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सेमीफाइनल आखिर जीता कौन?

नगर निकायों में अपनी बेहतर स्थिति को देखते हुए, क्या कांग्रेस यह मान सकती है कि उसके लिए सब कुछ ठीक चल रहा है?

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थोड़ी राहत : भोपाल में 4 जुलाई को एक रोड शो के दौरान मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रमुख कमलनाथ थोड़ी राहत : भोपाल में 4 जुलाई को एक रोड शो के दौरान मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रमुख कमलनाथ

मध्य प्रदेश निकाय चुनाव से पहले मीडिया और पार्टी के नेता इसे 2023 के विधानसभा का 'सेमीफाइनल' बता रहे थे. ढाई साल की देरी के बाद राज्य के 413 नगर निकायों के लिए हुए चुनाव के नतीजों ने ऐसा ही एहसास कराया. 16 नगर निगमों के लिए महापौर चुनने के लिए प्रत्यक्ष चुनाव हुए, जबकि 99 नगर पालिकाओं और 298 नगर परिषदों के अध्यक्षों का चुनाव बाद में पार्षदों की ओर से अप्रत्यक्ष चुनावों के माध्यम से किया जाएगा.

ये नतीजे भाजपा और कांग्रेस दोनों की प्रदेश में मौजूदा राजनीतिक जमीन का इशारा दे रहे हैं. साल 2014 के पिछले चुनाव में भाजपा ने 16 प्रतिष्ठित नगर निगमों पर कब्जा जमाया था जबकि इस बार वह केवल 9 जीतने में सफल रही. कांग्रेस जिसके कब्जे में पिछली बार एक भी नगर निगम नहीं था, उसने अपनी संख्या शून्य से बढ़ाकर पांच कर ली. ग्वालियर और जबलपुर में भाजपा की हार विशेष रूप से शर्मनाक मानी जा रही है क्योंकि कांग्रेस ने 57 साल के अंतराल के बाद यहां जीत हासिल की है. पार्टी के लिए ग्वालियर की हार इसलिए भी कहीं बड़ा झटका है क्योंकि दो-दो केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत भाजपा के कई बड़े नेता इस क्षेत्र से आते हैं और यह भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है. कांग्रेस ने लंबे समय के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के घरेलू मैदान छिंदवाड़ा में भी जीत हासिल की. पार्टी के विंध्य क्षेत्र का मुख्यालय रीवा भी जीता, जहां 2018 के विधानसभा चुनावों में उसे करारी हार का सामना करना पड़ा था. इसके अलावा बुरहानपुर और उज्जैन भी कांग्रेस की झोली में जाते-जाते रह गए. भाजपा ने ये दोनों निगम 1,000 से भी कम मतों के अंतर से जीते हैं.

भाजपा इस बात से थोड़ी राहत महसूस कर सकती है कि ग्वालियर और जबलपुर में उसके पास ही सबसे ज्यादा पार्षद हैं. लेकिन यह सवाल भाजपा नेताओं को परेशान करेगा कि उसके पुराने शहरी किले में सेंध क्यों लग गई और पार्टी मेयर जैसे महत्वपूर्ण चुनाव कैसे हारी? शहरी क्षेत्रों में परंपरागत रूप से भाजपा का दबदबा रहता है लेकिन मेयर का चुनाव हारने वाली पार्टी के लिए विधानसभा चुनाव में शहरी क्षेत्र की सीटों पर क्या असर होगा, खासकर तब जब कि प्रदेश की कुल 230 विधानसभा सीटों में से लगभग एक तिहाई शहरी क्षेत्रों में हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों का सुझाव है कि भाजपा का सारा खेल नगर निगमों में टिकट वितरण की असावधानियों के कारण खराब हुआ है. जबलपुर में, कांग्रेस उम्मीदवार जगत बहादुर अन्नू, 'आम जनता के आदमी' हैं, जो नगरपालिका चुनावों की राजनीति में जमीनी स्तर पर बहुत पसीना बहाने के बाद शीर्ष पद पर पहुंचे हैं और उन्हें शुरू से ही सबसे पसंदीदा उम्मीदवार माना जाता था. इसके उलट भाजपा प्रत्याशी को ऊपर से थोपा गया था. ग्वालियर में, सिंधिया और तोमर खेमे में टिकट के लिए जोरदार खींचतान मची थी और नतीजा सामने है. दिलचस्प बात यह है कि पांच दशकों के बाद ग्वालियर का मेयर पद कांग्रेस की झोली में डालने वाले प्रत्याशी की जड़ें भाजपा में हैं. यहां से विधायक सतीश सिकरवार की पत्नी शोभा जीती हैं. सिकरवार भाजपा से कांग्रेस में आए हैं. 

भाजपा अपनी जिस चुनावी मशीनरी के लिए विख्यात है, वह इन चुनावों के दौरान सक्रिय नहीं दिखी. इसकी बहुप्रचारित बूथ-स्तरीय रणनीति स्पष्ट रूप से काम नहीं कर रही थी, विशेष रूप से भोपाल जैसे भाजपा के गढ़ों में कम मतदान इसका इशारा दे रहा था. मतदान के दिन से ही ऐसी खबरें आ रही थीं कि मतदाता अपने पुराने बूथों की मतदाता सूचियों में अपना नाम ढूंढ़ने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे, लेकिन पार्टी में किसी ने उन्हें यह नहीं बताया कि उनके नाम किस बूथ पर हैं. हालांकि भाजपा ने अंतत: भोपाल और इंदौर को मजबूत अंतर से जीत लिया, लेकिन कम मतदान और बूथ प्रबंधन की खामियों के कारण परिणाम आने तक पार्टी नेताओं की सांसें अटकी हुई थीं. 

इन नगरपालिका चुनावों ने राज्य में भाजपा और कांग्रेस के अलावा दूसरे दलों के लिए भी संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं. आम आदमी पार्टी (आप) ने सिंगरौली नगर निगम जीत लिया. आप की रानी अग्रवाल ने त्रिकोणीय मुकाबले में मेयर की सीट जीती. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सिंगरौली में रोड शो किया था और इस बात के संकेत मिल रहे थे कि आप इस सीट को मजबूती से लड़ रही है और जीतने की रेस में है. 

बुरहानपुर में कांग्रेस 600 मतों के अंतर से हारी और ऐसे आरोप लग रहे हैं कि असदुद्दीन ओवैसी की एआइएमआइएम ने यहां भाजपा की 'बी टीम' का काम करके उसकी जीत तय की. एआइएमआइएम के उम्मीदवारों को बुरहानपुर में 10,000 से अधिक और पड़ोसी खंडवा में लगभग 10,000 वोट मिले. महाराष्ट्र की सीमा से लगे दोनों शहरों में पार्टी की मौजूदगी पहले से ही है. एआइएमआइएम ने जबलपुर, खंडवा और बुरहानपुर में चार पार्षद सीटें भी जीतीं. 

मध्य प्रदेश में एआइएमआइएम की मौजूदगी तो भाजपा के लिए खुशी की बात हो सकती है कि वह कांग्रेस के वोट काट लेगी. लेकिन, राज्य के चुनावी परिदृश्य में आप की उपस्थिति से वह इतना सुकून महसूस नहीं कर सकती क्योंकि इसके भाजपा और कांग्रेस दोनों के वोटों में सेंधमारी की संभावना है, और सत्ताधारी पार्टी के अधिक नुक्सान की संभावना है. सिंगरौली जीतने के अलावा, ग्वालियर में आप उम्मीदवार को 45,762 वोट मिले, जबकि सिंगरौली में पांच नगरसेवक और 10 छोटे नगर परिषदों (टीयर-3) में इसके 11 पार्षद चुने गए.

नगर निकायों में अपनी बेहतर स्थिति को देखते हुए, क्या कांग्रेस यह मान सकती है कि उसके लिए सब कुछ ठीक चल रहा है? राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर कहते हैं, ''चुनाव अच्छे उम्मीदवारों और पार्टी के समर्थन से जीते जाते हैं. कांग्रेस ने उन सीटों पर जीत हासिल की जहां उसके पास बेहतर उम्मीदवार और उन उम्मीदवारों के लिए काम करने वाले नेता थे. 2023 के विधानसभा चुनाव में, कांग्रेस को संगठित होकर चुनाव लड़ना होगा.'' 

दिलचस्प बात यह रही कि इन नतीजों के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों ने जश्न मनाया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ट्विटर पर पार्टी को बधाई दी और इसका श्रेय शिवराज सिंह चौहान सरकार के कामकाज को दिया. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी मध्य प्रदेश में पार्टी की 'जीत' के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं को बधाई दी.

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