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राजधानी की आपात स्थिति

साल के इस समय में कई उत्तर भारतीय शहरों को अपनी चपेट में ले लेने वाली धुंध का लोगों के स्वास्थ्य पर बहुत खराब प्रभाव पड़ता है. इस प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों के कारण भारतीय अपने जीवन के कई वर्ष गंवा देते हैं.

इलस्ट्रेशनः नीलांजन दास इलस्ट्रेशनः नीलांजन दास

इंडिया टुडे

अर्थव्यवस्था की उत्पादकता को भी अरबों डॉलर का नुक्सान उठाना पड़ता है. दर्जनों शहरों में विषाक्तता के स्तर को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए हैं, पर इन लक्ष्यों के प्रति उसकी विîाीय प्रतिबद्धता संदिग्ध है. यह समस्या किसी राज्य की सीमा से परे है, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य भी उसका समाधान तलाशने की बजाए दूसरे पर दोष थोपने को ज्यादा आतुर दिखते हैं. इस बीच, असहाय नागरिक नीतिगत हस्तक्षेप का इंतजार करते हैं जो इस राष्ट्रीय आपातकाल को स्वीकारते हुए दूर करने का प्रयास करें

1,95,546

बच्चों की मौत

2017 में श्वासनली के संक्रमण से; इनमें से 1,85,422 पीडि़त पांच साल से कम उम्र के थे

999

एअर क्वालिटी इंडेक्स

यह ऐसी रीडिंग है जिसे पूरी दिल्ली में दीवाली की रात (27 अक्तूबर) को ज्यादातर मॉनिटरिंग स्टेशनों में रिकॉर्ड किया गया. यह आंकड़ा सुरक्षित वायु

सीमा से 60 गुना ज्यादा है

77

प्रतिशत

भारतीय स्वीकृत सीमा से अधिक पार्टिकुलेट मैटर (विषाक्त पदार्थों) को ग्रहण कर लेते हैं, ऐसा मेडिकल जर्नल लैंसेट का कहना है

8.5

प्रतिशत

भारत की जीडीपी का (221 अरब डॉलर) हर साल वायु प्रदूषण के कारण नुक्सान हो जाता है, ऐसा विश्व बैंक का कहना है; भारतीय सांख्यिकी संस्थान का अनुमान है कि अगर प्रदूषण में कमी की जाए तो 300-400 अरब डॉलर की वार्षिक बचत होगी

22

शहर

भारत में थे, वायु की गुणवत्ता के आधार पर दुनिया के सबसे प्रदूषित 30 शहरों की 2018 की रैंकिंग में, ग्रीनपीस के मुताबिक. सबसे प्रदूषित शहर गुरुग्राम

9

शहर उत्तर प्रदेश के थे, सबसे प्रदूषित भारत के 10 शहरों में 5 नवंबर को. एक अन्य शहर हरियाणा का था

2,70,000

जिंदगियां

हर साल बचाई जा सकती हैं अगर घरों में जलाए जाने वाले लकड़ी, गोबर, कोयला और केरोसिन जैसे प्रदूषित ईंधन की खपत को कम कर दिया जाए; अगर पूरी तरह से बंद कर दिया जाए तो हवा की गुणवत्ता का इंडेक्स राष्ट्रीय मानकों के बराबर पहुंच जाएगा, ऐसा आइआइटी दिल्ली का इसी साल प्रकाशित एक शोध कहता है

5

साल

की मोहलत कोयला आधारित बिजली निर्माण इकाइयों को क्लीनर उत्सर्जन तकनीक (2017 से 2022 तक) को लगाने के लिए दी गई है

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