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उत्तर प्रदेशः आगे रहने को पिछड़ा दांव

आसन्न विधानसभा चुनावों से पूर्व प्रदेश के सबसे बड़े वोट बैंक अन्य पिछड़ा वर्ग को लुभाने के लिए भाजपा ने उठाए कई निर्णायक कदम

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दो हाथ ऊपर भाजपा प्रदेश पिछड़ा वर्ग मोर्चा का अध्यक्ष बनाए जाने पर नरेंद्र कश्यप लखनऊ में समर्थकों के बीच
दो हाथ ऊपर भाजपा प्रदेश पिछड़ा वर्ग मोर्चा का अध्यक्ष बनाए जाने पर नरेंद्र कश्यप लखनऊ में समर्थकों के बीच

शिक्षक भर्ती में आरक्षण के मुद्दे को लेकर लखनऊ के कांशीराम ईकोगार्डन में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अभ्यर्थियों ने पहली जुलाई से प्रदर्शन शुरू कर दिया था. 2020 में बेसिक शिक्षा विभाग ने 69,000 शिक्षकों की भर्ती की थी. अभ्यर्थियों का आरोप है कि ओबीसी को शिक्षकों की भर्ती में निर्धारित 27' की बजाय 4' से भी कम आरक्षण मिला है.

आरक्षण में गड़बड़ी का आरोप लगाकर अभ्यर्थी लखनऊ में लगातार प्रदर्शन कर रहे थे. हालांकि बेसिक शिक्षा मंत्री सतीश चंद्र द्विवेदी ने 20 जुलाई को अभ्यर्थियों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर स्पष्ट कर दिया था कि शिक्षक भर्ती में ओबीसी आरक्षण को लेकर कोई गड़बड़ी नहीं हुई है. फिर भी प्रदर्शन जारी था.

2 अगस्त की सुबह 10 बजे ये अभ्यर्थी राजधानी में ही 7, कालिदास मार्ग स्थित उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के सरकारी आवास के बाहर प्रदर्शन करने जा पहुंचे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संयोगवश उसी समय पड़ोस में ही 5, कालिदास मार्ग स्थित सरकारी आवास पर जनता दर्शन में लोगों की समस्याएं सुन रहे थे.

हाल की खिड़की से उन्होंने अभ्यर्थियों को नारेबाजी करते देखा तो अधिकारियों के जरिए उन्हें बुलाया और उनकी समस्याएं सुनीं. मुख्यमंत्री ने तुरंत बेसिक शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों को दस दिन के भीतर शिक्षक भर्ती में आरक्षण की गड़बड़ी के आरोपों की जांच करते हुए अभ्यर्थियों की शिकायतें दूर करने का आदेश दिया.

प्रदर्शनकारियों में से एक रामसागर पटेल बताते हैं, ‘‘शिक्षक भर्ती में 5,844 सीटों पर आरक्षण में गड़बड़ी हुई है. मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद अधिकारियों का रवैया सकारात्मक है. 15 अगस्त से पहले समाधान की उम्मीद जगी है.’’

यूपी में 2022 के विधानासभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने में अब छह महीने से भी कम का समय है. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जातिगत समीकरणों को हर तरह से दुरुस्त कर लेना चाहती है. इसी क्रम में 29 जुलाई को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए मेडिकल एजुकेशन से जुडे अखिल भारतीय कोटे (एक्यूआइ) में ओबीसी समुदाय के लिए बड़ा कदम उठाया है.

अब एक्यूआइ योजना में ओबीसी के लिए 27 फीसदी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 फीसदी सीटें आरक्षित रखी जाएंगी. 12 दिन बाद मोदी सरकार ने ओबीसी के हितों से जुड़ा 127वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया. लोकसभा और राज्यसभा से पारित इस विधेयक में प्रावधान है कि राज्य अपने हिसाब से ओबीसी का निर्धारण कर सकेंगे.

मोदी सरकार के इन फैसले को अगले विधानसभा चुनाव से पहले मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है क्योंकि यूपी में ओबीसी वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा (54') है. लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीतिक शास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. एस.के. द्विवेदी बताते हैं, ‘‘2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुसंख्य ओबीसी मतदाताओं का समर्थन मिला था.

तभी तो पार्टी के 312 विधायकों में से 101 पिछड़ी जाति के जीते थे. सरकार में ओबीसी नेताओं को पर्याप्त तवज्जो न दिए जाने और आरक्षण, जातिगत जनगणना जैसी मांगों पर पिछड़े वर्ग में नाराजगी है. यही वजह है कि विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा सरकार पिछड़े वर्ग को लुभाने में जुट गयी है.’’

उत्तर प्रदेशः आगे रहने को पिछड़ा दांव
उत्तर प्रदेशः आगे रहने को पिछड़ा दांव

वर्ष 2001 में पेश हुई सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक यूपी में पिछड़ी जाति की आबादी 54' है. इन जातियों में सबसे ज्यादा यादव हैं. इसके बाद कुर्मी, लोध, पाल, निषाद जैसी जातियों का नंबर आता है. 2017 के विधानसभा चुनाव में गैर यादव पिछड़ी जातियों का बहुसंख्य वोट भाजपा को मिला था. उसी बूते भाजपा विधानसभा की 403 में 312 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी.

प्रदेश में पिछड़े वर्ग का समर्थन बरकरार रखने को भाजपा ने जुलाई, 2019 में कुर्मी जाति के स्वतंत्रदेव सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था. मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री मौर्य के बीच मनमुटाव की खबरों के कारण ओबीसी मतदाताओं में दुविधा पनप रही थी. 22 जून को योगी ने मौर्य के घर पहुंचकर मनमुटाव को विराम देने की कोशिश की थी.

मार्च 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में मौर्य भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे. उन्हें मुख्यमंत्री न बनाए जाने पर पिछड़ी जातियां नाराज चल रही हैं. मौर्य स्पष्ट करते हैं, ''अपेक्षाओं को मैं गलत नहीं मानता. यूपी में सपा, बसपा और कांग्रेस ने पिछड़े वर्ग के लोगों को वह सम्मान नहीं दिया है जो भाजपा ने दिया है.

मुझे जिस प्रकार का स्थान भाजपा ने दिया है वैसा कभी किसी और पार्टी ने किसी को नहीं दिया’’ (देखें इंटरव्यू). आसन्न विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा ने ओबीसी मतदाताओं में पकड़ मजबूत करने के लिए फिर से मौर्य को आगे किया है. जनता की समस्याएं सुलझाने को वे हर सोमवार अपने सरकारी आवास पर जनता दर्शन आयोजित कर रहे हैं. विभिन्न जिलों का दौरा कर वे विकास योजनाओं की शुरुआत करने में भी व्यस्त हैं. 

मोदी सरकार के 7 जुलाई को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में यूपी में ओबीसी मतों को सहेजने की चिंता साफ दिखाई दे रही थी. मोदी मंत्रिमंडल में यूपी से पूरे सात नए मंत्री शामिल हुए. इनमें से तीन पिछड़ी जाति से हैं. गैर-यादव पिछड़ी जातियों में कुर्मी कुल ओबीसी आबादी का करीब सात फीसदी हैं.

कुर्मी जाति को साधने के लिए मोदी मंत्रिमंडल में मिर्जापुर से सांसद अनुप्रिया पटेल और महराजगंज के सांसद पंकज चौधरी को जगह दी गई है. पूर्वांचल में बस्ती से लेकर बलिया जिले की 50 से अधिक विधानसभा सीटों पर कुर्मी बिरादरी काफी प्रभावी है. इसीलिए पूर्वांचल से दोनों मंत्री इसी बिरादरी से हैं.

मोदी मंत्रिमंडल में पहली बार लोध जाति को भी स्थान देते हुए राज्यसभा सांसद बीएल वर्मा को शामिल किया गया है. पिछड़ों में करीब पांच प्रतिशत की हिस्सेदारी वाली लोध जाति को भाजपा का सबसे बड़ा समर्थक माना जाता है. पूर्व मुख्यमंत्री और राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले कल्याण सिंह इस जाति के सबसे प्रभावशाली नेता माने जाते हैं.

गंभीर स्वास्थ्य के कारण वे बीते डेढ़ महीने से लखनऊ के संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआइ) में भर्ती हैं. कल्याण सिंह की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लखनऊ आने वाला भाजपा का हर केंद्रीय नेता एसजीपीजीआइ जाकर पूर्व मुख्यमंत्री के स्वास्थ्य की जानकारी अवश्य लेता है.

1 अगस्त को लखनऊ में फॉरेंसिक इंस्टीट्यूट का उद्घाटन करने पहुंचे गृह मंत्री अमित शाह भी कल्याण सिंह को देखने पहुंचे थे. अलीगढ़ में भाजपा के पूर्व जिला सचिव संजय लोध बताते हैं, ''जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कल्याण सिंह जी के इलाज की निरंतर निगरानी कर रहे हैं उसकी मिसाल दूसरी नहीं है. इससे लोध जाति में एक सकारात्मक संदेश गया है.’’

ओबीसी की जनगणना और आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा को चुनौती मिल रही है. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग मोर्चा के अध्यक्ष विकास पटेल कहते हैं, ''भाजपा केवल ओबीसी नेताओं का चेहरा दिखाकर ही अगले विधानसभा चुनाव में वोट लेना चाहती है. जातिगत जनगणना जैसे जरूरी मुद्दे पर पार्टी कोई भी पहल नहीं करना चाहती.’’

भाजपा को सबसे ज्यादा चुनौती सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर से मिल रही है. 2017 का विधानसभा चुनाव सुभासपा और भाजपा ने मिलकर लड़ा था. सुभासपा ने चार सीटें जीती थीं. भाजपा सरकार बनने के बाद राजभर को योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया था.

उन्होंने जातिगत जनगणना, सामाजिक न्याय समिति-2001 की रिपोर्ट लागू करवाने जैसी मांगों को लेकर बगावती तेवर अपना लिए थे. लोकसभा चुनाव समाप्त होते ही मई, 2019 में मुख्यमंत्री योगी ने उन्हें सरकार से बर्खास्त कर दिया था.

पिछड़ी जातियों में 2.44 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले राजभर समाज के प्रभावशाली नेता ओम प्रकाश राजभर अब मुख्यमंत्री योगी को अपना दुश्मन नंबर वन मानते हैं. तल्ख लहजे में वे कहते हैं, ''2022 का विधानसभा चुनाव भाजना ने अगर योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में लड़ा तो सारी मांगें मान लेने के बावजूद मेरी पार्टी भाजपा से कोई गठबंधन नहीं करेगी.’’

राजभर ने पिछड़ी जाति से संबंध रखने वाले नेता बाबूसिंह कुशवाहा, रामधनी बिंद, बाबूराम पाल, प्रेमचंद्र प्रजापति और अनिल सिंह चौहान आदि को लेकर भागीदारी संकल्प मोर्चा का गठन किया है. भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता समीर सिंह का दावा है कि ‘‘योगी सरकार की विकास योजनाओं से राजभर समेत सभी पिछड़ी जातियों को लाभ मिला है. राजभर समाज में घटते समर्थन के चलते ही ओम प्रकाश ऊलजुलूल बक रहे हैं.’’

अन्य पिछड़ा वर्ग में जातियों को शामिल करने का अधिकार राज्यों को देने संबंधी संविधान संशोधन बिल लोकसभा और राज्यसभा से पारित होने के बाद यूपी में भी ओबीसी आरक्षण की कवायद शुरू हो गई है. प्रदेश में ओबीसी सूची में 79 जातियां शामिल हैं.

उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के पास कुल 70 जातियों के प्रतिवेदन आए हैं जिनमें से 39 को मानकों के आधार पर विचार के लिए चयनित किया गया है. जल्द ही इन 39 जातियों को भी ओबीसी सूची में शामिल करने का निर्णय लिया जा सकता है. 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन की तपिश दूर करने के लिए भाजपा ने ओबीसी कार्ड खेला है. सैनी और कश्यप पश्चिमी यूपी की दो प्रमुख पिछड़ी जतियां हैं. सहारनपुर निवासी जसवंत सैनी को उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष तो गाजियाबाद के रहने वाले नरेंद्र कश्यप को भाजपा ओबीसी मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है.

भाजपा ओबीसी मोर्चा की 25 सदस्यीय कार्यकारिणी में निषाद, प्रजापति, तेली, गुर्जर, सैनी, सराहू, जाट जैसी अलग-अलग पिछड़ी जातियों के एक-एक नेता को जगह दी गई है. ये पिछड़ी जातियां भाजपा को कितना समर्थन देती हैं, यह वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजे ही बताएंगे. तब तक उन्हें मनाने-रिझाने का खेल यूं ही चलता रहेगा.

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