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भाजपाः संगठन पीछे, मंत्री आए आगे

भाजपा ने अगले साल पांच राज्यों के चुनावों के प्रभारी केंद्रीय मंत्रियों को ही बनाया. पार्टी संगठन को मामूली मौका ही मिला

क्रीम पर भरोसा 1. केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को मणिपुर 2. केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को उत्तर प्रदेश 3.केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को पंजाब, और 4. केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को उत्तराखंड की मिली चुनावी जिम्मेदारी क्रीम पर भरोसा 1. केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को मणिपुर 2. केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को उत्तर प्रदेश 3.केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को पंजाब, और 4. केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को उत्तराखंड की मिली चुनावी जिम्मेदारी

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने अगले साल की शुरुआत में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए प्रभारियों और सह-प्रभारियों की पिछले हफ्ते बुधवार को घोषणा की तो उन्हें जीत के लिए सरकार के मंत्री ही ज्यादा भरोसेमंद लगे. संगठन के पदाधिकारी पीछे छूट गए. कुल 21 नामों में सिर्फ दो ही पार्टी संगठन से जगह बना पाए. चुनाव वाले पांचों राज्यों में से चार (उत्तर प्रदेश, उतराखंड, गोवा और मणिपुर) में सरकार बचाने और एक (पंजाब) में सरकार बनाने की चुनौती है.

चुनौती से निपटने में शायद नड्डा ने केंद्र और राज्य सरकार के मंत्रियों को ही ज्यादा मुफीद समझा. पार्टी संगठन के जिन दो लोगों पर भरोसा किया गया, उनमें महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देवेंद्र फडणवीस को गोवा का चुनाव प्रभारी और दूसरे, पार्टी के प्रवक्ता सरदार आर.पी. सिंह को उत्तराखंड का सह-प्रभारी बनाया गया है.

पांचों राज्यों के लिए कुल 21 प्रभारियों और सह-प्रभारियों में केंद्र और राज्य सरकारों के14 मंत्री हैं. उनके अलावा, पांच सांसद और पूर्व विधायक हैं लेकिन पार्टी संगठन में किसी पद पर नहीं हैं. देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को बनाया गया है. उनके साथ चार सह प्रभारी अनुराग ठाकुर, अर्जुन राम मेघवाल, शोभा करंदलजे और अन्नपूर्णा देवी हैं. ये सभी केंद्र में मंत्री हैं. इनके अलावा, राज्यसभा के दो सदस्य विवेक ठाकुर और सरोज पांडे तथा हरियाणा सरकार के पूर्व मंत्री कैप्टन अभिमन्यु भी सह-प्रभारी हैं.

मणिपुर विधानसभा चुनाव के लिए प्रभारी केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव हैं, तो सह-प्रभारी केंद्रीय राज्यमंत्री प्रतिमा भौमिक और असम सरकार के कैबिनेट मंत्री अशोक सिंघल हैं. उत्तराखंड का चुनाव प्रभारी केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को बनाया गया है. यहां सह-प्रभारी के रूप में संगठन से सिर्फ आर.पी. सिंह को लिया गया है. दूसरी सह-प्रभारी सांसद लॉकेट चटर्जी हैं. पंजाब का प्रभार केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को दिया गया है. उनके साथ केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और मीनाक्षी लेखी तथा सांसद विनोद चावड़ा सह-प्रभारी बनाए गए हैं. संगठन के लिहाज से सिर्फ गोवा में ही पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देवेंद्र फडणवीस को चुनाव प्रभारी बनाया गया है. उनके साथ दो केंद्रीय मंत्रियों जी. किशन रेड्डी और दर्शना जर्दोश को सह-प्रभारी नियुक्त किया गया है.

कोरोना की दूसरी लहर की तबाही, लोगों के जर्जर माली हालात, महंगाई और तीव्र किसान आंदोलन के बीच होने वाले इन पांच राज्यों के चुनावों को मोदी-2 सरकार की अग्निपरीक्षा के रूप में देखा जा रहा है. ऐसे में क्या वजह है कि चुनाव प्रभारी जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संगठन की जगह सरकार के मंत्रियों को दी गई है? भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''1999 में बेंगलूरू में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी यह सवाल उठा था. अटल बिहारी वाजपेयी तब प्रधानमंत्री थे. उन्होंने तब कहा था कि भाजपा में दो महाजन हैं. प्रमोद महाजन और सुमित्रा महाजन. लेकिन सरकार में सिर्फ एक महाजन इसलिए हैं क्योंकि सरकार में क्रीम चाहिए जो मैंने (वाजपेयी) ले लिया.'' निहितार्थ यह है कि संगठन के ज्यादातर क्रीम सरकार में मंत्री बन गए तो उन्हें ही चुनाव की जिम्मेदारी दी गई है.

हालांकि मौजूदा दौर में पहले के चुनावों में पार्टी के महासचिव, उपाध्यक्ष या सचिव रहे भूपेंद्र यादव, अनिल जैन, सरोज पांडे, अरुण सिंह वगैरह को चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई थी. यह शायद पहली बार है कि पार्टी के किसी महासचिव या सचिव को जिम्मेदारी नहीं मिली. यही नहीं, फडणवीस के सिवा किसी और उपाध्यक्ष को भी यह मौका नहीं मिला.

भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी की सफाई है, ''केंद्रीय मंत्रियों के चुनाव प्रभारी बनने से संगठन को ताकत मिलेगी. संगठन और सरकार दोनों के लोग मिलकर मेहनत करेंगे और परिणाम हमारे पक्ष में आएंगे.'' लेकिन हकीकत यही है कि कमान केंद्रीय मंत्रियों के हाथों में होगी तो चुनाव नतीजों की जिम्मेदारी भी सरकार की होगी क्योंकि संगठन पीछे छूट गया है.

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