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दूरदराज के गांवों पर दांव

भूपेश बघेल ने ग्रामीण छत्तीसगढ़ के सघन दौरों और सरकारी कल्याण योजनाओं के जमीनी आकलन के साथ 2023 में फिर से चुने जाने का अभियान शुरू किया.

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जनता के बीच सरकार : मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अंबिकापुर के मंगरेलगढ़ गांव में लोगों से बातचीत करते हुए जनता के बीच सरकार : मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अंबिकापुर के मंगरेलगढ़ गांव में लोगों से बातचीत करते हुए

यह 11 मई है और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के जारी भेंट-मुलाकात अभियान का सातवां दिन है. अंबिकापुर जिले के मंगरेलगढ़ गांव में बघेल और उनके मंत्रियों-अधिकारियों का काफिला हेलिकॉप्टर से उतरता है, तो गहमगहमी मच जाती है. गांव वाले हाइ-प्रोफाइल अतिथि के स्वागत को दौड़ पड़ते हैं, जो यहां सरकारी योजनाओं का हाल-चाल जानने पहुंचे हैं.

स्थानीय विधायक तथा खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री अमरजीत भगत की सलाह पर वे हेलिपैड से मंगरेलगढ़ देवी के मंदिर की ओर पैदल चल पड़ते हैं. उसके बाद वे साल के पत्तों से छाए शामियाने में बैठ जाते हैं. वे गांववालों से पूछते हैं, ''क्या सभी के किसानी कर्ज माफ हो गए? सरकार को धान बेच कर क्या आपको अच्छी रकम मिली है?’’ ज्यादातर सकारात्मक जवाब सुनकर वे कुछ हल्की-फुल्की बातें करने लगते हैं.

अगर आप सोच रहे हैं कि कांग्रेस चुनावों की जल्दी तैयारी में पीछे है और वह अपने असर पर आश्रित है तो बघेल आपको गलत साबित करने जा रहे हैं. राज्य भर में सभी 90 विधानसभा क्षेत्रों में तीन गांवों का दौरा कर चुके मुख्यमंत्री को काम का आदमी माना जाता है, जो स्थानीय मुद्दों को खुद सुलझा देते हैं.

उनके 42 महीनों के कार्यकाल में शुरू हुईं ज्यादातर योजनाओं का फोकस ग्रामीण इलाके हैं, चाहे कर्ज माफी हो या एमएसपी से ज्यादा कीमत पर धान की खरीद, ग्रामीण भूमिहीन मजदूरों के लिए योजनाएं या गोबर खरीद. सीएम जमीन पर उनका असर देखना चाहते हैं. भेंट-मुलाकात अभियान के जरिए बघेल यह भी देखना चाहते हैं कि 2023 में जीत के लिए गांवों पर फोकस काम का है या नहीं.

लोगों तक पहुंचने की अपनी रणनीति को धारदार बनाने के अलावा बघेल को पार्टी की भीतरी चुनौती का भी सामना करना है. स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और पंचायत मंत्री टी.एस. सिंहदेव और उनके वफादारों की गैर-मौजूदगी संदिग्ध बनी हुई है. भेंट-मुलाकात अभियान सरगुजा के पुराने महाराजा के इलाके में थी तब भी वे नदारद थे. 

जनता के लिए योजनाएं

बघेल किन योजनाओं पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं और कैसे उनसे 2023 में उन्हें राजनैतिक फायदा मिलेगा? 2018 में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस सरकार का पहला ऐलान था अपने चुनावी वादे किसान कर्ज माफी का. इस तरह 16.7 लाख किसानों के कर्ज माफ हुए, जिससे सरकारी खजाने पर 6,100 करोड़ रु. का बोझ पड़ा. अगला ऐलान धान खरीद योजना थी, जिसे राजीव गांधी न्याय योजना कहा गया और उसके तहत 2,500 रु. क्विंटल की दर से धान किसानों से खरीदी गई, जबकि केंद्र ने एमएसपी 1,940 रु. तय किया था.

राज्य देश में सबसे ऊंचे दाम पर धान खरीदता है और खरीद भी साल-दर-साल बढ़ी है. दूसरी फसलें उगाने वाले किसानों को लागत और फसल विविधीकरण प्रोत्साहन की मद में प्रति एकड़ 10,000 रु. सब्सिडी दी जाती है. यही नहीं, अनोखी गोधन न्याय योजना या गाय का गोबर खरीद योजना भी है. इसके तहत किसानों से गाय का गोबर 2 रु. किलो खरीदा जाता है, उसे वर्मीकंपोस्ट बनाया जाता है और किसानों तथा सरकारी विभागों को 10 रु. किलो के भाव में बेचा जाता है.

यह योजना 2020 से शुरू हुई और तब से 69.2 लाख ‌क्व‌िंटल गोबर 138.56 करोड़ रु. में खरीदी गई है. छत्तीसगढ़ में करीब 3,10,000 पशु पालकों में 2,11,000 ने सरकार का गोबर बेचा है. अब तक 10.3 लाख ‌क्व‌िंटल वर्मीकंपोस्ट की बिक्री हो चुकी है, जिसे अच्छी प्राकृतिक खाद माना जाता है. इस योजना में गौ-मूत्र को जोड़ने की कोशिश हो रही है.

फिलहाल यह योजना फायदेमंद नहीं है, लेकिन इसके जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जान डालने की कोशिश हो रही है. गोधन न्याय योजना के तहत स्थापित गौठान में कार्यरत महिला स्वयं सहयता समूह गाय के गोबर से कई तरह की चीजें बना रहे हैं. पर्यावरण अनुकूल दीये से लेकर गणेश की प्रतिमाएं, कैंडलस्टैंड से लेकर गमले वगैरह जैसी चीजों का बाजार भी ठीक-ठाक है. अगला कदम है गाय के गोबर से सीमेंट और ईंट बनाने का.

ग्रामीण छत्तीसगढ़ के लिए सबसे नई योजना राजीव गांधी भूमिहीन कृषि मजदूर न्याय योजना है. इसके तहत पंजीकरण करके भूमिहीन मजदूर हर साल 7,000 रु. पाने के हकदार होंगे. इससे 10 लाख से जयादा मजदूर लाभान्वित हो सकते हैं.

जाहिर है, छत्तीसगढ़ की योजनाएं लाभार्थियों के हाथ में पैसा पहुंचाती हैं, जिससे राजनैतिक समर्थन मिलने की उम्मीद की जाती है. कहा जाता है कि हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में यही तरीका भाजपा के लिए गेमचेंजर साबित हुआ, जहां पीएम आवास योजना, करीब डेढ़ करोड़ लोगों को मुफ्त राशन और नकदी हस्तांतरण योजनाएं चल रही थीं. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार हर छोटे और सीमांत किसान को 4,000 रु. दे रही है, जो पीएम किसान सम्मान योजना के तहत मिलने वाले 6,000 रु. के अतिरिक्त है.

राजनैतिक गणित

मुख्यमंत्री बघेल के राजनैतिक सलाहकार राजेश तिवारी कहते हैं, ''15 विधानसभा क्षेत्र पूरी तरह शहरी हैं और 10 में शहरी-ग्रामीण इलाके मिले जुले हैं. राज्य की कुल 90 सीटों में बाकी 65 पूरी तरह ग्रामीण क्षेत्र हैं.’’ 

छत्तीसगढ़ की आबादी करीब 2.75 करोड़ है और कृषि/ग्रमीण योजनाओं से राज्य में कुल 6,82,000 परिवारों में से 4,01,000 परिवारों को लाभ मिलने की उम्मीद है. अनुमान लगाया गया है कि विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों करीब 2 करोड़ लोगों पर असर पड़ेगा. कुल 90 विधानसभा क्षेत्रों में 14 उत्तरी छत्तीसगढ़ के सरगुजा मंडल में हैं जबकि 12 दक्षिणी बस्तर मंडल में. फिलहाल इन सभी सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है. छत्तीसगढ़ में ज्यादातर सीटें मध्य के मैदानी इलाकों में हैं, जहां मोटे तौर पर लोग खेती-किसानी करते हैं.

ग्रामीण, कृषि आधारित योजनाएं राज्य के आदिवासी बहुल उत्तरी और दक्षिणी जंगलों के इलाके में सभी समान रूप से लागू हैं, लेकिन भौगोलिक स्थितियां और प्रचलित आर्थिक प्रथाओं के कारण उनका ज्यादा असर नहीं होता. इसके हल के लिए बघेल सरकार ने लघु वनोपज खरीद योजना को विस्तार दिया है. इसमें पहले के सात वनोपज को बढ़ाकर 65 कर दिया गया है, जो इन इलाकों अहम आर्थिक गतिविधि हैं.

बघेल के सामने कुछ बाधाएं भी हैं. मध्य छत्तीसगढ़ की किसान बिरादरी काफी खुश लगती है, यही वह इलाका है, जो ओबीसी बहुल है और भाजपा को यहां अच्छा-खासा समर्थन है. बघेल को इस इलाके से ज्यादा समर्थन हासिल करने का तरीका खोजना होगा.

इसके अलावा चुनौती पार्टी में टी.एस. सिंहदेव से भी है, जो आदिवासी बहुल उत्तरी क्षेत्र से हैं और मजबूत पंचायतों या पेसा कानून पर विशेष जोर देकर आदिवासी अधिकारों के पैरोकार के रूप में उभरे हैं. इस कानून के तहत ग्रामसभाओं को आदिवासी क्षेत्रों में ज्यादा अधिकार हासिल होंगे. छत्तीसगढ़ पेसा कानून के नियम-कायदे बनाने की प्रक्रिया में है.

अंबिकापुर (सरगुजा जिले का मुख्यालय) में सिंहदेव का दबदबा साफ जाहिर है, क्योंकि बघेल के लुंड्रा और सीतापुर विधानसभा क्षेत्रों में भेंट-मुलाकात कार्यक्रम के दौरान ज्यादातर कांग्रेस के पदाधिकारी और नेता नदारद रहे. सिंहदेव ने अपनी व्यस्तता का बहाना बनाया. हफ्ते भर पहले वे दक्षिण छत्तीसगढ़ के दौरे पर अपने विभागों का कामकाज देखने चले गए. उधर, मुख्यमंत्री उत्तर में अपने भेंट-मुलाकात कार्यक्रम में गांवों का दौरा कर रहे थे.

भाजपा ने बघेल के लोगों से मुलाकात के कार्यक्रम धोखा करार दिया. 8 मई को सूरजपुर में किसी मामले में पुलिस को दोषी ठहरा रही महिला को डांटते बघेल का वीडियो वायरल हुआ तो पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा, ''भेंट-मुलाकात का नाम बदतमीजी और डांट रख देना चाहिए.’’ आलोचना तेज हुई तो बघेल खेद जताने पर मजबूर हुए.

लगभग हर जगह बघेल गांववालों को बढ़ती महंगाई और रसोई गैस की कीमतों को याद दिलाते और भाजपा के नेताओं पर तंज कसते, जो सिलेंडर की कीमत 450 रु. होने पर प्रदर्शन किया करते थे. विधानसभा चुनाव 18 महीने दूर हैं, जाहिर है बघेल लोगों का मिजाज भांपने की कोशिश में लगे हैं. अब तक भाजपा उनकी सक्रियता की बराबरी नहीं कर पाई है. लेकिन वह ज्यादा देर ऐसे ही नहीं रहेगी. लड़ाई का माहौल तैयार हो रहा है.ठ्ठ

जाहिर है छत्तीसगढ़ की योजनाएं लाभार्थियों के हाथ में पैसा पहुंचाती हैं, जिससे राजनैतिक समर्थन मिलने की उम्मीद की जाती है. हाल के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में इसी तरह की लाभार्थी योजनाएं भाजपा के लिए कारगर रहीं.

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