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असमः मुख्यमंत्री कौन बनेगा?

सरमा ने दूसरी बार भाजपा को असम में सत्ता तक पहुंचाया है और वे इनाम की उम्मीद कर रहे हैं. सोनोवाल ने भी कोई गलती नहीं की. ऐसे में भाजपा के लिए फैसला कठिन होगा

ये अपना याराना! कामरूप जिले के सुआलकुची में 4 अप्रैल की एक सभा में सोनोवाल और सरमा ये अपना याराना! कामरूप जिले के सुआलकुची में 4 अप्रैल की एक सभा में सोनोवाल और सरमा

मई की 2 तारीख को असम में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के पक्ष में स्पष्ट झुकाव के उभरते ही सोशल मीडिया पर हेमंत बिस्व सरमा को अगला मुख्यमंत्री बनाने की मांग की जाने लगी. सरमा निवर्तमान राज्य सरकार में वित्त, शिक्षा, स्वास्थ्य और पीडब्ल्यूडी मंत्री रहे हैं. भाजपा के नए सहयोगी यूपीपीएल (यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल) के मुखिया प्रमोद बोडो ने परोक्ष रूप से सरमा की ओर इशारा करते हुए कहा कि भाजपा विधायकों को किसी 'सक्रिय और ऊर्जावान' नेता को अगला मुख्यमंत्री चुनना चाहिए. असम के स्वायत्त जिले से लोकसभा सांसद होरेन सिंह बे ने स्पष्ट तौर पर कहा कि एनसी हिल्स और कार्बी आंगलोंग के लोग सरमा को मुख्यमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं. अगले दिन भाजपा के 60 विधायकों में से अधिकतर गुवाहाटी में सरमा के घर पहुंचे और निजी तौर पर उन्हें समर्थन देने का वादा किया.

भाजपा के पदस्थ मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल की मौजूदगी के बावजूद यह मांग हैरानी भरी नहीं है. दरअसल, सरमा ने टिकट वितरण और रणनैतिक-संचालन से लेकर चुनावी अफसाना गढ़ने तक पार्टी का पूरा चुनावी अभियान अकेले संभाला. एक ऐसे राज्य में जहां मुस्लिम आबादी 40 फीसद है, भाजपा के लिए जनसांख्यिकीय तौर पर प्रतिकूल परिस्थिति थी, खासकर कांग्रेस के आठ पार्टियों का गठबंधन बनाने के बाद जिसमें एआइयूडीएफ (ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) भी शामिल था. एआइयूडीएफ राज्य में प्रवासी मुसलमानों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है. भाजपा के लिए स्थितियां और भी बदतर थीं क्योंकि असमिया भाषियों में नागरिकता (संशोधन) कानून या सीएए, 2019 को लेकर नाराजगी थी.

इन सभी चुनौतियों के मद्देनजर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को एहसास था कि उनके पास सरमा पर निर्भर रहने के सिवा और कोई विकल्प नहीं, जो उत्तर-पूर्व में भाजपा के विस्तार के शिल्पकार हैं और मुख्य संकटमोचन हैं. उन्हें सरमा के मुख्यमंत्री बनने की पुरानी महत्वाकांक्षा का भी पता था. यहां तक कि सरमा 2015 में भाजपा में इस वजह से शामिल हुए थे क्योंकि तरुण गोगोई की जगह उन्हें मुख्यमंत्री बनाने से राहुल गांधी ने इनकार कर दिया था. हालांकि सोनोवाल पहले ही राज्य का नेतृत्व कर रहे थे, लेकिन भाजपा ने किसी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से परहेज किया था.

असमः मुख्यमंत्री कौन बनेगा
असमः मुख्यमंत्री कौन बनेगा

अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के अवसर को भांपते हुए सरमा ने सीएए के खिलाफ नाराजगी को बेअसर करने, हिंदू वोट एकजुट करने और महिला वोटरों को खैरात से लुभाने के लिए व्यापक अभियान चलाया. उन्होंने एआइयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल को असमी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के लिए खतरे के तौर पर प्रचारित किया. कांग्रेस जहां मुस्लिम वोटों की एकजुटता से फायदे की उम्मीद कर रही थी, वहीं सरमा का जोर असम के उन सभी लोगों को एक छतरी के नीचे लाने का था जो अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के कब्जे को लेकर आशंकित रहते हैं. गुवाहाटी विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के विभागाध्यक्ष अंकुरण दत्ता कहते हैं, ''उन्होंने (सरमा ने) असम बनाम अवैध प्रवासियों की जंग को सफलतापूर्वक हिंदू बनाम मुसलमान में बदल दिया.''

इंडिया टुडे के साथ एक साक्षात्कार में सरमा ने सीएए-विरोधी आंदोलन से उभरी दो पार्टियों, असम जातीय परिषद (एजेपी) और राइजोर दल के निर्माण में अपनी भूमिका को स्वीकार किया था. सरमा इन पार्टियों में अपने नेटवर्क के माध्यम से उन दोनों दलों के टिकट वितरण को परोक्ष रूप से प्रभावित करने में सफल रहे. उन दोनों पार्टियों ने सीएए-विरोधी वोट विभाजित करने और असमी-भाषी वोटरों के बीच भाजपा को अपनी पकड़ को कायम रखने में मदद की. भाजपा ने ऐसी 36 विधानसभा सीटों में से 32 पर जीत दर्ज की. असम में कांग्रेस के प्रभारी जितेंद्र सिंह कहते हैं, ''ऐसा लगता है कि एजेपी और राइजोर दल ने ऊपरी असम में भाजपा की स्थिति को मजबूत करने में मदद की. उन्हें अपनी अंतरात्मा में झांकना होगा कि उन्होंने कैसे अंतत: वैसी ताकतों की मदद की जिनका वे विरोध कर रहे थे.''

स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर महामारी के दौरान सरमा के प्रदर्शन ने भी सीएए-विरोधी भावना को बेअसर करने में बड़ी भूमिका निभाई. सरमा ने इसका नेतृत्व करते हुए पूरे असम में यात्राएं कीं, कोविड के खिलाफ मुस्तैदी और सूक्ष्म स्तर पर प्रबंधन किया. इससे पहली लहर के दौरान न केवल वायरस नियंत्रण में रहा बल्कि सरमा की साख में भी वृद्धि हुई. यह उनकी रैली और रोडशो में दिखा जहां किसी रॉकस्टार की तरह उनका स्वागत हुआ और लोग उनकी एक झलक पाने या उन्हें छूने के लिए लालायित थे. हालांकि सर्वाधिक निर्णायक तो बतौर वित्त मंत्री सरमा की ओर से तैयार की गईं लाभ योजनाएं साबित हुईं, खासकर महिला वोटरों के लिए.

भाजपा ने वादा किया कि अरुणोदय योजना के तहत परिवार की महिला सदस्यों को दी जाने वाली आर्थिक मदद को प्रति माह 830 रुपए से बढ़ाकर 3,000 रुपए किया जाएगा. उसके बाद विभिन्न जनसभाओं में सरमा ने वादा किया कि महिला स्वयंसहायता समूहों की ओर से विभिन्न लघु-वित्तीय एजेंसियों से लिए गए 12,000 करोड़ रुपए के कर्ज को माफ कर दिया जाएगा. यहां तक कि अपने पांच वादों में महिला वोटरों को प्रति माह 2,000 रुपए का वजीफा देने का वादा करने वाले कांग्रेस नेताओं ने भी सरमा की घोषणाओं के प्रभाव को स्वीकार किया. असम में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता देवव्रत सैकिया कहते हैं, ''पहले ही इन लाभों को हासिल कर रहे लोग उन्हें खोना नहीं चाहते थे. उन्हें भरोसा हो गया कि सरमा उन्हें वे लाभ प्रदान करेंगे.''

सरमा की सभी रणनीतियों ने भाजपा को अपेक्षित नतीजे दिए, ऐसे में उन्होंने पार्टी नेतृत्व को संदेश भिजवाया है कि उनकी कठिन मेहनत का इनाम देने का वक्त आ गया है. जीतने वाले 41 विधायक सरमा के खेमे के हैं, इस तरह अंकगणित भी उनके पक्ष में है. यहां तक कि आरएसएस की स्थानीय इकाई ने भी उनके दावे का समर्थन किया है. लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए यह आसान फैसला नहीं होगा. जीत में सरमा के योगदान और नाराज सरमा पार्टी को क्या नुक्सान पहुंचा सकते हैं, इससे केंद्रीय नेतृत्व परिचित है, लेकिन वह इस असमंजस से जूझ रहा है कि महज किसी दूसरे नेता की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए क्या वह मौजूदा मुख्यमंत्री को हटा दे, वह भी जब पार्टी पिछली बार की जितनी सीटें लाकर सत्ता में वापस लौटी है. इसके अलावा सोनोवाल के खिलाफ लोगों में नाराजगी भी दिखाई नहीं दे रही है और असमी-भाषी लोगों में उनका अब भी पर्याप्त समर्थन है, खासकर असम में सरकारी भर्तियों में भ्रष्टाचार-विरोधी उनके अभियानों को लेकर. वे ऊपरी असम के डिब्रूगढ़ से आते हैं जिसने भाजपा की जीत में मुख्य भूमिका अदा की.

हालांकि, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करेगा उसके लिए कहीं बड़ी चुनौती मुंह बाए खड़ी है. पहले तो उसे असम में कोविड के भयानक उभार से जूझना होगा. 3 मई को रोजाना के कोविड मामले बढ़कर 4,000 हो गए—जो इस साल सबसे अधिक हैं—और पॉजिटिविटी दर 10 फीसद है. वित्तीय संकट भी एक बड़ी चुनौती है. 85,000 करोड़ रुपए के संचयी कर्ज के अलावा जाती हुई सरकार 23,000 करोड़ रुपए की प्रतिबद्धताएं छोड़ जाएगी. कोविड के खिलाफ लड़ाई जहां राज्य के खजाने पर अतिरिक्त भार डालेगी, वहीं नई सरकार को अगले साल तक 1,00,000 सरकारी नौकरियों और चुनावी वादे पूरे करने के लिए फंड हासिल करने के रास्ते तलाशने होंगे.

कानून-व्यवस्था एक अन्य चुनौती है. सीएए के खिलाफ हफ्तेभर के आंदोलन को छोड़, हालांकि राज्य में पिछले पांच साल शांति रही है, पर पिछले छह महीनों में युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम के परेश बरुआ गुट ने अपहरण की कुछ वारदातें अंजाम दी हैं. ओएनजीसी के एक कर्मचारी का अब तक कुछ पता नहीं चला है जिसका दो अन्य लोगों के साथ अपहरण कर लिया गया था. अन्य दो लोग छुड़ा लिए गए हैं. पुलिस के उच्चाधिकारियों का कहना है कि यह अपहरण बरुआ की ओर से अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की हताशाभरी कोशिश है. फिलहाल, भाजपा की तात्कालिक प्राथमिकता अगला मुख्यमंत्री चुनना है, लेकिन इस कुर्सी पर बैठने वाले शख्स के लिए कोई हनीमून अवधि नहीं होगी. उसको तत्काल काम में जुट जाना होगा.

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