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मणिपुरः उग्रवाद की वापसी!

म्यांमार सीमा के पास एक सैन्य काफिले पर भीषण हमले ने राज्य में हालिया अतीत में कायम शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया है और भारत में सबसे लंबे चलने वाले विद्रोहों में से एक को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं

जानलेवा सफर कर्नल त्रिपाठी इसी जीप में अपने परिवार के साथ सवार थे जानलेवा सफर कर्नल त्रिपाठी इसी जीप में अपने परिवार के साथ सवार थे

नवंबर की 13 तारीख की सुबह थी. 41 वर्षीय कर्नल विप्लव त्रिपाठी, अपनी 33 वर्षीया पत्नी अनुजा और आठ साल के बेटे अबीर के साथ काली महिंद्रा बोलेरो जीप में सवार होकर मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के लिए रवाना हुए. परिवार 1,643 किमी लंबी म्यांमार सरहद से कुछ किलोमीटर दूर बेहियांग टी गांव में रात्रि प्रवास करके लौट रहा था. इस सरहद की रखवाली असम राइफल्स करती है. उसकी 46वीं बटालियन के कमांडिंग अफसर कर्नल त्रिपाठी और उनके परिवार के साथ तीन मारुति जिप्सियों में दर्जन भर हथियारबंद सिपाही थे. वे गांव में सामुदायिक मेल-मिलाप के कार्यक्रम से लौट रहे थे. ऐसी यात्रा में अफसर आम तौर पर अपने परिवार को साथ ले जाते हैं.

यह छोटा-सा काफिला अभी गांव से निकला ही था कि वह संकरी सड़क एक के बाद एक धमाकों से दहल गई. घने जंगलों में घात लगाकर इंतजार कर रहे उग्रवादियों ने ऑटोमैटिक बंदूकों और राइफल ग्रेनेड से वाहनों पर ताबड़तोड़ गोलियां दागीं. कुछ मिनट बाद जब गोलाबारी रुकी, कर्नल त्रिपाठी और उनका परिवार बेजान पड़ा था. चार अन्य सैनिक मारे गए और छह गंभीर रूप से घायल हुए.

दो उग्रवादी संगठनों, पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और मणिपुर नगा पीपल्स फ्रंट (एमएनपीएफ), ने उसी दिन एक बयान जारी करके हमले की जिम्मेदारी ली. मणिपुर भारत के सबसे लंबे समय से चले आ रहे विद्रोहों में से एक का गवाह रहा है. यहां कम से कम 40 प्रतिबंधित भूमिगत संगठन सक्रिय हैं. फिर भी पिछले छह साल से उग्रवादी धड़ों ने इतना दुस्साहसी हमला नहीं किया था. इससे पहले बड़ा हमला 4 जून 2015 को हुआ था, जब यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ वेस्टर्न साउथईस्ट एशिया (यूएलएफडब्ल्यूएसए) के अलगाववादियों ने चंदेल जिले में भारतीय सेना के काफिले पर घात लगाकर हमला किया और 18 सैनिकों को मार डाला था.

राज्य के सिंघात सबडिविजन में 13 नवंबर की हत्याओं ने बीते कुछ साल से चली आ रही थोड़ी-बहुत शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया है. यह घटना ऐसे दौर में हुई जब इलाका उथल-पुथल से गुजर रहा है. म्यांमार की सेना ने 1 फरवरी को सरकार का तख्तापलट करके लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेताओं को हिरासत में ले लिया. सैन्य शासकों के अत्याचारों से त्रस्त होकर भाग रहे हजारों लोगों का मणिपुर सहित भारत के सरहदी राज्यों में तांता लग गया. इस अफरातफरी में म्यांमार के शिविरों में डेरा डाले पीएलए और एमएनपीएफ सरीखे धड़ों को खुलकर काम करने का मौका मिल गया.

खुली हुई लंबी सरहद

पाकिस्तान और बांग्लादेश से सटी सरहदों पर तो काफी जगह कांटेदार बाड़ लगी हैं और तेज रोशनी से जगमगाती पट्टियां भी हैं. मगर म्यांमार से सटी भारत की सीमा पर बाड़ नहीं है, सीमा दर्शाने वाले खंभे भर खड़े हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड (एनएसएबी) के सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल एस.एल. नरसिंहन (सेवानिवृत्त) कहते हैं, ''म्यांमार की सरहद से एक दिन में आने-जाने की दूरी पर कोई भी जगह असुरक्षित है. वे (उग्रवादी) आ सकते हैं, घात लगाकर हमला कर सकते हैं और वापस जा सकते हैं.''

मणिपुरः उग्रवाद की वापसी!
मणिपुरः उग्रवाद की वापसी!

साल 2015 के हमले के बाद भारतीय सेना की विशेष इकाइयों ने बेहद फुर्ती से म्यांमार के भीतर घुसकर नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (खापलांग) या एनएससीएन(के) के शिविरों पर हमले किए थे. पिछले साल मई में पूर्वी लद्दाख की सरहद पर चीन के साथ तनाव की वजह से भारतीय सेना को इस इलाके से विशेष बलों को बुलाकर उत्तर में चीन के साथ लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर हजारों किलोमीटर के क्षेत्र में तैनात करना पड़ा.

सेना के शीर्ष अफसर चूड़ाचांपुर के हमले में बाहरी मदद की संभावना से इनकार नहीं करते. चीन उत्तरपूर्व के विद्रोही धड़ों को खुला और छिपा समर्थन देता रहा है. पिछले अक्तूबर में गुवाहाटी के यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून) पंचाट में दाखिल एक बेलाग हलफनामे में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बताया था कि परेश बरुआ के यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (इंडिपेडेंट) या उल्फा (आइ) का अड्डा चीन के यूनान प्रांत के रुइली में था. 13 नवंबर के हालिया हमले की जांच कर रही सुरक्षा एजेंसियों को अब तक केवल एक अहम सुराग मिला है. यह एक सैटेलाइट फोन है, जो कर्नल त्रिपाठी और उनके सिपाहियों पर हमले के आसपास के वक्त तक नजदीकी गांवों में सक्रिय था.

बागी धड़े फिर एकजुट हो रहे हैं?

विद्रोह से मुकाबले के लिए सशस्त्र बल दशकों से मणिपुर में तैनात हैं. इम्फाल नगर परिषद इलाके को छोड़कर पूरे राज्य में सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) अधिनियम 1958 लागू है. हाल के हमले ने कई लोगों को हैरत में डाल दिया, क्योंकि सशस्त्र बल कर्मी के परिवार के सदस्यों को पहली बार निशाना बनाया गया है. बाद में जिम्मेदारी लेने वाले दोनों उग्रवादी धड़ों ने कहा कि उन्हें काफिले में परिवार के सदस्यों की मौजूदगी का पता नहीं था. हालांकि, घात बिछाने वाले उग्रवादी कर्नल त्रिपाठी की आसन्न यात्रा के बारे में साफ तौर पर जानते थे और उनके पास हमले की जगह तय करने, हथियारबंद काडर को लाने और आइईडी (इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसें) लगाने का वक्त था.

विद्रोहियों ने जो जगह चुनी, वह भी अजीबोगरीब है. पीएलए में इम्फाल घाटी के जातीय मेइतेइयों का दबदबा है और चुराचांदपुर में मजबूत मौजूदगी नहीं है. जिले में कुकी, पाइते और जोमी जनजातियों के उग्रवादी धड़े ज्यादा सक्रिय हैं. इम्फाल के दक्षिण में 65 किमी दूर और म्यांमार सीमा पर बसा चुराचांदपुर जिला 2003 में भारतीय सेना के ऑपरेशन ऑल क्लियर के बाद से ही विद्रोही हमलों से काफी मुक्त रहा है. इलाके के ज्यादातर आदिवासी उग्रवादी धड़े केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता कर रहे हैं, जो अलग-अलग चरणों में हैं, और उन्होंने अपनी कार्रवाइयां स्थगित कर दी हैं. विशेषज्ञ यह जानने को उत्सुक हैं कि क्या यह हमला विद्रोही धड़ों और इस मामले में पीएलए और एमएनपीएफ के बीच नए गठजोड़ के उभरने का संकेत है.

यह अभी साफ नहीं है कि क्या चुराचांदपुर में सक्रिय कूकी धड़े ने इस हमले को दबा-छिपा समर्थन दिया है या इस हमले से वे भी हैरान रह गए. वहीं, मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने कहा, ''उग्रवादी धड़ों की तरफ से यह हताशा और अस्तित्व की लड़ाई का संकेत है. राज्य में उग्रवाद के लिए जरा भी समर्थन नहीं है. ऐसे में अपना वजूद दिखाने के लिए ये धड़े साथ आ रहे हैं.''

इम्फाल घाटी के दूसरे मेइतेइ धड़ों की तरह पीएलए ने भी भारत सरकार के साथ न तो किसी तरह के युद्धविराम समझौते पर दस्तखत किए हैं और न ही ऐसी कोई मंशा जताई है. फिर भी मणिपुर को अलग करने के लिए संघर्षरत यह धड़ा पिछले पांच या छह साल से सुस्त पड़ा था.

म्यांमार कारक

पीएलए मुख्यत: म्यांमार से काम कर रहा है और इसे तीन नेता चलाते हैं. ये हैं प्रेसिडेंट और 'लेफ्टिनेंट जनरल' आइरेंगबन चाओरीन उर्फ भोरोत, वाइस-प्रेसिडेंट और 'आर्मी चीफ' एम.एम. नगोउबा उर्फ प्रबीन शर्मा, और जनरल सेक्रेटरी सनासम गुनेन उर्फ फाल्गुनी. माना जाता है कि ये तीनों उम्र के सत्तरवं  पड़ाव में हैं. ये मंडाले में रहते हैं और ट्रांसपोर्ट तथा सुपारी का कारोबार करते हैं.

मणिपुर की सरहद पर म्यांमार के तामु इलाके में स्थित शिविरों में पीएलए के कुछ सौ कार्यकर्ता हैं. भारतीय और म्यांमार के बलों ने पहले सीमा-पार अभयारण्यों में रह रहे विद्रोहियों के खिलाफ संयुक्त कार्रवाइयां की हैं. रणनीतिक मामलों के विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, ''म्यांमार की सीमा पर बसे राज्य में असम राइफल्स के काफिले पर टूटकर अलग हुए गुरिल्ला धड़े का हमला याद दिलाता है कि खुली सीमाओं को देखते हुए भारत के लिए म्यांमार के साथ विद्रोह-विरोधी सहयोग कितना अहम है और नई दिल्ली म्यांमार के सैन्य शासकों के खिलाफ अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के संयुक्त प्रयासों में शामिल नहीं हो सकती.''

एमएनपीएफ 2013 में मणिपुर के दो नगा भूमिगत संगठनों—मणिपुर नगा रिवॉल्यूशनरी फ्रंट (एमएनआरएफ) और यूनाइटेड नगा पीपल्स काउंसिल (यूएनपीसी)—का विलय करके बनाया गया था. कहा गया था कि नया संगठन 'नगा क्रांतिकारियों की ढुलमुल हालत' की वजह से 'नगा लोगों की संप्रभुता और उनके आत्मनिर्णय के अधिकार की बहाली' के उद्देश्य से बनाया गया था.

मणिपुर के कई विद्रोही धड़ों ने सरकार के साथ अलग-अलग कार्रवाई-स्थगन समझौतों पर दस्तखत किए हैं. ऐसे में बीते छह साल में राज्य आतंकी घटनाओं में अच्छी-खासी कमी का गवाह रहा है. ये घटनाएं साल 2014 में 700 से घटकर साल 2020 में 113 पर आ गईं. उसके बाद फिर राज्य में विद्रोही गतिविधियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं. इस साल अब तक 162 विभिन्न आतंकी घटनाओं में 24 लोगों की जान जा चुकी हैं. बीते दो साल में मृतकों की गिनती दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुंची थी.

मणिपुर में अगले साल चुनाव होने हैं. पूरी संभावना है कि विपक्षी पार्टियां यह मुद्दा उठाएंगी. सत्तारूढ़ भाजपा का कहना है कि 13 नवंबर का हमला आतंकी धड़ों की हताशा का संकेत है. पार्टी के नेता दावा करते हैं कि इन हत्याओं का मकसद भाजपा की अगुआई वाली सरकार की छवि बिगाड़ना है, क्योंकि उसने विद्रोह के खिलाफ कड़ाई बरती है. भाजपा के एक बड़े नेता कहते हैं, ''मकसद यह जताना भी हो सकता है कि चीजें उतनी अच्छी नहीं हैं जितनी बताई जा रही हैं. विपक्षी पार्टियां यह कहकर इसका फायदा उठाने की कोशिश करेंगी कि भाजपा राज्य में शांति बनाए रखने में नाकाम हो गई है.''

राज्य सरकार हालांकि ज्यादा फिक्रमंद नहीं दिख रही. मुख्यमंत्री बीरेन सिंह दावा करते हैं कि उग्रवादी म्यांमार से दबे पांव घुसे. मुख्यमंत्री कहते हैं, ''सरहद पर हम और ज्यादा सतर्क रहेंगे और ऐसी कायराना कार्रवाई दोहराने नहीं देंगे.'' मगर हथियारबंद विद्रोही जब खुली सरहद के उस पार बैठे हों, तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है कि ऐसा हो पाएगा या नहीं.

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