scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 29/- रुपये में

कट्टरपंथी मान के उदय का क्या है राज

पूरे पंजाब की निगाहें अब सिमरनजीत सिंह मान के अगले कदम पर लगी हैं कि क्या वे अपना कड़ा रवैया जारी रखेंगे या सांसद के रूप में नरम पड़ेंगे

X
कठोर रुख : सिमरनजीत मान 26 जून को संगरूर में जीत के बाद कठोर रुख : सिमरनजीत मान 26 जून को संगरूर में जीत के बाद

असल में पंजाब की राजनीति में पिछले एक साल में आश्चर्यजनक घटनाएं हुई हैं. लोगों को चौंकाने वाली सबसे ताजा बात संगरूर लोकसभा उपचुनाव परिणाम है, जिसमें 77 वर्षीय सिमरनजीत सिंह मान ने गुमनामी से बाहर आकर सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) को झटका दिया है. साल 2014 से पिछले लगातार दो निर्वाचनों में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व राज्य के नए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने किया था और मार्च में उनके नए पद पर बैठने के बाद यहां उपचुनाव की जरूरत पैदा हुई थी. साल 2019 के आम चुनाव में यहीं अपनी जमानत गंवा चुके सिमरनजीत सिंह मान ने आप के उम्मीदवार गुरमेल सिंह को 5,822 मतों से हराया.

पिछले दो दशकों में सिमरनजीत मान और उनका शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) उनके कट्टरपंथी तथा खालिस्तान समर्थक विचारों के कारण हाशिये पर पहुंच गया था. सिर्फ तीन महीने पहले हुए राज्य विधानसभा चुनावों में आप ने राज्य की कुल 117 में से 92 सीटें जीती थीं और संगरूर इसका मुख्य केंद्र रहा था. आप ने इस लोकसभा क्षेत्र की सभी नौ विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. मुख्यमंत्री भगवंत मान के अलावा, वित्त मंत्री हरपाल चीमा और स्कूल शिक्षा मंत्री गुरमीत सिंह मीत हेयर भी इसी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा हैं.

सिमरनजीत मान की पिछली चुनावी जीत 1999 के लोकसभा चुनाव में संगरूर से हुई थी. आइपीएस अधिकारी रहे मान ने 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद सेवा से त्यागपत्र दे दिया था. अपने खालिस्तान समर्थक रुख के कारण उन्हें पूरे भारत की जेलों में कई साल बिताने पड़े और केवल इसी वजह से वे कट्टरपंथियों और खालिस्तानपरस्तों के नायक हैं. असल में, 26 जून को जब उन्हें विजेता घोषित किया गया तो उन्होंने अपनी जीत मारे गए खालिस्तानी आतंकी जरनैल सिंह भिंडरांवाले को समर्पित करते हुए यह भी ऐलान किया कि वे संसद में कश्मीरी आतंकियों और माओवादियों के मुद्दों को उठाएंगे. उनके स्पष्ट अलगाववादी विचारों के कारण सुरक्षा एजेंसियां पहले से ही तनाव में होंगी. उन्हें अब इन विचारों को फैलाने के लिए एक बड़ा मंच मिल जाने से निस्संदेह यूरोप, कनाडा और अन्य जगहों पर खालिस्तान समर्थक समूह उत्साहित हुए होंगे.

इस निर्वाचन क्षेत्र में आप की उम्मीदों को कम मतदान से धक्का पहुंचा. यहां मतदान प्रतिशत 45.3 प्रतिशत था, जो 2019 के लोकसभा चुनाव के 72.4 प्रतिशत और मार्च में हुए विधानसभा चुनाव में हुए 68 प्रतिशत मतदान से बहुत कम था. मतदान के दिन आप के स्थानीय कार्यकर्ता घबराए हुए थे. असल में, स्थानीय प्रशासन ने कथित तौर पर मुख्यमंत्री भगवंत मान के दबाव में मतदान का समय एक घंटे के लिए बढ़ाया भी था. चुनाव आयोग ने अब इस मामले की जांच के आदेश दिए हैं. सूत्रों का कहना है कि चुनाव के कुछ ही हफ्तों पहले 29 मई को लोकप्रिय रैपर सिद्धू मूसेवाला की दिनदहाड़े हत्या ने इस इलाके में आप की विश्वसनीयता को भी नुक्सान पहुंचाया होगा.

सिमरनजीत मान के समर्थक उन्हें पंजाब का असली मान कहते हैं और वे तीसरी बार संसद पहुंचे हैं. उनकी पहली जीत 1989 में तब हुई थी जब आतंकवाद चरम पर था. तब उन्होंने और उनके सहयोगियों ने पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से छह पर जीत हासिल की थी. मान ने भागलपुर (बिहार) जेल से तरनतारन सीट जीती थी. बाद में उन्हें संसद में प्रवेश करने से रोक दिया गया था क्योंकि वे सिख रीति-रिवाज के मुताबिक एक लंबी तलवार लेकर चलते थे (जाहिर तौर पर उन्होंने इसके विरोध में सदस्यता छोड़ दी थी). इसके दस साल बाद, 1999 में उन्होंने संगरूर में अकाली दल के दिग्गज सुरजीत सिंह बरनाला को हराया. इस बार उन्होंने संसद में एक छोटी और सांकेतिक तलवार के साथ प्रवेश किया था.

मान ने अपनी हालिया जीत को राजनैतिक झुकाव वाले रैप गायकों दीप सिद्धू और सिद्धू मूसेवाला को भी समर्पित किया. दोनों गायकों की मृत्यु कम उम्र में हुई और उनके अंतिम संस्कार में लगभग पांच लाख लोग शोक व्यक्त करने पहुंचे थे. मतदान से एक शाम पहले मूसेवाला का आखिरी गाना 'एसवाइएल' यूट्यूब पर रिलीज किया गया था. इस गाने में आतंकवादी बलविंदर सिंह जटाना का महिमामंडन किया गया है, जिसने 1990 में सतलुज यमुना लिंक (एसवाइएल) नहर का निर्माण रोकने के लिए कथित रूप से मुख्य अभियंता एम.एल. सीकरी की हत्या की थी. आप का आरोप है कि इस गाने ने स्थानीय लोगों की भावनाओं को मान के पक्ष में भड़काया. 26 जून को यूट्यूब ने भारत में इस गाने को हटा लिया था, लेकिन संभवत: इससे जो नुक्सान होना था, वह हो चुका था.

साल 2014 के आम चुनाव के बाद से पंथिक (ग्रामीण धार्मिक सिख) मतदाताओं ने धीरे-धीरे सुखबीर बादल के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल से किनारा कर लिया था. इस उपचुनाव में कट्टरपंथियों की सहानुभूति हासिल करने के लिए बादल ने दोषी साबित आतंकवादी बलवंत सिंह राजोआना की बहन कमलदीप कौर राजोआना को मैदान में उतारा था, लेकिन उन्हें मात्र 6.3 प्रतिशत मत मिले और पांचवें स्थान पर रहने के साथ उनकी जमानत जब्त हो गई. पंथिक मतदाताओं का बड़ा हिस्सा अकाली दल से अलग होकर कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व काल में कांग्रेस के साथ रहा और बाद में भगवंत मान के नेतृत्व वाली आप की ओर झुक गया था. लंबे समय से चले आ रहे कई अन्य मुद्दों के अलावा उनकी मुख्य मांग 2015 के गुरु ग्रंथ साहिब को अपवित्र करने के मामले तथा बाद में इसके खिलाफ प्रदर्शन के दौरान कोटकपूरा-बेहबल कलां में हुई पुलिस फायरिंग के मामले में न्याय पाना है.

इधर, तीन महीने पुरानी भगवंत मान सरकार का शुरुआती दौर मुश्किल भरा रहा है. कानून-व्यवस्था के संकट के अलावा, प्रशासन पर आप प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अधीन होने के आरोप लगाए जा रहे हैं. राजनैतिक विश्लेषक मलविंदर सिंह माली का मानना है कि यह परिणाम आप नेतृत्व को झकझोर कर उसकी आंखें खोल देने वाला रहा होगा. वे कहते हैं, ''पंजाब पर दिल्ली से शासन नहीं किया जा सकता. यह संदेश स्पष्ट है.''

जहां तक सिमरनजीत मान का सवाल है, तो उनका प्रचार अभियान पंजाब बनाम दिल्ली की लड़ाई के इर्द-गिर्द खड़ा किया गया था और पंजाब को दो दशकों तक उग्रवाद का शिकार बनाए रखने वाले मुद्दों—चंडीगढ़ को पंजाब को दिया जाना, एसवाइएल नहर की स्थिति तथा हिमाचल और हरियाणा के पंजाबीभाषी क्षेत्रों को वापस पंजाब में मिलाया जाना—की अब राज्य में वापसी हो सकती है. विधानसभा चुनाव के दौरान इनमें से कई मुद्दों पर आप नेताओं ने नरमी बरती थी, लेकिन अब यह चाल चलने वाली नहीं है.

उल्लेखनीय कि 1995 में मोगा सम्मेलन में अकाली दल के पुनर्गठन के बाद सिमरनजीत मान के गुट ने प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाले नए संगठन से नाता तोड़ लिया था. नए अकाली दल में सुखदेव ढींडसा, सुरजीत सिंह बरनाला, गुरचरण सिंह तोहरा, जगदेव सिंह तलवंडी, रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा आदि जैसे पंथिक दिग्गज थे. इस समूह ने खुद को पूरे पंजाब की धर्मनिरपेक्ष पार्टी के रूप में पेश किया और बाद में भाजपा से हाथ मिलाकर पूरे राज्य पर प्रभुत्व स्थापित कर लिया. इस दौरान, सिमरनजीत का कट्टरपंथी और अलगाववादी एजेंडा उन्हें धीरे-धीरे राज्य की राजनीति में गुमनामी की ओर धकेलता रहा. अब जब अकाली दल संघर्षरत है, तब इस चुनावी जीत से मान ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं जहां से वे पंथ का नेतृत्व फिर से हासिल कर सकते हैं.

सिमरनजीत मान का ताल्लुक पंजाब के एक मजबूत राजनैतिक परिवार से है. उनके पिता जोगिंदर सिंह मान अकाली दल दिग्गज मास्टर तारा सिंह के करीबी सहयोगी और 1967-69 तक पंजाब विधानसभा के स्पीकर थे. उनकी पत्नी गीतिंदर कौर कैप्टन अमरिंदर की पत्नी और पटियाला से कांग्रेस सांसद परनीत कौर की छोटी बहन हैं.

इस उपचुनाव की तैयारी के दौरान भी सिमरनजीत मान ने खालिस्तान पर अपने रुख में कोई बदलाव नहीं किया था. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के बारे में भी उनके अपने विचार हैं और वे पूर्व आतंकवादी जगतार सिंह हवारा को अकाल तख्त के जत्थेदार के रूप में देखना चाहते हैं. पूरे पंजाब की निगाहें अब सिमरनजीत सिंह मान के अगले कदम पर लगी हैं कि क्या वे अपना कड़ा रवैया जारी रखेंगे या सांसद के रूप में नरम पड़ेंगे.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें