scorecardresearch
 

सीमांकन पर मची रार

विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन किया जाता है तो सीटों की संख्या के लिहाज से राज्य में घाटी के जिलों को नुक्सान उठाना पड़ेगा

एएफपी एएफपी

असम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मणिपुर, पूर्वोत्तर के इन राज्यों के साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में परिसीमन अभ्यास शुरू करने के केंद्र सरकार के हालिया फैसले पर विपक्ष और नागरिक समूहों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. अगले साल असम में विधानसभा चुनाव होने हैं और विपक्षी दल इसे चुनाव से पहले के सियासी हथकंडे के रूप में देख रहे हैं. इस कदम की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठ रहा है.

तकनीकी रूप परिसीमन किसी आबादी की संरचना में आए बदलाव को लोकसभा और विधानसभा में उचित प्रतिनिधित्व के लिए जनसांख्किय पुनर्गठन का अभ्यास है. इसमें लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से परिभाषित किया जाता है. पर विपक्ष इसके संभावित सियासी नतीजों को लेकर परेशान है. यह अभ्यास अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या के पुनर्विचार की बात भी करता है. सिद्धांत रूप में इसका उद्देश्य सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करना है.

भारत में पूर्व में चार बार यह अभ्यास हो चुका है. नवीनतम अभ्यास (2002-2008) में, ऊपर वर्णित चार पूर्वोत्तर राज्यों को बाहर रखा गया था क्योंकि परिसीमन के आधार के रूप में 2001 की जनगणना का उपयोग किया जा रहा था और इसको लेकर गुवाहाटी उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी. चुनौती का तर्क यह था कि इन राज्यों की जनगणना 2001 के आंकड़ों में छेड़छाड़ की गई थी. इन चार राज्यों में परिसीमन अभ्यास को स्थगित करने के लिए राष्ट्रपति को सशक्त बनाने के उद्देश्य से 14 जनवरी, 2008 को परिसीमन अधिनियम 2002 में संशोधन किया गया था.

इस साल 28 फरवरी को, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 2008 के स्थगन आदेश को रद्द कर दिया, जिससे इन चार राज्यों में परिसीमन अभ्यास के लिए रास्ता साफ हो गया. 6 मार्च को, केंद्रीय कानून मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में परिसीमन आयोग के गठन की घोषणा की थी. चुनाव आयोग के एक पूर्व कानूनी सलाहकार एस.के. मेंदिरत्ता, जिन्होंने आयोग को 50 से अधिक वर्षों तक कानूनी सलाह दी है, ने जून में तीन चुनाव आयुक्तों को लिखकर कहा कि परिसीमन आयोग के गठन की घोषणा वाली कानून मंत्रालय की अधिसूचना, जन प्रतिनिधित्व कानून (आरपीए), 1950 का उल्लंघन है.

वर्ष 2008 में राष्ट्रपति के अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर और नगालैंड में परिसीमन को स्थगित करने के बाद संसद ने निर्णय लिया कि इन राज्यों में सीटों की सीमाओं के फिर से निर्धारण के लिए एक और परिसीमन आयोग बनाने की बजाए, यह काम चुनाव आयोग से करवाया जाए. आरपीए को संशोधित किया गया और चुनाव आयोग को इस कार्य के लिए वैधता प्रदान करने के लिए धारा 8 जोड़ी गई. पहले के दो मौकों पर जब चुनाव आयोग पर दिल्ली (1992) और उत्तराखंड (2000) में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से परिभाषित करने का आरोप लगाया गया था, तब परिसीमन अभ्यास पर तकनीकी रूप से रोक थी.

मेंदिरत्ता ने दोनों बार चुनाव आयोग की मदद की थी और 2002 के परिसीमन आयोग के सलाहकार भी थे. उस अनुभव को देखते हुए, मेंदिरत्ता की बात में वजन तो दिखता है, पर हर कोई उनसे सहमत नहीं है. पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत कहते हैं, ''यह न भूलें कि इन चार राज्यों का परिसीमन, परिसीमन अधिनियम, 2002 के तहत किया जा रहा है. जब स्थगन आदेश को रद्द किया जाना था, तो राष्ट्रपति के पास दो विकल्प थे—2002 अधिनियम के साथ जाने का जो परिसीमन आयोग के प्रावधान को अनिवार्य करता है, या फिर चुनाव आयोग को इसके लिए अधिकृत करने का. राष्ट्रपति ने परिसीमन आयोग के गठन का विकल्प चुना क्योंकि जम्मू-कश्मीर को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है.''

न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) कुलदीप सिंह, जिन्होंने 2002 के परिसीमन आयोग का नेतृत्व किया था, इस बिंदु पर रावत से सहमति जताते हैं, पर यह भी स्वीकार करते हैं कि मेंदिरत्ता भी ''तकनीकी आधार पर सही हैं.'' वे कहते हैं, ''परिसीमन आयोग के प्रमुख को छोड़कर, अन्य सभी सदस्य चुनाव आयोग से हैं.'' कुलदीप यह भी बताते हैं कि परिसीमन आयोग के आदेशों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है, और यह दूसरा कारण हो सकता है कि सरकार ने यह रास्ता अपनाया है. रावत कहते हैं, ''आयोग के विकल्प को चुनने के पीछे एक और कारण यह हो सकता है कि इस तरह के अभ्यास अक्सर बहुत सारी कानूनी चुनौतियों को आमंत्रित करते हैं. आयोग के साथ यह परेशानी नहीं होगी.''

कांग्रेस यह सवाल भी उठा रही है कि अगला राष्ट्रीय परिसीमन 2026 में होना है जो बहुत दूर नहीं है तो अभी इसकी जल्दी क्यों है. असम से कांग्रेस के लोकसभा सांसद प्रद्युत बोरदोलोई कहते हैं, ''इन चार राज्यों में यह लंबे वक्त से नहीं हुआ है, इसलिए यह अभ्यास नवीनतम जनगणना के आधार पर किया जाना चाहिए. 2021 में अगली जनगणना होने वाली है इसलिए हमारे राज्यों में परिसीमन की कवायद उसके बाद शुरू होनी चाहिए.'' असम के दो निवासियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की है जिसमें जनगणना 2021 की समाप्ति तक, परिसीमन प्रक्रिया को स्थगित करने के लिए अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई है ताकि ''जनसंख्या के सबसे हालिया आंकड़े उपलब्ध हों.''

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर केंद्र और असम सरकार से जवाब मांगा है. याचिका में यह भी कहा गया है कि असम में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), 2019 के विरोध और प्रकाशित एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) को लेकर आशंका के कारण, राज्य में स्थिति इतनी अस्थिर थी कि 28 अगस्त, 2019 से छह महीने के लिए इसे 'अशांत क्षेत्र' घोषित किया जाना था. अगस्त 2019 में प्रकाशित एनआरसी को चुनौती दी गई है, फिर भी सूची से बाहर रहने वालों का क्या होगा इसको लेकर कोई स्पष्टता नहीं है.

भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने दावा किया है कि राज्य के मूल निवासियों के हितों की रक्षा के लिए परिसीमन की जरूरत है. असम के वित्त मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा कहते हैं, ''परिसीमन होना चाहिए ताकि 126 (विधानसभा) में से 110 सीटें राज्य के मूल निवासियों के लिए रखी जा सकें.'' पर उनकी दलील को प्रब्रजन विरोधी मंच (पीवीएम) जैसे संगठनों ने खारिज कर दिया है, जिसे राज्य में आई अवैध बांग्लादेशियों से राज्य के मूल निवासियों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया था.

पीवीएम के संयोजक और सुप्रीम कोर्ट के वकील उपमन्यु हजारिका कहते हैं, ''भाजपा-एजीपी गठबंधन को लगने लगा है कि राज्य के मूल निवासियों का वोट अब उनके हाथ से खिसक गया है और इस परिसीमन अभ्यास से उन्हें उन सीटों की संख्या कम करने में मदद मिलेगी, जहां मूल निवासी बहुमत में हैं. यह सीएए के जरिए अवैध हिंदू बांग्लादेशी प्रवासियों को वैध नागरिक बनाने का लाभ उठाने के लिए किया जा रहा है.''

मणिपुर में कांग्रेस नेताओं ने आशंका जताई है कि यदि विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्गठन किया जाता है तो सीटों की संख्या के लिहाज से राज्य में घाटी के जिलों को नुक्सान उठाना पड़ेगा. डर कुछ पहाड़ी जिलों की आबादी में 'असामान्य उच्च वृद्धि' से उपजा है जिसे कई लोग जनगणना आंकड़ों में विसंगति मानते हैं. जम्मू-कश्मीर में, नेशनल कॉन्फ्रेंस ने परिसीमन प्रक्रिया को खारिज कर दिया है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने जाने को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. उसका कहना है कि जम्मू-कश्मीर संविधान के अनुसार, तत्कालीन राज्य के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन भी देश के बाकी हिस्सों के साथ 2026 में किया जाना था.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें