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राजनीति का लाउडस्पीकर

चर्चा है कि मनसे, भाजपा 2022 के आने वाले दिनों में होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव मिलकर लड़ेंगी

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बढ़ते कदम : राज ठाकरे अपने चचेरे भाई उद्धव के लिए गंभीर चुनौती पेश कर रहे हैं बढ़ते कदम : राज ठाकरे अपने चचेरे भाई उद्धव के लिए गंभीर चुनौती पेश कर रहे हैं

ऊपरी तौर पर देखें तो मस्जिदों में अजान और दूसरे उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होने वाले लाउडस्पीकरों के खिलाफ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे का अभियान सफल रहा है—ठाकरे की ओर से घोषित समयसीमा 4 मई की सुबह करीब 90 प्रतिशत मस्जिदों में लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल नहीं हुआ. तब से यह शांति अभी तक कायम है. टकराव की मुद्रा अपनाने वाले ठाकरे ने अपने कैडरों को आदेश दिया था कि 4 मई से सुबह 6 बजे से पहले अगर अब भी लाउडस्पीकर से अजान दी गई तो वे मस्जिदों के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ करें (सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के अपने एक आदेश में रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी).

इसके चलते महाराष्ट्र पुलिस को 2017 के अपने दिशानिर्देशों को लागू करना पड़ा, जिसके अनुसार, धार्मिक स्थलों पर 55 डेसिबल की ध्वनि सीमा के साथ लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल के लिए पहले से अनुमति लेनी होगी. राज ठाकरे की इस मुहिम को अपनी ताकत फिर से बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, जो एक के बाद एक मिलने वाले निराशाजनक चुनावी नतीजों के बाद लगभग खत्म हो चुकी थी. इस सफल अभियान के बाद राज ने इस साल होने वाले स्थानीय निकायों के चुनावों से पहले प्रदेश की राजनीति में कुछ जगह जरूर वापस हासिल कर ली है. हिंदुत्व की राजनीति का सहारा लेकर उन्होंने चचेरे भाई और प्रदेश के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को दबाव की मुद्रा में ला दिया है.

इसका एक संकेत 2020 में दिखा, जब राज ने कई रंगों वाले एमएनएस के झंडे का रंग बदल कर भगवा रंग कर दिया. शिवसेना ने महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) में धर्मनिरपेक्ष पार्टियों कांग्रेस और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ जब गठबंधन कर लिया तो राज ठाकरे को एक ऐसा मुद्दा हाथ लग गया जिसका इंतजार वे उद्धव ठाकरे को घेरने के लिए कर रहे थे. उन्होंने मस्जिदों में लाउडस्पीकरों के मुद्दे का चुनाव बड़ी चतुराई से किया—शिवसेना इसका विरोध नहीं कर सकती थी, अगर करती तो उसे 'मुस्लिम तुष्टीकरण' का आरोप झेलना पड़ता.

एमवीए सरकार के कई फैसलों से ऐसी धारणा बनी है कि शिवसेना अब हिंदुओं के हितों का ध्यान रखने वाली पार्टी नहीं रह गई है. पिछले साल कोविड संबंधी प्रतिबंधों के हटने के बाद उसने मंदिरों को दोबारा खोलने में देरी की. गरीब मुसलमानों को वजीफा देने के सरकारी फैसले को लेकर भाजपा ने उस पर 'तुष्टीकरण' का आरोप लगाया. ऐसा लगता है कि वे सेना के कुछ समर्थकों को खास तौर पर मध्य मुंबई के मराठी बहुल इलाकों में अपनी तरफ खींचने में सफल रहे हैं. कुर्ला निवासी 35 वर्षीय गौतम नरवेकर कहते हैं, ''मैंने शिवसेना को वोट दिया क्योंकि मुझे इसकी आक्रामकता अच्छी लगती थी. अब राज ठाकरे ने उद्धव के मुकाबले ज्यादा आक्रामक रुख अपनाया है तो अब शिवसेना को वोट देने पर फिर सोचूंगा.''

राज ठाकरे को पकड़ दोबारा बनाने के लिए इसकी बहुत सख्त जरूरत थी—2014 और 2019 के विधानसभा चुनावों के नतीजे मनसे के लिए बेहद निराशाजनक थे. 2009 के विधानसभा चुनावों में अच्छे प्रदर्शन (5.71 वोट प्रतिशत के साथ 13 सीटें) के बाद दोनों चुनावों में वह (क्रमश: 3.15 और 0.35 वोट प्रतिशत के साथ) केवल एक-एक सीट ही जीत सकी. इसी तरह बृहन्मुंबई महा नगरपालिका (बीएमसी) में भी मनसे की ताकत 2012 में 27 से घटकर 2017 में मात्र एक सीट पर आकर सिमट गई.

लाउडस्पीकर के मुद्दे ने उन्हें अस्तित्व के संकट से उबारने में निश्चित रूप से मदद की है. मनसे के एक नेता कहते हैं, ''हमें अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए विधानसभा के चुनाव में कम से कम पांच और बीएमसी के चुनावों में 15 सीटें जीतनी होंगी. हमारे पास हिंदुत्व की लाइन पकड़ने के सिवा कोई चारा नहीं था. इसमें सबसे ज्यादा आकर्षण है.'' 

हनुमान चालीसा के पाठ का चुनाव करना भी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा मालूम होता है. राज ठाकरे ने एक न्यूज चैनल को बताया, ''मैंने मारुति स्तोत्र (हनुमान चालीसा का मराठी संस्करण) की जगह हनुमान चालीसा का चुनाव किया ताकि देश भर के लोग इसका पाठ कर सकें.'' जानकार मानते हैं कि यह उत्तर भारतीयों को अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश है जिनका मुंबई में 20 प्रतिशत वोट है. राजनैतिक विश्लेषक हेमंत देसाई कहते हैं, ''चालीसा के जरिए राज ठाकरे उत्तर भारतीय विरोधी होने की अपनी छवि मिटाना चाहते हैं.'' 5 जून को अयोध्या का दौरा उनका अगला कदम है. ठाणे के निवासी गौरव सिंह कहते हैं कि कोई पार्टी हिंदुत्व पर जोर देती है तो वे इसे पसंद करते हैं. मुंबई में तीन पीढ़ियों से रहने वाले उत्तर भारतीय गौरव कहते हैं, ''अब उद्धव का झुकाव हिंदुत्व की तरफ नहीं रह गया और राज ठाकरे ने हाथ आगे बढ़ाया है तो उत्तर भारतीय उद्धव के बजाए उनकी तरफ ज्यादा आकर्षित होंगे.''

अटकलें हैं कि मनसे स्थानीय निकायों, जिनमें बीएमसी चुनावों के साथ ही 14 अन्य नगरपालिका चुनाव, जिला परिषद और अन्य शामिल हैं, के चुनावों से पहले भाजपा से हाथ मिला सकती है. ये चुनाव सितंबर-अक्तूबर में होंगे. निश्चित रूप से एमवीए को हराने के लिए उन्हें एकजुट होना पड़ेगा. लेकिन अभी तक इस बारे में कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है. विपक्ष के नेता देवेंद्र फड़नवीस का कहना है कि यह सिर्फ अफवाह है. उन्होंने कहा, ''एमएनएस से गठबंधन का कोई सवाल ही नहीं है.'' मुंबई में भाजपा कोर कमेटी के एक सदस्य कहते हैं, ''मुंबई का चुनाव जीतने के लिए हम बेहतर स्थिति में हैं. एमएनएस से गठबंधन करने से भाजपा का टिकट पाना चाह रहे नेताओं को झटका लगेगा.'' एमएनएस के एक सूत्र के मुताबिक, राज ने बीएमसी चुनाव में शिवसेना के मौजूदा पार्षदों के खिलाफ 25 प्रत्याशी उतारने का भाजपा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है. ठाकरे भाइयों के बीच लड़ाई भाजपा के भविष्य को अन्य कारकों की अपेक्षा ज्यादा प्रभावित कर सकती है.

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