सूरज नजर आता है. अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सूरज चमकाने का सारा दारोमदार प्रियंका गांधी के निजी करिश्मे और स्टार पावर पर होगा.

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