scorecardresearch
 

असमः भूपेश के कंधों पर भार

असम में छत्तीसगढ़ के नेताओं को प्रचार में उतारने की एक वजह छत्तीसगढ़ से यहां चाय बागानों में काम करने आए मजदूरों की बड़ी आबादी भी है

जनता के बीच छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम के  शिवसागर में चुनावी रोडशो के दौरान जनता के बीच छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम के शिवसागर में चुनावी रोडशो के दौरान

असम विधानसभा चुनाव के लिए नियुक्त सीनियर ऑब्जर्वर और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल राज्य में करीब तीन सप्ताह से डेरा डाले हुए हैं, हालांकि उनका अपने राज्य की राजधानी रायपुर आना-जाना लगा रहता है. असम में बघेल का साथ देने के लिए छत्तीसगढ़ से कांग्रेस के आधा दर्जन विधायक और पार्टी के मध्यम और बूथ स्तर के लगभग 700 पावरफुल नेताओं का ग्रुप उनके साथ है. ये सब अधिक से अधिक सीटें जिताने के लिए माथापच्ची कर रहे हैं.

असम का चुनाव जीतने के लिए भूपेश बघेल की रणनीति क्या है? इस सवाल पर समीक्षकों का कहना है कि भूपेश बघेल को कांग्रेस के लिए इलेक्शन फंडिंग की जिम्मेदारी सौंपी गई है—हालांकि बघेल ने इससे इनकार किया है. वहीं कई अन्य लोग अनुमान लगा रहे हैं कि वे अपने होम स्टेट में जारी कांग्रेस के नेतृत्व संघर्ष से निपटने के लिए कांग्रेस आला नेता के समक्ष अपने नंबर बनाने में लगे हैं. लेकिन कटाक्ष और राजनैतिक सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए, बघेल असम में जनसभा, रोड शो करने के साथ डोर टू डोर कैंपेन भी लगातार कर रहे हैं.

भूपेश बघेल की देखरेख में असम में कांग्रेस की मुख्य रणनीति लोगों तक पार्टी की विचारधारा को ले जाना और बूथ स्तर के कार्यकर्ता को उनका दायित्व सौंपना है. मौजूदा समय में असम के एआइसीसी प्रभारी सचिव और रायपुर पश्चिम से कांग्रेस विधायक विकास उपाध्याय कहते हैं, ''हमने राज्य के 120 विधानसभा क्षेत्रों में संकल्प शिविर या प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए हैं.'' उपाध्याय बताते हैं, ''हमने पार्टी वर्करों में चुनाव का प्रभुत्व रखा है. इसके अलावा, इस तरह से हम भाजपा की वित्तीय ताकत का मुकाबला कर पाने में कामयाब हुए हैं.''

कांग्रेस ने असम में पांच बिंदु का अपना घोषणापत्र जारी किया है जिसे 2018 में छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस की ओर से किए गए कुछ वादों को लागू करने के बाद राज्य में मिली सफलता से प्रेरित माना जा रहा है. उपाध्याय का कहना है कि वादे कम करने में ही भलाई है, लेकिन जितने भी करो पूरे करो. वे बताते हैं, ''जिस तरह कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में बोनस के साथ धान खरीद और कृषि ऋण माफी का वादा किया और उसे समय पर पूरा किया था, उसी तरह असम में हमने सीएए को लागू न करने, चाय बागान श्रमिकों को प्रति दिन 365 रुपए की मजदूरी, गृहिणियों को 2000 रुपए, 5 लाख नौकरियां और 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने का वादा किया है.''

भूपेश बघेल के एक सहयोगी ने बताया कि उनके गृह राज्य में स्थित एक हवाई अड्डे और ओएनजीसी इकाई के साथ विनिवेश के मुद्दे ने आम जनता का ध्यान अपनी ओर खींचा है. उनका यह भी कहना है कि भीड़ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की आक्रामक प्रचार शैली को पसंद कर रही है. वे कहते हैं, ''बघेल ने छत्तीसगढ़ में चुनाव के दौरान जितना परिश्रम किया था, वे उतना ही काम यहां भी कर रहे हैं.''

असम में छत्तीसगढ़ के नेताओं को चुनाव प्रचार में उतारने की एक वजह वहां रहने वालों की आबादी भी है. यह दावा किया जाता है कि 20वीं सदी के शुरुआती दौर में चाय बागानों में काम करने के लिए छत्तीसगढ़ से बड़ी संख्या में मजदूर असम आ गए थे. इनमें से कई छत्तीसगढ़ी आदिवासी और गैर-आदिवासी पृष्ठभूमि के लोग हैं जो छत्तीसगढ़ में अपने रिश्तेदारों के संपर्क में रहते हैं. कांग्रेस नेताओं का तो यह भी दावा है कि असम में ऐसे लोगों की संख्या लगभग 25 लाख है और, वे अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान को बचाए हुए हैं. कांग्रेस को पूरा भरोसा है कि वे लोग पार्टी की विचारधारा पर विचार करेंगे.

लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि असम में कांग्रेस के सामने चुनौतियां बहुत ज्यादा हैं. एक तो यह है कि—भले ही छत्तीसगढ़ कांग्रेस के नेता कितने दावे करें, लेकिन असम में पार्टी के पास संगठनात्मक ढांचा नहीं है. पार्टी के पास संसाधनों की कमी है और अंदरूनी गुटबाजी भी है—जो अब कांग्रेस की पहचान बन गई है, वह असम में भी पार्टी में दिखाई दे रही है.

हालांकि भूपेश की टीम को पूरी उम्मीद है कि कार्यकर्ताओं पर उन्होंने सबसे अधिक निवेश किया है, वे उन्हें जीत दिलाएंगे. बघेल ने इंडिया टुडे से कहा, ''लोग हमेशा कहते हैं कि कांग्रेस व्यापक जनाधार वाली पार्टी है, जबकि भाजपा या वाम दल कैडर आधारित पार्टी हैं. लेकिन यह सटीक आकलन नहीं है. कांग्रेस के कैडर अक्सर करिश्माई नेताओं की छवि में दब जाते थे. तथ्य यह है कि देश के हर हिस्से में कांग्रेस का कैडर है. लेकिन उनकी ऊर्जा का इस्तेमाल करने की जरूरत है जो टॉप लीडर हमेशा किया करते थे. हमने असम में बिल्कुल ऐसा ही किया. हम पार्टी को जिताने के लिए नेताओं, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को एकजुट किया.'' वे कहते हैं, ''छत्तीसगढ़ मॉडल के आधार पर, हमने यह सुनिश्चित किया कि टिकट बांटने के बाद कोई अंदरूनी कलह न हो.''

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें