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अमरिंदर सिंह को समझदार होने की जरूरत है: नटवर सिंह

“लंच तो दूर, नटवर से बात किए मुझे सात साल हो गए” शीर्षक से इंडिया टुडे  में प्रकाशित अमरिंदर सिंह का इंटरव्यू पर नटवर सिंह की प्रतिक्रिया.

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अमरिंदर सिंह की उम्र 72 साल है, लेकिन उन्हें अभी समझदार होने की जरूरत है. वे काल्पनिक कहानियां गढऩे में माहिर हैं. वर्षों तक वे किसी ठोस सबूत के बिना ही लोगों पर गलत काम करने का आरोप लगाते रहे हैं.
 
कल वे मेरे या किसी और के बारे में कोई काल्पनिक कहानी गढ़ सकते हैं, जो उन्हें खुद ही निरा मूर्ख जैसा बना देगी.

मैं उनकी निजी जिंदगी के बारे में नहीं लिख रहा हूं. यह करने बैठ गया तो मोटी-मोटी पोथियां लिखनी पड़ जाएंगी. सात साल पहले मैंने ही उनसे बात करनी बंद कर दी थी. उन्होंने यह पूछने के लिए टेलीफोन किया था कि क्या वे और उनकी पाकिस्तानी महिला मित्र मुझसे मिलने आ सकते हैं? मैंने मना कर दिया. वोल्कर मामले से इसका कोई संबंध नहीं था.

कैप्टन साहब के 70वें जन्मदिन पर उस महिला ने मुझे फोन किया और पूछा कि जन्मदिन की पार्टी में क्या मैं अपनी बीवी के साथ आ सकता हूं? हमने मना कर दिया.

वे एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री (पूर्व) हैं, जो पंजाब में लगातार दो बार अपनी पार्टी को विधानसभा चुनाव में हार दिला चुके हैं.

इंडिया टुडे (20 अगस्त, ‘लंच तो दूर, नटवर से बात किए मुझे सात साल हो गए’) को दिए गए अपने इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि राजीव गांधी कोलंबो में (29 जुलाई, 1987 को) जरूरी प्रक्रिया का पालन किए बिना श्रीलंका में सेना भेजने का फैसला नहीं ले सके. क्या कैप्टन साहब 29 जुलाई, 1987 को कोलंबो में मौजूद थे? मैंने तो उन्हें वहां नहीं देखा था. मैं उन्हें नहीं देख सका क्योंकि उस समय तो वे अकाली पार्टी में थे.

अमरिंदर ने कभी भी केंद्र सरकार में काम नहीं किया. उन्हें पता ही नहीं है कि विदेश में प्रधानमंत्री को किस प्रक्रिया का पालन करना होता है. उस समय वह अपनी कैबिनेट के सहयोगियों को फोन नहीं करता है, उसे वहीं पर खुद ही फैसला लेना होता है. राजीव ने पी.वी. नरसिंह राव तक से सलाह नहीं ली जबकि वे प्रधानमंत्री के दल के साथ कोलंबो में ही थे.

ऑपरेशन ब्रासटैक्स के बारे में उन्हें कुछ नहीं पता है. वे कहते हैं, “कोई राज्यमंत्री और सेनाध्यक्ष प्रधानमंत्री या कैबिनेट या सेना के पूरे ढांचे को जाने बिना कैसे किसी देश के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर सकता है?” यह बात समझ से परे है कि “पूरे सैन्य ढांचे को जानने” का मतलब क्या है?

प्रधानमंत्री ने आरएएक्स लाइन पर फोन करके एक राष्ट्राध्यक्ष के स्वागत के लिए मुझे एयरपोर्ट तक अपने साथ चलने के लिए कहा. सोनिया भी कार में थीं. कैप्टन साहब कार में नहीं थे. प्रधानमंत्री ने कहा, “नटवर, पाकिस्तान के साथ हमारी लड़ाई होने वाली है.” मैंने कहा कि विदेश मंत्रालय को तो इसकी कोई जानकारी नहीं है. जवाब आया, “न ही मुझे कुछ पता था. अरुण (सिंह) और (के.) सुंदरजी ने मुझे इस बारे में कुछ नहीं बताया.”

इस गंभीर खतरे को टालने में कई दिन लग गए. राष्ट्रपति जिया-उल-हक ने प्रधानमंत्री को फोन किया. मैंने पाकिस्तान के विदेश सचिव अब्दुल सत्तार से बात की. प्रधानमंत्री ने कैप्टन साहब से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया, क्योंकि वे उस समय अकालियों के साथ पींगें बढ़ाने में व्यस्त थे.

वे दावा करते हैं कि उन्होंने वोल्कर रिपोर्ट पढ़ी है? रिपोर्ट में कांग्रेस को भी लाभ उठाने वाला बताया गया है. कैप्टन साहब ने अपने इंटरव्यू में उसका उल्लेख क्यों नहीं किया?

क्या उन्होंने पाठक जांच समिति की रिपोर्ट पढ़ी है. रिपोर्ट में कहा गया है, “इस बात का कोई सबूत नहीं है कि नटवर सिंह ने ठेकों से किसी तरह का निजी या आर्थिक लाभ उठाया.”

अब हम चमचागीरी की बात करते हैं. कैप्टन साहब के मुताबिक, 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की शर्मनाक हार के लिए राहुल गांधी जिम्मेदार नहीं हैं. राहुल और उनकी मां ने प्रचार का मुख्य जिम्मा उठा रखा था. कांग्रेस के कार्यकर्ता जिम्मेदार नहीं थे. या मैं गलत कह रहा हूं! वास्तव में कैप्टन साहब ही जिम्मेदार थे.

जहां तक उनके अजीज मनमोहन सिंह की बात है, उनके बारे में जितना कम बोला जाए, बेहतर है.

अमरिंदर सिंह का इंटरव्यू “लंच तो दूर, नटवर से बात किए मुझे सात साल हो गए” शीर्षक से इंडिया टुडे के 20 अगस्त के अंक में प्रकाशित हुआ था.

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