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कांग्रेसः डांवाडोल नाव

चुनावों में घटिया प्रदर्शन के बाद कांग्रेस के लिए फिर से करो या मरो की स्थिति बन गई है. अगर पार्टी खुद को सुधारने के लिए एक ईमानदार प्रयास कर सके तो यह अभी भी विपक्ष को एकजुट करने वाली ताकत बन सकती है

वोट के लिए केरल के थंगासेरी में 4 अप्रैल को मछुआरों की नाव से उतरते राहुल गांधी वोट के लिए केरल के थंगासेरी में 4 अप्रैल को मछुआरों की नाव से उतरते राहुल गांधी

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 2014 की तुलना में सिर्फ आठ अधिक सीटें यानी 52 सीटें जीतीं और 545 सदस्यीय सदन में लगातार दूसरी बार तीन अंकों के निशान को छूने में नाकाम रही. इन 52 सीटों में से 15 सीटें उस केरल राज्य से मिली थीं जो 19 सांसदों को लोकसभा में भेजता है. यह भारत के सभी राज्यों में से पार्टी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था और कांग्रेस ने यह उपलब्धि केरल विधानसभा चुनाव में बुरी तरह मात खाने के तीन साल बाद हासिल की थी. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और असली ताकत रखने वाले नेता राहुल गांधी राज्य की वायनाड सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और ऐसी संभावनाएं थीं कि पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में मौजूदा एलडीएफ (वाम लोकतांत्रिक मोर्चा) सरकार को सत्ता से बाहर कर देगी.

हालांकि, जब केरल में 2021 विधानसभा चुनाव के परिणामों की घोषणा हुई तो कांग्रेस 140 सदस्यीय सदन में सिर्फ 21 सीटें जीत सकी. यह प्रदर्शन 2016 से भी खराब था जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) सरकार को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा था. कांग्रेस के लिए शर्मिंदगी की बात यह रही कि राहुल ने जिन राज्यों में धुआंधार चुनावी अभियान चलाया वे केरल और तमिलनाडु थे. राज्य में मतदाताओं को लुभाने की अपनी बेताब कोशिश में राहुल ने तिरुवनंतपुरम में एक सार्वजनिक सभा में उत्तर और दक्षिण भारत की तुलना करने की बेवजह की बेचैनी दिखाई और कहा: ''पहले 15 वर्षों के दौरान मैं उत्तर भारत से सांसद था; मुझे एक अलग तरह की राजनीति की आदत हो गई थी. मेरे लिए, केरल आना नया और ताजा अनुभव था क्योंकि अचानक मैंने पाया कि लोग मुद्दों में रुचि रखते हैं, और न केवल सतही रूप से, बल्कि मुद्दों की गहराई तक तक जाते हैं.''

ये शब्द अब गांधी को परेशान करने के लिए वापस आ जाएंगे जिनकी नेतृत्व क्षमता पर 2014 से पार्टी के चुनावी प्रदर्शन के सितारे गर्दिश में आने के बाद से प्रश्न उठ रहे हैं. पिछले सात वर्षों में 39 विधानसभा चुनावों में, पार्टी ने अपने बूते केवल पांच में जीत हासिल की है. मौजूदा दौर में केरल की पराजय के अलावा, पार्टी पुदुच्चेरी में सत्ता से बाहर हो गई और असम और पश्चिम बंगाल में कोई भी महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ने में विफल रही. पश्चिम बंगाल में, वास्तव में यह एक भी सीट नहीं जीत पाई. इस प्रकार छह राज्य विधानसभाओं—आंध्र प्रदेश, दिल्ली, त्रिपुरा, नगालैंड और सिक्किम के बाद पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. यह पार्टी तमिलनाडु में द्रमुक के एक कनिष्ठ सहयोगी के रूप में सत्ता में वापस आ जाएगी जो केवल मामूली सांत्वना के अलावा कुछ नहीं है.

कांग्रेसः डांवाडोल नाव
कांग्रेसः डांवाडोल नाव

यह कि कांग्रेस नेतृत्व, विशेष रूप से गांधी परिवार के सामने पार्टी को पुनर्जीवित करने का एक कठिन कार्य है. पार्टी के भीतर राहुल की जवाबदेही तय करने की मांग जोर पकड़ रही है. हालांकि सोनिया गांधी अंतरिम पार्टी अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रही हैं, लेकिन भी यह एक खुला रहस्य है कि राहुल की स्वीकृति सबसे महत्वपूर्ण पार्टी निर्णयों के लिए आवश्यक है.

उम्मीद है कि कांग्रेस जून में अगला अध्यक्ष चुने, जैसा 23 नेताओं के समूह से वादा किया गया था, जिन्होंने पिछले साल अगस्त में सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी के संगठनात्मक बदलाव और जवाबदेह नेतृत्व की मांग की थी. राहुल के एक करीबी सहयोगी जो सीडब्ल्यूसी सदस्य भी हैं, कहते हैं, ''सीडब्ल्यूसी ने निर्णय लिया है और अध्यक्ष पद के लिए चुनाव जून में होना निश्चित है, भले ही हमें आभासी (वर्चुअल) तरीके से चुनाव कराना पड़े.'' तलवारें खिंच चुकी हैं, असंतुष्ट समूह ने इस समय चुप रहने का फैसला किया है क्योंकि देश स्वास्थ्य संकट से गुजर रहा है. ग्रुप 23 के एक मूल सदस्य का कहना है, ''अगर हम आज अपनी आवाज उठाते हैं, तो लोग हमें अवसरवादी के रूप में देखेंगे. इसलिए हम जून तक इंतजार करेंगे और देखेंगे कि सीडब्ल्यूसी क्या करती है.'' हालांकि, उनके बीच उत्साह है क्योंकि राहुल के अध्यक्ष पद के लिए खड़े होने को लेकर संदेह है.

यहां तक कि जब कांग्रेस खुद एक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, फिर भी कई कांग्रेसी नेता मानते हैं कि देश की मौजूदा मनोदशा, एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में उभरने के लिए कांग्रेस को अवसर प्रदान करती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इसकी पूरे भारत में उपस्थिति है. सीडब्ल्यूसी सदस्य और असम कांग्रेस प्रभारी जितेंद्र सिंह कहते हैं, ''हम हार गए होंगे, लेकिन हम हार से सीखेंगे, मनोबल ऊंचा रखेंगे और लोगों के हित के लिए लड़ते रहेंगे.'' महामारी के बुरी तरह वापस लौटने और केंद्र सरकार की लचर प्रतिक्रिया के कारण जनता न केवल बीमारी से लड़ रही है बल्कि अस्पताल के बेड और ऑक्सीजन की कमी से जूझ रही है और इससे लोगों में गहरी पीड़ा की भावना पैदा हुई है.

दक्षिणी राज्यों में भाजपा का विरोध और विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में अपमानजनक हार, जहां भगवा पार्टी ने अपनी सारी ताकतें झोंक दीं थी, ने प्रधानमंत्री मोदी की अजेय की छवि को और धूमिल कर दिया. कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) के सदस्य और पार्टी के संचार प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, ''आपदा ने दिखा दिया कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा प्रचार अधिक, काम कम करती है. राष्ट्र के हित में कांग्रेस ही एक वैकल्पिक रोडमैप प्रदान कर सकती है और हम ऐसा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.''

आखिर कांग्रेस का नेतृत्व कौन करेगा?

सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी के साथ उस दिशा में एक स्पष्ट प्रयास हुआ है और सोशल और पारंपरिक मीडिया, दोनों पर नरेंद्र मोदी पर तीखे हमले किए गए. राहुल, वास्तव में नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना में सबसे मुखर और सबसे अधिक दिखाई देने वाले कांग्रेसी नेता रहे हैं क्योंकि वे तेजी से फैलती कोविड महामारी, चरमराई अर्थव्यवस्था और चीनी आक्रामकता समेत कई मसलों पर हमलावर रहे हैं.

दुर्भाग्य से, वे कांग्रेस के कार्यबल को युद्ध के लिए तैयार चुनावी मशीनरी में नहीं बदल सके हैं. इसके बजाए, केंद्रीय नेतृत्व पर ऊहापोह ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भविष्य रणनीति के लिहाज से भ्रमित कर दिया है. राहुल के करीबी सहयोगी पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनकी वापसी की मांग कर रहे हैं, लेकिन राहुल खुद अभी तक वापस नहीं आने के लिए अड़े हुए हैं.

सोनिया गांधी अंतरिम प्रमुख के रूप में बने रहने के लिए तैयार नहीं हैं, गांधी परिवार के वफादारों ने प्रियंका को विकल्प के रूप में पेश किया है. हालांकि, सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि सोनिया और राहुल, दोनों ने इस विचार का विरोध किया है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका के नेतृत्व का एक बड़ा परीक्षण तब होगा जब राज्य में अगले साल चुनाव होंगे. हालांकि, भारत के राजनैतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य में पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए उनके पास कई योजनाएं थीं, लेकिन महामारी ने उन पर ब्रेक लगा दिया. एक प्रतिकूल परिणाम उनके नेतृत्व पर भी सवाल खड़े कर सकता है.

कांग्रेस कार्यसमिति के एक सदस्य का कहना है, ''शायद यही वजह है कि परिवार एक कामचलाऊ अध्यक्ष को बिठाना चाहता है ताकि जब हवा कांग्रेस के पक्ष में बदले तो राहुल वापस लौट सकें.'' हालांकि, अनुभवी कांग्रेसी नेताओं को डर है कि इस तरह के प्रयोग से पार्टी को ऐसे आंतरिक विस्फोट का सामना कर पड़ सकता है, जब उसे दुश्मन के खेमे में खलबली मचाने के लिए अपना किला मजबूत करने की सबसे ज्यादा जरूरत है. कांग्रेस के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है.

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