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उत्तराखंडः पहाड़ पर पसोपेश

भाजपा को सरकार से लोगों की नाराजगी का एहसास है इसलिए पार्टी कोरोना की दूसरी लहर में अपने संगठन को सक्रिय कर रही है

दीनदयाल उपाध्याय जिला चिकित्सालय, देहरादून के परिसर में 100 शैय्याओं के चिकित्सालय का लोकार्पण दीनदयाल उपाध्याय जिला चिकित्सालय, देहरादून के परिसर में 100 शैय्याओं के चिकित्सालय का लोकार्पण

भाजपा के राष्ट्रीय अध्य्क्ष जे.पी.नड्डा ने पिछले हफ्ते पार्टी कार्यकर्ताओं से 'सेवा ही संगठन' अभियान चलाने की गुजारिश की. उससे ठीक पहले संघ का वह फीड बैक उन्हें मिल गया था, जिसमें कोरोना की दूसरी लहर को संभालने में सरकारी नाकामी की वजह से लोगों में सरकार और नेतृत्व के प्रति गुस्सा होने की बात कही गई थी. यह चर्चा खासकर उन 5 राज्यों के हालात केबारे में थी, जहां अगले साल की शुरुआत में विधानसभा के चुनाव होने है, लेकिन भाजपा के लिए नाजुक कड़ी उत्तराखंड है. आखिर राज्य में कोविड-19 की दूसरी लहर के लिए कुंभ के आयोजन को प्रमुख वजह बताया जा रहा है.

चिंता की बात सिर्फ इतनी नहीं है. पिछले 4 साल से राज्य सरकार के प्रति लोगों और संगठन में नाराजगी इतनी बढ़ गई है कि भाजपा आलाकमान को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाना पड़ा. उनकी जगह तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन उनके पास पिछली सरकार की गलतियों को सुधारने के लिए समय काफी नहीं है. केंद्रीय नेतृत्व ने जब उन्हें जिम्मेदारी दी थी तो सोचा गया था कि तीरथ सिंह रावत तेजी से काम करके स्थिति को संभाल लेंगे, लेकिन वे लटके पड़े निर्माण कार्यों और लोकलुभावन योजनाओं की मद में कुछ कर पाते उससे पहले ही कोरोना की दूसरी लहर से राज्य में जैसी अफरा-तफरी मची, उसने मुख्यमंत्री की कार्य क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया.

मौजूदा हालात में उत्तराखंड में भाजपा तीरथ सिंह के नेतृत्व में चुनाव लड़े, ऐसे हालात पार्टी के लिए बचे नहीं हैं. भाजपा के एक नेता कहते है, ''जब त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाया गया था तो राज्य इकाई के लिए यह साफ संकेत था कि अगला चुनाव मुख्यमंत्री के नेतृत्व में ही होगा, लेकिन जिस तरह से भाजपा नेतृत्व सरकार से ज्यादा संगठन के जरिए कोरोना पीड़ितों की मदद के लिए मशक्कत कर रहा है, उससे साफ लगता है कि तीरथ सिंह 2022 के चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा नही होंगे.'' भाजपा के मुख्य प्रवक्ता अनिल बलूनी कहते हैं, ''पार्टी मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़ेगी या नहीं, यह संसदीय बोर्ड तय करेगा. पार्टी 2012 में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके लड़ी थी, लेकिन 2017 में सामूहिक नेतृत्व में पार्टी चुनाव लड़ी और 57 सीट जीतकर इतिहास रचा.''

बलूनी की बात में दम है. वैसे भी 2014 के बाद से विधानसभा के चुनाव में जहां भाजपा सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ी, वहां नतीजे बेहतर रहे. इसके उलट जहा मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर लड़ा गया, वहां इक्के-दुक्के अपवादों को छोड़ दिया जाए तो पार्टी को उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं मिले. हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल, गोवा जैसे राज्यों में सामूहिक नेतृत्व में पार्टी लड़ी और बेहतर नतीजे मिले. बाद में झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा जैसे राज्यों में जब मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट करके लड़ा गया तो सीटें घट गईं. हरियाणा के अलावा सभी राज्यों के चुनाव में पार्टी हारी. पिछले दिनों असम में पार्टी सामूहिक नेतृत्व में लड़ी तो सफलता मिली.

भाजपा के एक महासचिव कहते हैं, ''मुख्य रूप से संगठन ही चुनाव लड़ता है, और कई नेता ऐसे होते है जो अपनी जिम्मेदारी मिलने पर संगठन की पहचान बन जाते हैं. मसलन, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान, कर्नाटक में येदियुरप्पा, महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़नवीस, या हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर, लेकिन कई राज्य में ऐसा नही हो पाता है और फिलहाल उत्तराखंड भी इसी श्रेणी में है.''

मतलब यह कि भाजपा उत्तराखंड का अगला चुनाव अपने संगठन की ताकत पर लड़ेगी, राज्य सरकार के काम पर नहीं? पार्टी के वे महासचिव कहते हैं, '' भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास कार्य और अपने संगठन के दम पर लड़ेगी.'' बलूनी कहते हैं, ''राज्य में भाजपा का संगठन काफी मजबूत है. कांग्रेस में अंदरूनी लड़ाई है. आम आदमी पार्टी भी वहां चुनाव लड़ेगी. ऐसे में कांग्रेस का जो थोड़ा बहुत वोट है, वह बंटेगा और भाजपा 2017 से भी बड़ी जीत हासिल करेगी.'' अपने संगठन के मजबूत होने के दावे पर पार्टी नेताओं का इस कदर जोर देने से साफ है कि भाजपा राज्य में सरकार के कामकाज पर दोबारा बहुमत हासिल करने की जगह अपने संगठन की क्षमता पर ज्यादा भरोसा कर रही है.

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