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विश्व बाजार में रोटी सेंकने का मौका

रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग की वजह से दुनिया भर में भारत के गेहूं के निर्यात की संभावनाएं पैदा हो गई हैं

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दाना और भूसा भोपाल के पास एक मंडी में किसान दाना और भूसा भोपाल के पास एक मंडी में किसान
स्टोरी हाइलाइट्स
  • गेहूं के वैश्विक बाजार में रूस और यूक्रेन की दुश्मनी की वजह से लंबे समय का एक मार्ग जो खुल गया
  • भारत दुनिया का नंबर 2 गेहूं पैदा करने वाला देश है, पर निर्यात में पिछड़ा रहा है.
  • निर्यात कम होने की एक अहम वजह गुणवत्ता रही है

आपको शायद उम्मीद नहीं होगी कि यूक्रेन की जंग का असर उज्जैन में भी होगा. लेकिन मार्च शुरू होते ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन कर अपने राज्य से गेहूं की निर्यात की लाइनें जोड़ने का अनुरोध किया. प्रधानमंत्री ने जल्द ही केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से बात की. उसके बाद निर्यातकों, विदेश मंत्रालय और रेलवे तथा शिपिंग मंत्रालय के अधिकारियों के बीच सक्रियताएं बढ़ गईं.

भला क्यों न होती? गेहूं के वैश्विक बाजार में रूस और यूक्रेन की दुश्मनी की वजह से लंबे समय का एक मार्ग जो खुल गया है. ये दोनों बड़े गेहूं निर्यातक देश हैं. भारत दुनिया का नंबर 2 गेहूं पैदा करने वाला देश है, लेकिन अपनी निर्यात क्षमता का अधिकतम लाभ उठाने में वह पिछड़ा रहा है. अब उसके पास अपनी रोटी सेंकने का पूरा मौका है. आगे कहें तो ऐसा ही मौका उच्च-गुणवत्ता का गेहूं पैदा करने वाले मध्य प्रदेश के लिए भी है. 

अगर भारतीय गेहूं का निर्यात बड़े पैमाने पर होने लगता है तो इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलेगी और सरकारी खरीद पर उनकी निर्भरता कम होगी और वहां हमेशा हद से ज्यादा भरे रहने वाले भंडार को खाली करने में मदद मिलेगी. उत्साहजनक यह है कि प्राइवेट व्यापारियों ने निर्यात बाजार में मौके ताड़कर खरीद में कदम रखा है. मार्च के मध्य से जब पश्चिमी मध्य प्रदेश से फसल की किस्में मंडियों में आने लगीं, तो प्रति क्विंटल 2,015 रुपए की एमएसपी से अधिक दाम मिल रहा है. लॉजिस्टिक और वैश्विक गुणवत्ता के मानदंड की कुछ चुनौतियां हैं, लेकिन यह बहुत अच्छा मौका है, जिसे गंवाया नहीं जाना चाहिए.

भारत के संभावित बाजारों में मिस्र, नाइजीरिया, थाइलैंड, वियतनाम, तंजानिया, सूडान और तुर्की सरीखे देश शामिल हैं, जहां की स्थानीय जरूरतों के 40-100 फीसद हिस्से को रूस और यूक्रेन के निर्यातक पूरा करते हैं. इसी तरह अफ्रीका के 25 देशों में गेहूं की खपत 20-100 फीसद तक है. लेकिन भारतीय गेहूं हर जगह से गायब है. 

ये हालात बदल सकते हैं. भारत को 2022-23 के मार्केटिंग सत्र में 11.1 करोड़ मीट्रिक टन गेहूं की पैदावार की उम्मीद है. 2021-22 में निर्यात महज 70 लाख मीट्रिक टन था जो कुल पैदावार का करीब 7 फीसद ही है—हालांकि वह अतीत के मुकाबले सुधार ही है. बांग्लादेश और श्रीलंका प्रमुख आयातक हैं: उनकी करीब आधी जरूरत को भारतीय गेहूं पूरा करता है. अन्य आयातकों में यमन, कोरिया, फिलीपींस, नेपाल, इंडोनेशिया और पश्चिमी एशिया के कुछ देश शामिल हैं. हर जगह भारत खुद को रूस-यूक्रेन के खिलाफ खड़ा पाता है. लेकिन रूस प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और यूक्रेन के दक्षिणी और पूर्वी गेहूं बेल्ट के अधिकतर हिस्से में उसकी बुआई नहीं हो सकी है. कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीईडीए) के चेयरमैन डॉ. एम. अंगमुतु कहते हैं, ''वैश्विक किल्लत से भारत के लिए मौका बना है. हम वित्त वर्ष 23 में अपने निर्यात को दोगुना 1.2-1.5 करोड़ मीट्रिक टन करने का लक्ष्य रख रहे हैं.''

निर्यात कम होने की एक अहम वजह गुणवत्ता रही है. डॉ. अंगमुतु कहते हैं, ''कीमत के मायने में भारतीय गेहूं होड़ में फिट बैठता है, लेकिन सफाई और कीटनाशकों के इस्तेमाल जैसी कुछ समस्याएं हैं. उन पर कृषि मंत्रालय ध्यान दे रहा है. मिस्र से एक टीम मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों का दौरा कर रही है, ताकि खुद चीजें देख सके.'' किस्म भी एक और समस्या है. वे कहते हैं, ''अफ्रीका, यूरोप और पश्चिम एशिया में दुरुम किस्म की ज्यादा मांग है, जिससे पास्ता और ब्रेड बन सके. भारत का गेहूं कुछ नरम किस्म का है.''

इसी मायने में मध्य प्रदेश को मौका दिख रहा है. शरबती, लोकवन और अन्नपूर्णा की किस्में अच्छी मानी जाती हैं और इनके आटे से बनाई गई रोटियां ज्यादा सफेद, ज्यादा फूलने वाली और ठंडी होने पर भी नरम रहती हैं. मध्य प्रदेश दुरुम गेहूं की किस्में भी उगाता है और मालवा शक्ति सबसे लोकप्रिय है. इसलिए उत्साह काफी है. रायसेन जिले के उमरावगंज गांव के किसान नईम-उर-रहमान कहते हैं, ''15 वर्ष में शायद ऐसा पहली बार हो रहा है कि गेहूं की खरीद एमएसपी से अधिक कीमत पर हो रही है.'' अन्नपूर्णा और लोकवन किस्में प्रति क्विंटल 2,100-2,300 रुपए में बिक रही हैं, जबकि शरबती 3,000 रुपए की शानदार कीमत पर बिक रही है. मध्य प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (कृषि) अजीत केसरी बताते हैं, ''हम अपने दूतावासों और उच्चायोगों के जरिए अपनी प्रीमियम किस्मों को लोकप्रिय बनाने में जुटे हुए हैं. ये किस्में बाजारों में लोकप्रिय हो गईं, तो इससे हमें वहां स्थापित होने में मदद मिलेगी, चाहे जंग हो या न हो.''

देश को उन पहलुओं पर तेजी से ध्यान देने की जरूरत है जिससे वैश्विक बाजार में भारतीय गेहूं की वापसी हुई है. एक मसला कीटनाशकों और बीमारियों से जुड़े मानदंडों को हल करना है. निर्यातकों के लिए कागजी कार्रवाई पूरा करना एक अन्य मसला है. पंजाब और हरियाणा सरीखे राज्यों को टैक्स घटाने और निर्यातकों को प्रोत्साहन राशि देने को कहा गया है. मध्य प्रदेश ने लाइसेंस फीस को 20,000 रुपए से घटाकर 1,000 रुपए कर दिया है और निर्यातकों के लिए 3,00,000 रुपए की जमानत राशि माफ कर दी गई है. निर्यात-आधारित अस्थायी छंटाई और ग्रेडिंग इकाइयों की स्थापना के लिए भूमि की मंजूरी भी दी जा रही है.

लाइसेंस फीस और प्रमाणन से जुड़ी दिक्कतें निर्यात के मोर्चे पर भारत की सुस्ती का संकेत देती हैं. अकाल और भुखमरी से मौतों के दर्दनाक ऐतिहासिक अनुभव से हमेशा घरेलू आपूर्ति को बढ़ाने की प्रवृत्ति रही है. लेकिन, अनुमान है कि इस साल करीब 2 करोड़ मीट्रिक टन गेहूं केंद्रीय पूल में उपलब्ध रहेगा, जो विश्व बाजार में भारत के लिए अपने हिस्से पर दांव लगाने की खातिर काफी है.

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