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जम्मू-कश्मीरः नौकरी जाने का खौफ

कश्मीर में नौकरियां वैसे भी कम हैं और अनेक सरकारी कर्मचारियों को पुलिस की तरफ से वेरिफिकेशन कॉल आई हैं जिससे वे नौकरी छूटने की दहशत में हैं

बंद बाजार श्रीनगर के लालचौक में 25 मई को बंद बाजार से गुजरता एक साइकिल सवार बंद बाजार श्रीनगर के लालचौक में 25 मई को बंद बाजार से गुजरता एक साइकिल सवार

मोअज्जम मोहम्मद

जम्मू और कश्मीर सरकार ने 13 साल से राज्य के शिक्षा विभाग में काम कर रहे इदरीस जान मीर को 30 अप्रैल को 'राज्य की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए' सरकारी नौकरी से बर्खास्त कर दिया. उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा के क्रालपोरा गांव के सरकारी गर्ल्स हाइ स्कूल के शिक्षक 39 वर्षीय मीर, हाल ही में केंद्र शासित प्रदेश सरकार की ओर से सुरक्षा आधार पर निकाले गए छह कर्मचारियों में से पहले थे. बर्खास्त अन्य लोगों में जेल में बंद जम्मू-कश्मीर का पुलिस उपाधीक्षक दविंदर सिंह शामिल है जो जनवरी 2020 में कश्मीर में हिज्बुल मुजाहिदीन के एक शीर्ष आतंकवादी और उसके दो गुर्गों के साथ यात्रा करते हुए पकड़ा गया था. इनके साथ ही साथ दक्षिण कश्मीर के एक नायब तहसीलदार और एक कॉलेज के प्रोफेसर तथा उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा के दो शिक्षकों को भी बर्खास्त किया गया है.

 1 मई को राजस्व अधिकारियों ने मीर को कुपवाड़ा जिले के उनके पैतृक गांव दरपोरा में निष्कासन पत्र सौंपा था. उसके बाद से 'विधवाओं का गांव' के नाम से चर्चित इस गांव में मीर के घर जाकर दुख प्रकट करने वालों का तांता लगा है. 1989 में आतंकवाद शुरू होने के बाद से इस गांव की 300 महिलाओं के पति या तो गायब हो गए हैं या मारे गए इसलिए इसे 'विधवाओं का गांव' कहा जाता है. मीर के घर शोक प्रकट करने आए लोगों में से कई उनके पूर्व छात्र हैं, जिनमें से कुछ सरकार के लिए भी काम करते हैं. दो बेटियों और एक बेटे के पिता मीर कहते हैं, ''मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि मैं कैसे राज्य के लिए खतरा हूं. यह उत्पीड़न के सिवा कुछ नहीं है. उन्होंने मेरी नौकरी और मेरा जीपी (सामान्य भविष्य निधि) तो छीन लिया, लेकिन मेरे उन छात्रों को नहीं छीन सकते जो मेरे साथ खड़े हैं. मैंने छात्रों के समग्र विकास में रुचि ली है और उनकी इसमें मदद की है. यही वजह है कि मेरे छात्र इस मनमाने फैसले को स्वीकार नहीं कर सकते.''

21 अप्रैल को मीर को बर्खास्त किए जाने से ठीक एक हफ्ते पहले, सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 311 के खंड 2 (सी) के तहत कर्मचारियों की जांच के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया था. ये उपबंध जांच किए बिना राज्य सरकार को उन कर्मचारियों को बर्खास्त करने का अधिकार देता है जो राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं. जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (सीआइडी) के नेतृत्व में गठित यह टास्क फोर्स, जिसमें पांच अधिकारी शामिल थे, को ऐसे लोगों की पहचान करनी थी जो राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकते हैं या जिन्हें 'राष्ट्र-विरोधी' समझा जा सकता है. अब तक, जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा ने ऐसे छह आदेश जारी किए हैं और कर्मचारियों को खुद का बचाव करने का कोई मौका दिए बिना बर्खास्त किया गया है. अफसरों का कहना है कि यह प्रक्रिया टास्क फोर्स बनने से पहले शुरू हो गई थी, क्योंकि इन छह के खिलाफ पिछली सरकारों ने मामले दर्ज किए थे.

ये सभी छह गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं, जिनमें उग्रवादियों की सहायता करने से लेकर विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने या नशीले पदार्थों के व्यापार में शामिल होने तक के आरोप शामिल हैं. उदाहरण के लिए, 2016 में हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की हत्या के बाद विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए मीर पर जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट के तहत आरोप लगाए गए थे—जो दो साल तक बिना मुकदमे के नजरबंदी की अनुमति देता है. हालांकि, जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने चार महीने के भीतर उन्हें रिहा करते हुए मामले को रद्द कर दिया था.

पुलवामा के रहने वाले नायब तहसीलदार नजीर अहमद वानी, कुलगाम के सहायक प्रोफेसर अब्दुल बारी नाइक और कुपवाड़ा के करनाह के बशीर अहमद शेख सभी जेल में हैं. एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, शेख को पिछली जुलाई में कुपवाड़ा जिले में नशीले पदार्थ और हथियार रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. नियंत्रण रेखा के पास दूरदराज के गांव करनाह के निवासी शेख के पड़ोसी ये मानने को तैयार नहीं हैं. उनके दो पड़ोसियों का कहना है, ''सब उनका बहुत सम्मान करते थे. उनकी गिरफ्तारी हम सबके लिए झटका थी. किसी को नहीं लगता कि वे ड्रग्स का धंधा करते होंगे.'' महत्वपूर्ण यह है कि वानी, नाइक या शेख तीनों में से किसी को भी अदालतों ने दोषी नहीं ठहराया है.

जम्मू-कश्मीर के पूर्व कानून सचिव मोहम्मद अशरफ मीर बताते हैं कि जब तक किसी व्यक्ति को अदालत से दोषी नहीं ठहराया जाता है, तब तक उसके खिलाफ आरोप, महज आरोप ही रहते हैं, भले ही वे पुलिस या खुफिया रिपोर्ट पर आधारित हों. वे कहते हैं, ''इन आरोपों को सबूतों और गवाहों के साथ साबित करना होगा. मुझे यकीन है कि बर्खास्तगी के आदेश अदालत में नहीं टिकेंगे. यहां न्याय के मूल सिद्धांत का पालन नहीं हुआ है इसलिए इनकी न्यायिक समीक्षा जरूर होगी. आरोपी को भी बात रखने का मौका मिलना चाहिए.'' अनुच्छेद 311 के तहत, अगर किसी कर्मचारी को किसी उल्लंघन के लिए बर्खास्त किया जाता है तो उसे सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए.

नाम न छापने की शर्त पर एक वकील, जो बर्खास्तगी को चुनौती देने के लिए एक केस तैयार कर रहे हैं, का कहना है कि सरकारी आदेशों की वैधता को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. जबकि अनुच्छेद 311 के खंड 2 (सी) के तहत, सरकार किसी कर्मचारी को बर्खास्त करने के लिए जांच कराने या उस कर्मचारी को फैसले की वजह बताने के लिए बाध्य नहीं है, लेकिन उसे अदालत में इस बात के सबूत पेश करने की आवश्यकता हो सकती है कि उसने आखिर यह निर्णय क्यों किया. वे बताते हैं, ''अदालतें इस पर विचार कर सकती हैं कि क्या कोई कर्मचारी वास्तव में राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है. एक गलत धारणा है कि सरकार की किसी व्यक्ति 'राज्य की सुरक्षा के खतरा' बताते हुए की गई कार्रवाई को चुनौती नहीं दी जा सकती.''

हालिया बर्खास्तगी से पहले ही, सरकार ने ऐसे कदम उठाए थे जिससे कर्मचारी बहुत चिंतित थे. ऐसा एक कदम पिछले साल अक्तूबर में जम्मू-कश्मीर सिविल सेवा नियमों में संशोधन था, जो 22 साल की सेवा पूरी कर चुके या 48 साल की उम्र वाले कर्मचारियों को सेवानिवृत्त करने की इजाजत देता था. नौकरी जाने की आशंका से डरे कई कर्मचारी कहते हैं कि वे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों से दूर रहने या राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर चुप रहने जैसे सारे एहतियात बरत रहे हैं ताकि वे सरकार की नजरों में न आ सकें. 20 से अधिक लोगों का कहना है कि वे ऐसे मित्रों या परिवार के सदस्यों से भी दूरी बनाए हुए हैं, जिनकी राजनीतिक विचारधारा को सरकार संदेह की दृष्टि से देख सकती है. वे सरकारी जांच से बचने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर संवेदनशील चर्चाओं से भी बचते हैं.

राज्य में नौकरियों की कमी है इसलिए यह डर और बढ़ गया है. जम्मू-कश्मीर में मजबूत निजी या कॉर्पोरेट क्षेत्र का अभाव है और सरकार ही सबसे बड़ी नियोक्ता है, जिसके लिए लगभग 4,50,000 लोग काम करते हैं. हालांकि सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के आंकड़ों से पता चलता है कि जम्मू-कश्मीर की बेरोजगारी दर दिसंबर 2020 में 16.2 प्रतिशत से घटकर इस साल मार्च में 9 प्रतिशत हो गई, लेकिन तथ्य यह है कि लिपिक पदों पर बहाली के लिए भी लाखों स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्रीधारी युवाओं के आवेदन आते हैं जो राज्य में नौकरियों की कमी को उजागर करता है. कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री के अनुसार, 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को निरस्त करने के एक साल के भीतर लगभग 5,00,000 नौकरियां चली गईं. ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि ''हमारे पास नौकरी बचाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है'' और वे वह सब कर रहे हैं ताकि सरकार के पास उनके पीछे पड़ने का कोई बहाना नहीं हो. एक सरकारी कर्मचारी जो अपना नाम जाहिर नहीं होने देना चाहते और एक एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर ही संवाद करने पर जोर देते हैं, बताते हैं, ''मौजूदा स्थिति में, कोई जवाबदेही नहीं है. सरकार के बारे में एक राय भी किसी व्यक्ति को मुश्किल में डाल सकती है.''
 
इस तरह के उत्पीड़न और 'मनमाने फैसलों' के डर से, जम्मू-कश्मीर के सरकारी कर्मचारी अब एकजुट हो रहे हैं. लोगों को नौकरी से निकालने के सरकार के फैसले को चुनौती देने के लिए संयुक्त पैनल का गठन किया गया है. जम्मू-कश्मीर कर्मचारी संयुक्त कार्रवाई समिति के अध्यक्ष मोहम्मद रफीक राथर का कहना है कि अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद से राज्य के कर्मचारियों को अभूतपूर्व उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है और मौजूदा उत्पीड़न 1990 के दशक से भी कहीं अधिक है जब राज्य में आतंकवाद चरम पर था. वे कहते हैं, ''कर्मचारी जिन विपरीत परिस्थितियों में काम कर रहे हैं, उसे देखते हुए सरकार को नरमी बरतनी चाहिए थी. कर्मचारियों को बस एक एसएचओ या एक अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर बाहर का दरवाजा दिखाया जा रहा है. यह तो अन्याय है और हम इसे हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने जा रहे हैं. हम परेशान महसूस कर रहे हैं और हमें नहीं पता कि हमें कब दरवाजा दिखा दिया जाएगा.''

कश्मीर में, बहुत से कर्मचारियों को पुलिस की ओर से 'वेरिफिकेशन (सत्यापन) कॉल' आई है और उसके बाद से ये कर्मचारी अपनी नौकरी गंवाने के डर में जी रहे हैं. कुछ महीने पहले ऐसे कॉल आने पर एक कर्मचारी से सरकारी नौकरी में आने से पहले के उनके काम-धंधे, पहले की पोस्टिंग की जगह, नियुक्ति की तारीख और परिवार के बारे में पूरी जानकारी मांगी गई. कॉल आने के बाद से वे नौकरी जाने के खौफ में जी रहे हैं. उन्हें लगता है कि किसी भी दिन उनकी बर्खास्तगी का सरकारी फरमान आ सकता है. वे कहते हैं, ''मैं बस अपने दिन गिन रहा हूं.''

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