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बीजेपी: युद्ध से पहले पुराने सारथी को बागडोर

आडवाणी और आरएसएस के बीच मतभेद की वजह से गडकरी को दूसरा कार्यकाल नहीं मिल पाया. क्या राजनाथ अपने दूसरे कार्यकाल में 2014 की जंग जीतने का करिश्मा दिखा पाएंगे?

राजनाथ सिंह के, ज्योतिष में भी दखल रखने वाले एक करीबी ने उनके कुंडली में ‘राजयोग' देखा था और उन्होंने अक्तूबर, 2012 में ही भविष्यवाणी कर दी कि अध्यक्ष पद को लेकर पार्टी और आरएसएस के बीच किसी उम्मीदवार के नाम पर मतभेद की स्थिति में सिंह बीजेपी के अध्यक्ष बन सकते हैं. वे चयन प्रक्रिया से नहीं बल्कि मैदान में उतरे दूसरे लोगों को ठिकाने लगाकर पद तक पहुंचेंगे. पहले तो उनका नाम कहीं चर्चा में ही नहीं था पर वे एक छुपे रुस्तम के रूप में आसपास ही मौजूद थे.

बाईस जनवरी की देर शाम से सितारे 61 वर्षीय राजनाथ के अनुकूल होने लगे. ऐसा लगता था, जैसे यह पॉल कोएल्हो के द अलकेमिस्ट की कोई घटना हो. घटनाओं के एक नाटकीय मोड़ में ऐसा लगा जैसे पार्टी अध्यक्ष बनने में उनकी मदद करने के लिए पूरी कायनात ने साजिश की हो. बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और आरएसएस के बीच मतभेद की वजह से वे आम सहमति वाले उम्मीदवार के रूप में सामने आए.

गाजियाबाद से सांसद सिंह अब 2014 में पार्टी का नेतृत्व करेंगे और प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी के उम्मीदवार तय करने में उनकी अहम भूमिका होगी. उनके सामने 2014 के चुनाव में पार्टी की संभावनाओं को मजबूत करने और संभवत: नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर काम करने का कठिन लक्ष्य है.

राजनाथ इसके पहले दिसंबर, 2005 से 2009 के बीच पार्टी के अध्यक्ष थे और उनकी अगुआई में लड़े गए पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था. उनके इस प्रभावहीन रिकॉर्ड के अलावा कोई भी व्यक्ति मृदुभाषी, सौम्य स्वभाव वाले और अनुभवी राजनाथ में कोई और कमी नहीं पा सकता. उनसे नाराज लोगों से अपने रिश्तों को सहज बनाने के लिए वे सीमा से भी आगे जाकर कोशिश करने में नहीं हिचकते. उनके इस गुण से पार्टी को मतभेदों के मौजूदा माहौल को दूर करने में जरूर मदद मिलेगी. वैसे तो राजनाथ को भी आरएसएस का करीबी माना जाता है, लेकिन उनकी साफ  और गैर-विवादित छवि को देखते हुए आडवाणी उनके नाम का विरोध नहीं कर पाए.BJP

गडकरी के लिए अंत में आया मोड़
बाईस जनवरी की दोपहर तक तो अध्यक्ष पद के दूसरे कार्यकाल के लिए नितिन गडकरी की खातिर मंच तैयार था. दोपहर 3.45 बजे जब इनकम टैक्स अधिकारी गडकरी के पूर्ति गु्रप से जुड़े ठिकानों की तलाशी ले रहे थे, बीजेपी ने उनकी तरफ  से एक बयान जारी किया. इस बयान में कहा गया, ‘‘यह उनके बीजेपी के दोबारा अध्यक्ष चुने जाने की पूर्व संध्या पर हुआ है. इनकम टैक्स विभाग की इस कार्रवाई से इस बात की बू आती है कि यह सत्तारूढ़ यूपीए की ओर से बीजेपी के कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा करने की एक तरह की साजिश है.’’

लेकिन एक घंटे के अंदर ही स्थिति बदल गई. दोपहर बाद 4.40 बजे पार्टी ने एक संशोधित बयान जारी किया. इसमें उनके फिर से अध्यक्ष चुने जाने की बात हटा दी गई और कहा गया, ‘‘यह देखते हुए कि यह सब बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव की पूर्व संध्या पर हुआ है...’’ आरएसएस की सावधानी से रची गई पटकथा को आखिर 46 मिनट के अंदर ही क्यों बदलना पड़ा? इसकी वजह यह थी कि आडवाणी ने गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने पर अड़ंगा लगा दिया.

वे गडकरी के विरोध को लेकर मुखर थे और अध्यक्ष बनने के बाद से ही उनकी ‘अवसरवादी’ कार्यप्रणाली के आलोचक थे. पानी उस वक्त सिर तक आ गया जब पूर्ति ग्रुप के खिलाफ कॉर्पोरेट कदाचार के आरोप लगाए गए. आडवाणी अड़ गए और उन्होंने कहा कि गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने से ऐसे समय में गलत संदेश जाएगा, जबकि देश में पूरी तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बना हुआ है और लोग साफ-सुथरे विकल्प के लिए बीजेपी की तरफ देख रहे हैं.

लेकिन आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी गडकरी को समर्थन देने के मामले में अटल थे. भागवत ने ही 2009 में धड़ों में बंटी पार्टी का नेतृत्व करने के लिए राजनाथ की जगह अध्यक्ष के लिए गडकरी का चयन किया था. यहां तक कि भागवत ने सितंबर, 2012 में पार्टी को संविधान में संशोधन के लिए मजबूर किया था ताकि किसी व्यक्ति को लगातार दो बार अध्यक्ष बनाया जा सके. इस अपूर्व कदम के पीछे इरादा यह था कि बीजेपी पर नागपुर का नियंत्रण बना रहे और वह दिल्ली में पार्टी के छोटे-छोटे मामले में भी दखल रख सके.

राजनाथ की यह तरक्की एक तरह से मजाक ही है क्योंकि जिन्ना विवाद की वजह से आडवाणी के इस्तीफा देने के बाद जब दिसंबर, 2005 में राजनाथ अध्यक्ष बने, तब से ही आरएसएस ने बीजेपी के छोटे-से-छोटे मामले में भी दखल देना शुरू कर दिया था. इसके बाद से तो संघ ने बीजेपी के मामलों से खुद के दूर रहने का बहाना भी छोड़ दिया. गडकरी के कार्यकाल के दौरान पार्टी पर नागपुर की पकड़ शीर्ष स्तर पर पहुंच गई.

आडवाणी रहे हमले के अगुआ
आडवाणी ने बीजेपी को आजादी की एक झलक दिखाने की कोशिश की. उन्होंने गडकरी के उत्तराधिकारी के रूप में अपने विश्वासपात्रों सुषमा स्वराज, रविशंकर प्रसाद और यशवंत सिन्हा का नाम आगे बढ़ाने की कोशिश की. लेकिन आरएसएस गडकरी के नाम से चिपका रहा. मुंबई के वकील और बीजेपी सदस्य महेश जेठमलानी ने कोशिश की कि दिखावे के लिए ही सही, अध्यक्ष के चुनाव में मुकाबला हो. लेकिन पार्टी ने उन्हें नामांकन पत्र ही नहीं भरने दिया.

चुनाव की पूर्व संध्या पर इनकम टैक्स के छापों से आडवाणी को नया संबल मिला और उन्होंने इस मौके का इस्तेमाल आरएसएस पर हावी होने के लिए किया. इस बार आडवाणी ने आरएसएस को घुटने टेकने पर मजबूर करने के लिए अपने करीबी यशवंत सिन्हा का इस्तेमाल किया. सिन्हा ने संकेत दिया कि वे अध्यक्ष पद का चुनाव निर्विरोध नहीं होने देंगे.BJP

आडवाणी खुद 22 जनवरी को मुंबई में थे, जहां उत्तन में उनकी गडकरी और आरएसएस के सरकार्यवाह सुरेश ‘भैयाजी’ जोशी के साथ एक बैठक हुई. इसी बैठक में गडकरी ने आने वाले वक्त को भांप लिया. आडवाणी खुलकर उनके खिलाफ  थे और उधर दिल्ली में गडकरी को धक्का मारने की साजिश रची जा रही थी. इसके बाद गडकरी ने खुद ही चुनाव से दूर रहने का फैसला किया. आडवाणी का जोर सिन्हा को अध्यक्ष बनाने पर था, लेकिन गडकरी ने अपनी जगह आरएसएस के एक और पसंदीदा नेता राजनाथ को कुर्सी देने का सुझाव दिया. उसी दिन एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए भागवत भी मुंबई में थे. जोशी ने उनसे संपर्क किया और उन्हें उत्तन की बैठक के बारे में जानकारी दी.

भागवत ने आरएसएस के दूसरे वरिष्ठ नेताओं से संपर्क किया. एक शीर्ष नेता ने सुझाव दिया कि भागवत को अब गडकरी का और बचाव नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे खुद उनकी विश्वसनीयता दांव पर लग जाएगी.

इस बीच आडवाणी ने बीजेपी के दूसरे वरिष्ठ नेताओं को जानकारी दी. इसके बाद अरुण जेटली के अशोक रोड स्थित आवास पर शाम 7.30 बजे हुई बैठक में गडकरी की जगह राजनाथ को अध्यक्ष बनाने की संभावना पर विचार किया गया. इस बैठक में पार्टी महासचिव रामलाल और अनंत कुमार, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू और बलबीर पुंज शामिल हुए. बैठक के बाद देर शाम आम सहमति वाले उम्मीदवार के रूप में राजनाथ का नाम आगे बढ़ा.

पुराने खिलाड़ी के लिए नया इम्तहान
अब कमान राजनाथ के हाथ में है. उन्होंने तो पार्टी अध्यक्ष के रूप में अपने पहले भाषण से पूर्व ही अपनी आस्तीनें चढ़ा ली थीं. उनका लक्ष्य पूर्व निर्धारित है. जब वे कुर्सी संभाल ही रहे थे तो दक्षिण में बीजेपी शासित एकमात्र राज्य कर्नाटक में बगावत की तैयारी चल रही थी. सिंह ने आत्मविश्वास दिखाते हुए कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार से बात कर ली है और स्थिति नियंत्रण में है.

राजनाथ उत्तर प्रदेश के प्रभावशाली राजपूत समुदाय से हैं और वे इस प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. इससे पार्टी को इस महत्वपूर्ण राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद मिल सकती है, जो लोकसभा में 80 सांसद भेजता है. उन्होंने मोदी से अपने रिश्ते सुधारने के लिए दायरे से बाहर जाकर कोशिश की. गडकरी इस मामले में नाकाम रहे थे.

राजनाथ मोदी की चुनाव पूर्व विवेकानंद यात्रा को हरी झंडी दिखाने गुजरात गए थे और उन्होंने चुनावों के दौरान प्रचार भी किया. मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान वे मंच पर प्रमुखता से दिख रहे थे. ये दोनों नेता एक टीम की तरह काम कर सकते हैं. मोदी को अगर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया जाता है तो राजनाथ अपना ध्यान उत्तर प्रदेश में पार्टी की संभावनाओं में सुधार पर लगा सकते हैं. मोदी-राजनाथ के बीच तालमेल होगा और यह किस तरह से होगा, इसको लेकर तो अटकलें भी शुरू हो गई हैं.

राजनाथ की पहली परीक्षा इस साल के अंत में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों के दौरान होगी. पिछली बार जब इन राज्यों में चुनाव हुए थे, तब भी बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ ही थे. सिंह की अध्यक्ष की पहली पारी के दौरान पार्टी कई धड़ों में विभाजित हो गई.

आरएसएस को खुश करने के लिए मोदी को बीजेपी की शीर्ष निर्णायक समिति संसदीय बोर्ड से बाहर कर दिया गया था. तब आरएसएस से मोदी के रिश्ते तल्ख थे. राजनाथ का उस दौरान जेटली से भी तनावपूर्ण रिश्ता रहा. जेटली ने 2009 में चुनाव के दौरान सुधांशु मित्तल को पूर्वोत्तर का सह संयोजक बनाने का विरोध किया था और विरोध स्वरूप वे एक माह से ज्यादा समय तक बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठकों से दूर रहे.

राजनाथ के समर्थकों का कहना है कि मुमकिन है, उनसे शायद गलतियां हुई हों और 2009 के आम चुनावों में उनके नेतृत्व में पार्टी को हार मिली हो, लेकिन बीजेपी में नई ऊर्जा भरने के लिए रणनीति तैयार करने में इस बार उनके अनुभवों से मदद मिलेगी. और अगर उनके ज्योतिषी पर भरोसा किया जाए तो

किसी विकल्प के न रहने पर राजनाथ सिंह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में भी उभर सकते हैं.

-साथ में किरण तारे

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