scorecardresearch
 

उत्तर प्रदेशः भाजपा को राहत, विपक्ष को नसीहत

यूपी में सात सीटों पर विधानसभा के उपचुनाव में भाजपा अपने परंपरागत वोटों को सहेजने में सफल रही जिनके छिटकने का दावा विपक्ष कर रहा था. असल में विपक्षी पार्टियों का संगठन और वोट ही दरकता दिखाई पड़ा

भगवामय विधानसभा उपचुनाव की सात सीटों में से छह पर जीत के बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह को मिठाई खिलाते योगी आदित्यनाथ भगवामय विधानसभा उपचुनाव की सात सीटों में से छह पर जीत के बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह को मिठाई खिलाते योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश में 10 नवंबर की शाम चार बजे तक जैसे ही चुनाव आयोग ने विधानसभा उपचुनाव की सभी सात सीटों के नतीजे घोषि‍त किए लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश मुख्यालय में जश्न मनाया जाने लगा. प्रदेश की इन सात सीटों के उपचुनाव में भाजपा ने कुल छह सीटें, नौगवां सादात, बुलंदशहर सदर, घाटमपुर, बांगरमऊ, देवरिया सदर और टूंडला जीतीं, जबकि एक सीट, जौनपुर की मल्हनी पर सपा ने कब्जा जमाया. यह विधानसभा उपचुनाव प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए बेहद चुनौती भरे थे. पिछले चार महीनों के दौरान प्रदेश में कानपुर के बिकरू, हाथरस और प्रयागराज में घटी आपराधि‍क घटनाओं को लेकर विपक्षी दल यूपी की भाजपा सरकार से जनता का विश्वास हटने का दावा कर रहे थे. अक्तूबर में बलिया में कोटे की दुकान आवंटन को लेकर हुए हत्याकांड के बाद पिछड़ी जातियों के भाजपा से छिटकने के दावे भी विपक्ष कर रहा था

इतना ही नहीं, विधानसभा उपचुनाव के चुनाव प्रचार के दौरान विपक्षी पार्टियों ने कोरोना संक्रमण के दौरान यूपी में योगी सरकार के प्रबंधन पर सवाल खड़े कर वोट मांगा था. 10 नवंबर को शाम साढ़े चार बजे प्रदेश भाजपा मुख्यालय पहुंचे योगी आदित्यनाथ आत्मविश्वास से लबरेज थे. उन्होंने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह को मिठाई खि‍लाकर सात सीटों में से छह के जीतने पर बधाई दी. स्वतंत्रदेव सिंह के लिए भी यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि 22 अगस्त को भाजपा की नई प्रदेश कार्यकारिणी के गठन के बाद यह पहला चुनाव था.

सात सीटों पर हुए इन विधानसभा उपचुनावों में भाजपा अपने परंपरागत वोटों को सहेजने में कामयाब रही. कानपुर के बिकरू कांड के बाद सभी विरोधी पार्टियां ब्राह्मण मतदाताओं का भाजपा से मोहभंग होने का दावा कर रही थीं. इसी बीच सपा ने ब्राह्मणों को रिझाने के लिए लखनऊ में परशुराम की बड़ी प्रतिमा लगाने की घोषणा की थी. वर्ष 2022 के विधानसभा आम चुनाव से पहले देवरिया सदर विधानसभा चुनाव सभी पार्टियों के बीच उनकी ब्राह्मण राजनीति की लोकप्रियता आंकने का पैमाना बन गया था. भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा ने यहां पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे. सपा ने तो पूर्वांचल के कद्दावर ब्राह्मण नेता और पूर्व मंत्री ब्रह्माशंकर त्रिपाठी को टिकट दिया था. यहां भाजपा ने सपा को 20 हजार से अधि‍क मतों से पटखनी दी. देवरिया के एक इंटर कॉलेज के प्राचार्य रामकृष्ण तिवारी कहते हैं, ''सपा उम्मीदवार के पक्ष में सपा का कोई बड़ा नेता देवरिया प्रचार करने नहीं आया जबकि भाजपा ने रणनीति के तहत ब्राह्मण नेताओं की पूरी फौज खड़ी कर दी थी. देवरिया चुनाव में सपा की संगठनात्मक कमजोरी स्पष्ट हो गई है.''

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों में बांगरमऊ विधानसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार कुलदीप सिंह‍ सेंगर ने 44 प्रतिशत वोट पाकर पहली बार यह सीट भाजपा की झोली में डाली थी. रेप के मामले में कुलदीप सेंगर को सजा मिलने के बाद यह सीट रिक्त हुई थी. भाजपा ने इस सीट पर उन्नाव के जिला अध्यक्ष और कुर्मी बिरादरी से आने वाले नेता श्रीकांत कटियार को चुनाव में उतारा था. ओबीसी बाहुल्य इस सीट पर श्रीकांत ने दलित, ठाकुर, ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ी संख्या में वोट बटोरकर भाजपा को एकतरफा जीत दिलाई. लखनऊ विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर बृजेश कुमार बताते हैं, ''विधानसभा उपचुनावों ने यह जाहिर कर दिया है कि अपर कास्ट और ओबीसी के रूप में भाजपा का परंपरागत वोट अभी भी उसके साथ है. जब तक विपक्षी दल भाजपा के इस वोट बैंक को तोड़ नहीं पाते वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में उनकी राह आसान नहीं होने वाली.''

हाथरस में दलित युवती से रेप और बाद में उसकी मौत के बाद पूरा विपक्ष यूपी में दलितों की सुरक्षा को लेकर प्रदेश की भाजपा सरकार के खि‍लाफ हमलावर हो गया था. कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव और यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने पीडि़त दलित परिवार से मिलने हाथरस पहुंचकर प्रदेश की भाजपा सरकार को दलित विरोधी साबित करने का हर संभव प्रयास किया था. इसी क्रम में राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने भी इस मुद्दे पर पश्चि‍मी यूपी में स्वाभि‍मान रैलियां कर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार का मुखर विरोध किया था. इसीलिए बुलंदशहर सदर विधानसभा उपचुनाव ने पश्चिम में दोबारा पांव जमाने की कोशि‍शों में जुटी रालोद की राजनैतिक पकड़ का इम्तिहान भी लिया.

जयंत के साथ रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजित सिंह ने बुलंदशहर में रैली की थी. चुनाव नतीजों ने अजित सिंह और जयंत चौधरी की जोड़ी की दरकती जमीन को एक बार फि‍र जाहिर कर दिया. सपा के समर्थन से बुलंदशहर सदर विधानसभा उपचुनाव लड़े रालोद उम्मीदवार सात हजार से कुछ अधि‍क वोट पाकर अपनी जमानत जब्त करा बैठे. मेरठ कालेज में अर्थशास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर मनोज सिवाच बताते हैं, ''अजित सिंह ने जिस तरह से रालोद को सपा की पिछलग्गू पार्टी बना दिया है उससे जाट मतदाता नाराज हैं. पश्चिम में रालोद और सपा के संगठन के बीच तालमेल नहीं है.''

दलित वोट भी बसपा से खि‍सकते दिखाई दे रहे हैं. बुलंदशहर सदर के चुनाव नतीजों ने दलित मतदाताओं के बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की लगातार ढीली होती पकड़ की ओर भी इशारा किया है. बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के समर्थक दलित वोट बैंक को भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (आसपा) से कड़ी चुनौती मिली. जनवरी में गठन के बाद आसपा पहली बार चुनावी राजनीति में कूदी थी. बुलंदशहर उपचुनाव में बसपा भले ही दूसरे नंबर पर रही लेकिन आसपा दलित वोटों पर सेंध लगाकर तीसरे नंबर पर थी.

आसपा के लिए खास बात यह भी रही कि बुलंदशहर के उपचुनाव में इस पार्टी ने सपा-रालोद गठबंधन और कांग्रेस से अधि‍क वोट पाए. घाटमपुर सुरक्षि‍त सीट पर दलित वोटों के बल पर अपनी जीत पक्की मानकर चल रही बसपा न केवल हारी बल्कि 2017 के विधानसभा चुनाव की अपेक्षा इस बार एक पायदान और नीचे (तीसरे पायदान) पर पहुंच गई.

उपचुनावों में मुस्लिम मतादाताओं ने किसी एक पार्टी को एकतरफा वोट नहीं दिया. घाटमपुर सुरक्षि‍त सीट पर मुस्लि‍म मतदाता कांग्रेस के पाले खड़ा दिखाई दिया. यही वजह रही कि घाटमपुर के साथ बांगरमऊ विधानसभा सीट पर कांग्रेस सपा को पीछे छोड़कर रनरअप रही. वहीं, बुलंदशहर सदर विधानसभा सीट पर भी सपा-रालोद गठबंधन को पीछे छोड़कर तीसरा स्थान प्राप्त किया. मेरठ विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग के रिटायर प्रोफेसर राम प्रताप सिंह कहते हैं,

''विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने सपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों की संगठनात्मक कमजोरी की ओर इशारा किया है. इन उपचुनावों में एक ओर जहां भाजपा ने अपना पूरा संगठन चुनाव प्रचार में उतार दिया था, वहीं सपा और कांग्रेस के बड़े नेताओं ने चुनाव प्रचार से दूरी बनाए रखी. अगर दोनों दल इसी तरह संगठन को उपेक्षित करते रहे तो 2022 के विधानसभा चुनाव में इन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा.''

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें