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भारत का चौंकाने वाला फैसला

विकसित देशों ने कहा कि भारत के फैसले से यूक्रेन पर रूस के लगातार जारी हमले से पैदा खाद्य संकट और तीव्र होगा. इससे इंडस्ट्री पर नजर रखने वाले परेशान और किसान नाराज हैं

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इंतजार कांडला : गुजरात के दीनदयाल पोर्ट पर लदान के लिए पड़ा गेहूं का ढेर इंतजार कांडला : गुजरात के दीनदयाल पोर्ट पर लदान के लिए पड़ा गेहूं का ढेर

देश ने 14 मई को जहाजों में गेहूं की तमाम लदाई पर 'तत्काल प्रभाव से' रोक लगा दी. वाणिज्य मंत्रालय ने एक सर्कुलर में कहा कि उच्च-प्रोटीन डुरम और सामान्य सॉफ्ट ब्रेड प्रजातियों सहित तमाम गेहूं के निर्यात को 'मुक्त' से 'प्रतिबंधित' श्रेणी में लाया गया है. निर्यातकों के लिए अकेली राहत यह है कि दो किस्म की लदाई को छूट दी गई—जिन निर्यात के लिए लेटर ऑफ क्रेडिट या ऋण पत्र जारी किए जा चुके हैं, उन्हें पूरा किया जा सकेगा और सरकार 'कमजोर' देशों (जो खाद्य जरूरतों के लिए निर्यात पर निर्भर हैं या प्राकृतिक आपदा झेल रहे हैं) से किए गए वादे पूरे कर सकेगी. इस कदम से दुनिया में हंगामा मच गया.

विकसित देशों ने कहा कि भारत के फैसले से यूक्रेन पर रूस के लगातार जारी हमले से पैदा खाद्य संकट और तीव्र होगा. इससे इंडस्ट्री पर नजर रखने वाले परेशान और किसान नाराज हैं. इस पाबंदी का बचाव करते हुए वाणिज्य सचिव बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम कहते हैं, ''भारत न केवल अपनी खाद्य सुरक्षा बल्कि पड़ोसियों और अन्य कमजोर विकासशील देशों की खाद्य सुरक्षा के प्रति भी प्रतिबद्ध है.'' अलबत्ता भारत को यह फैसला गेहूं की घरेलू कीमतों को काबू में रखने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की अचानक सिर पर आन पड़ी जरूरत के कारण लेना पड़ा, वह भी ऐसे वक्त जब महंगाई और खासकर खाद्य महंगाई आसमान छू रही है और गेहूं की पैदावार घट रही है. 

दुनिया भर में हाहाकार
चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है और सबसे बड़े गेहूं निर्यातक देशों में भी है. पिछले वित्त वर्ष में भारत का गेहूं निर्यात 2.05 अरब डॉलर मूल्य के 7.22 मीट्रिक टन (एमटी) के सर्वकालिक ऊंचे स्तर पर पहुंच गया. अप्रैल में और 1.46 एमटी गेहूं जहाजों में लदा था और अन्य 1.5 एमटी गेहूं के निर्यात के वादे पूरे किए जा रहे हैं. वाणिज्य मंत्रालय का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में भारत का गेहूं निर्यात 10 और 15 एमटी के बीच होगा, जिसमें से 4.5 एमटी के करार हो चुके हैं. पाबंदी से अब इन अनुमानों पर संदेह के बादल मंडराने लगे हैं और वैश्विक बाजारों में गेहूं की कीमतों में तेज उछाल आई है. वैश्विक मानक माने जाने वाले अमेरिका स्थित शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड में गेहूं का वायदा व्यापार 16 मई को 12.47 डॉलर प्रति बुशेल (करीब 27 किलो) पर पहुंच गया, जो एक ही दिन में 5.9 फीसद की बढ़ोतरी थी. यूरोपीय मानक कमोडिटी मार्केट यूरोनेक्स्ट में यह 16 मई को उछलकर 435 यूरो प्रति टन पर पहुंच गया, जो 13 मई को 422 यूरो प्रति टन था.

महज एक महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ एक वर्चुअल बैठक में दुनिया को भारत के खाद्य भंडार की आपूर्ति करने की पेशकश की थी, बशर्ते विश्व व्यापार संगठन ऐसा करने की इजाजत दे. भारत के यू-टर्न पर अब विकसित देशों से गुस्सैल बयान आ रहे हैं. ग्रुप ऑफ सेवन या जी-7 औद्योगिक देशों के कृषि मंत्रियों ने भारत के फैसले की भर्त्सना की. जर्मन कृषि मंत्री केम ओज्डेमिर ने 15 मई को कहा, ''अगर सभी निर्यात पर पाबंदियां लगाने या बाजार बंद करने लगें तो संकट और बिगड़ेगा.''

यूक्रेन की लड़ाई तेज होने के साथ दुनिया में गेहूं की आपूर्तियों में 25 एमटी की कमी हो गई. रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया का एक-चौथाई से ज्यादा गेहूं निर्यात करते हैं. 16 मई को संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफील्ड ने भी कहा कि ''निर्यात पर पाबंदियों से खाद्य संकट और बिगड़ेगा.'' कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी कहते हैं कि इस कदम ने वैश्विक बाजारों में भरोसेमंद सप्लायर होने की भारत की छवि को चोट पहुंचाई है. वे यह भी कहते हैं कि उम्मीद से कम पैदावार और खरीद भारत की इस पाबंदी की वजहें हो सकती हैं. चीन ने भारत की इस पाबंदी का समर्थन किया है. 

पाबंदी क्यों
भारत के इस फैसले के पीछे जो बड़ी चुनौतियां मालूम देती हैं. उनमें पहली है मुद्रास्फीति की बढ़ती दर, जो खाद्य तथा ईंधन की कीमतों की वजह से जनवरी से ही लगातार चार महीनों से भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की 6 फीसद की ऊपरी सीमा से ऊपर चल रही है. उपभोक्ता या खुदरा महंगाई अप्रैल में आठ महीनों के उच्चतम स्तर 7.79 फीसद पर पहुंच गई जबकि खुदरा खाद्य महंगाई 8.38 फीसद की ऊंचाई पर थी. आरबीआइ ने 87,000 करोड़ रुपए की तरलता वापस लेने के लिए 4 मई को मानक ब्याज दरों में 40 आधार अंकों (बीपीएस) की बढ़ोतरी की.

पाबंदी से एक दिन पहले दिल्ली के बाजार में गेहूं की कीमत करीब 2,340 रुपए प्रति क्विंटल थी, जबकि गेहूं के निर्यात की कीमत 2,575 रुपए से 2,610 रुपए प्रति क्विंटल के बीच थी. सीजन की शुरुआत से पहले घोषित सरकारी समर्थन मूल्य 2,015 रुपए प्रति क्विंटल था. गेहूं के आटे का थोक दाम भी मार्च में 27 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 32-33 रुपए प्रति किलो पर पहुंच गया.

दूसरा कारण गेहूं की पैदावार में कमी है. जहां उम्मीद 111 एमटी पैदावार की थी, गेहूं उगाने वाले कई राज्यों में लू ने 15-20 फीसद फसलों को नुक्सान पहुंचाया, जिससे देश का कुल गेहूं उत्पादन घटकर 98 एमटी पर आ गया. इस सीजन में पंजाब में 13 एमटी के लक्ष्य के मुकाबले महज 9 एमटी गेहूं की खरीद हुई. कम उपज और वैश्विक बाजार में ज्यादा कीमत (जो निर्यात में मददगार होती है) के चलते सरकार के बफर स्टॉक में आने वाले अनाजों की मात्रा घट गई. खाद्य मंत्रालय अपने बफर स्टॉक के लिए 44.4 एमटी गेहूं की खरीद नहीं कर पाया है. इस वित्त वर्ष की शुरुआत में भारत के भंडार में 19.5 एमटी गेहूं था और 18 एमटी गेहूं और खरीदा गया, जो 15 साल में इसकी सबसे कम खरीद थी. नतीजतन घरेलू बाजार में जमाखोरी शुरू हो गई और कीमतें बढ़ने लगीं.

आरक्षित भंडार के लिए जरूरी 7.5 एमटी गेहूं निकाल दें, तो अपनी लाभार्थी प्रतिबद्धताएं पूरी करने की खातिर राज्यों को देने के लिए भारत के पास करीब 30 एमटी गेहूं था. भारत को अपनी विभिन्न योजनाओं के तहत बांटने के लिए साल में 26 एमटी गेहूं की जरूरत है. कोविड में राहत के तौर पर मुफ्त अनाज देने के लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत और 10 एमटी गेहूं चाहिए.

किसान सरकारी एजेंसियों को उपज बेचने के इच्छुक नहीं हैं. वे या तो निजी व्यापारियों को बेचना चाहते हैं या कीमतें बढ़ने की उम्मीद में जमाखोरी करना चाहते हैं. 

लू का झटका
इस साल भारत के अलावा अमेरिका, यूरोप और चीन में सूखा, बाढ़ तथा लू सरीखी मौसम की उग्र स्थितियों के कारण गेहूं की मांग बढ़ी. इन देशों में फसलें चौपट हो गईं. यूक्रेन गेहूं की वैश्विक आपूर्तियों में 12 फीसद का योगदान देता था. फिलहाल यूक्रेन के गोदामों में 20 मीट्रिक टन गेहूं पड़ा है.

पाबंदी के एक दिन पहले भारत ने गेहूं का निर्यात बढ़ाने की संभावनाएं तलाशने के लिए ट्यूनीशिया, मोरक्को, इंडोनेशिया के अलावा छह अन्य देशों में व्यापार प्रतिनिधि मंडल भेजने का ऐलान किया था. फरवरी के मध्य में कृषि मंत्रालय ने 2021-22 में देश में गेहूं की फसल के रिकॉर्ड 111.32 एमटी होने का अनुमान लगाया था. उसके बाद उत्तर भारत के गेहूं उगाने वाले राज्यों में गर्मियों की शुरुआत के साथ आई लू ने खेतों में खड़ी गेहूं की फसल को नुक्सान पहुंचाया.

मध्य प्रदेश को छोड़कर, जहां गेहूं की कटाई मध्य-मार्च में शुरू होती है, अन्य राज्यों में अप्रैल के अंत तक पारे के 40 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंचने के साथ फसलें समय से पहले पककर कुम्हला गईं. फिर भी कृषि सचिव मनोज आहूजा ने 14 मई को यही कहा कि उपज में उतनी ज्यादा कमी नहीं आई है और मंत्रालय को 105-106 एमटी पैदावार होने का अनुमान है. 

वित्तीय सेवा फर्म नोमुरा की एक रिपोर्ट कहती है कि गेहूं के निर्यात पर पाबंदी का सरकारी कदम उलटे नतीजे देने वाला साबित हो सकता है. उसने एक रिसर्च नोट में कहा, ''निर्यात पर यह पाबंदी रोकथाम के लिए पहले से उठाया गया कदम है और गेहूं की स्थानीय कीमतों में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी को रोक सकता है. हालांकि ग्रीष्म लहर के कारण गेहूं की घरेलू पैदावार के सीमित रहने की संभावना के साथ गेहूं की स्थानीय कीमतों में कोई खास नरमी नहीं भी आ सकती है. पाबंदी की वजह से चावल सरीखे एवजी अनाजों की कीमतें बढ़ती हैं तो दूसरी खाद्य कीमतों के बढ़ने का दबाव आ सकता है.'' खाद्य सचिव सुधांशु पांडेय को उम्मीद है कि निर्यात पर पाबंदी से घरेलू कीमतों में हफ्ते भर में नरमी आ जाएगी. बहरहाल, गेहूं उत्पादकों की एकमात्र उम्मीद यह है कि पाबंदी अस्थायी है.

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