scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

पंजाबः फ्लाईओवर से पंजाब में प्रवेश

पहचान के मसले पर अति संवेदनशीलता, सुरक्षा का प्रेत, टुकड़ों में बंटा अस्थिर राजनीतिक परिदृश्य...क्या यह सब भाजपा के फायदे में तब्दील होगा?

X
रैली जो नहीं हुई फिरोजपुर रैली स्थल पर भाजपा समर्थक; प्रदर्शनकारियों के सड़क जाम करने से प्रधानमंत्री के काफिले को वापस जाना पड़ा रैली जो नहीं हुई फिरोजपुर रैली स्थल पर भाजपा समर्थक; प्रदर्शनकारियों के सड़क जाम करने से प्रधानमंत्री के काफिले को वापस जाना पड़ा

यकीनन टीवी पर बहुप्रचारित पंजाब के फिरोजपुर के फ्लाईओवर पर जाम का मकसद यह संदेश देना था कि नाराज पंजाब भाजपा के लिए दरवाजे बंद कर रहा है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का काफिला करीब 20 मिनट तक रुका रहा. लेकिन विडंबना देखिए कि उस इकलौती घटना में मोदी की पार्टी के लिए 'खुल जा सिमसिम' जैसी संभावना छुपी दिखी, जो पहली दफा राज्य में गठबंधन के प्रभावी सहयोगी की तरह लड़ रही है. भाजपा का साजिश, यहां तक कि हत्या का षड्यंत्र, का आरोप भले ही राष्ट्रीय सुर्खियों से उतर गया हो, लेकिन सुरक्षा और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे इस सीमावर्ती राज्य के लोगों के मन को आंदोलित कर देते हैं. खासकर, दिसंबर के मध्य में बेअदबी से जुड़ी लिंचिंग की दो घटनाओं से राज्य की राजनीति में धर्म आधारित संवेदनशीलता चरम पर पहुंच गई है. 

प्रधानमंत्री की रैली का मकसद भाजपा कार्यकर्ताओं के मनोबल में इजाफा करना था. भगवाधारी एक-दूसरे से जुड़ी दो घटनाओं से बेहद मायूस थे. वे अपने लंबे समय के सहयोगी शिरोमणि अकाली दल के बिना हैं, जिसने सितंबर 2020 में नाता तोड़ लिया था. उस टूट की वजह दूसरी सबसे महत्वपूर्ण वजह—अब रद्द किए जा चुके कृषि कानून—बन गए, जिससे पंजाब का समूचा देहात भाजपा के खिलाफ हो गया. पंजाब में जट्ट सिखों के प्रभुत्व वाली यूनियनों की अगुआई में 15 महीने दिल्ली की सीमाओं पर चले किसान आंदोलन ने यह तय कर दिया कि विवादास्पद कानून विधानसभा चुनाव में भावनात्मक मुद्दा होंगे. लिहाजा, भाजपा बैकफुट पर आ गई. इसी परिदृश्य को अब पार्टी संतुलन साधने के जटिल तौर-तरीकों से बदलना चाहती है.

रणनीति बहुमुखी है. कोशिश ये है कि ताकतवर जट्ट सिख समुदाय में नुक्सान भरपाई की जाए और उदार लोगों में कुछ हमदर्दी के कोने तलाशे जाएं. उसी के साथ हिंदू वोटों को एकजुट करने की कोशिश की जाए, जो अपने आप में एक विडंबना है. यह इसलिए जरूरी है कि ग्रामीण जमींदारों में भले जट्ट सिख सिर्फ 19 फीसद हों, मगर असर व्यापक है. भाजपा को उम्मीद है कि कृषि कानूनों के रद्द होने से इस नाराज समुदाय की भावनाएं कुछ शांत होंगी. इसी के साथ यह भी समझा जाने लगा है कि अकाली दल, पंथक एजेंडे से भटक गया है. भाजपा अपनी कुछ प्रतीकात्मक कोशिशों के हवाले से उस खालीपन को भरना चाहती है. करतारपुर साहिब कॉरीडोर, गुरद्वारों के लिए विदेशी चंदा, लंगरों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखना और अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद गुरुग्रंथ साहिब की प्रतियों को देश में लाना वगैरह...ये काम मददगार हो सकते हैं. भाजपा अपने पदाधिकारियों में सिख नेताओं को आगे भी कर रही है. दस जिलों में पार्टी के प्रमुख सिख हैं और करीब एक-चौथाई कार्यकर्ता भी सिख हैं. भाजपा ने पूर्व अकाली दिग्गज गुरचरण सिंह तोहड़ा और सुरजीत सिंह बरनाला के परिजनों को भी पार्टी में शामिल किया है और इसमें कोई हर्ज भी नहीं है.

दूसरे, उनके नए सहयोगी भी नए इलाकों में पार्टी की पहुंच बढ़ाएंगे. पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस (पीएलसी) का 'शाही पंजाब' बेल्ट कहे जाने वालेपटियाला, फरीदकोट, बठिंडा, मुक्तसर में पैठ है. जबकि सुखदेव सिंह ढींढसा का शिरोमणि अकली दल (संयुक्त) संगरूर, बरनाला, मलेरकोटला और मनसा में मजबूत है. भाजपा और अमरिंदर एक ही पाले में है, जो भले पहली नजर में विरोधाभासी लगे, लेकिन इससे भगवा खेमे में पुरानी अदावत भी दूर हो गई है. इसके पहले पार्टी अमरिंदर के गढ़ पटियाला जिले में चुनावी पैठ बनाने से ज्यादातर दूर ही रही. सिर्फ वह राजपुरा सीट तक ही सीमित रही है. हालांकि आरएसएस से जुड़े संगठन पिछले चुनावों में पूरे मालवा क्षेत्र में भाजपा के सहयोगी अकालियों के बदले कांग्रेस को वोट दिलवाते रहे हैं. इसका श्रेय अमरिंदर की उदार सिख और राष्ट्रवादी की छवि को जाता है. इस बार तो मामला संग-साथ का है. हालांकि घिसटती पीएलसी से कोई बड़ा असर डालने की उम्मीद नहीं की जा रही है (अटकलें हैं कि अमरिंदर अपने लोगों से कमल निशान पर चुनाव लड़ने के लिए कह सकते हैं).

तीसरे, भाजपा चरणजीत सिंह चन्नी की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार की पंजाब की जाति और समुदायों में ताकत में भी सेंध लगाना चाहती है. पंजाब की 3 करोड़ की आबादी में कई वोटिंग ब्लॉक हैं. पंथक (सिख) वोटर कुल 117 विधानसभा सीटों में से 48 के नतीजे तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं, जो ज्यादातर धार्मिक मुद्दों पर वोट देते हैं. हिंदू और सिखों में बंटे हुए दलित 32 फीसद हैं, जिसमें 24.8 फीसद तो एकमुश्त दलित सिख ही हैं. साथ ही 60 उपजातियों कें बंटे ओबीसी भी 32 फीसद हैं.

ऊंची जातियों के हिंदुओं का वर्चस्व 45 शहरी सीटों पर है और वे भाजपा के लिए स्वाभाविक वोट बैंक जैसे हैं, इसलिए दलित वोट बैंक पर ही सारा ध्यान केंद्रित करना है. ये हैं रामदासी, रविदासी और आदि-धर्मी सिख, जिनके अलावा मजहबी सिख और उनके हिंदू भाई वाल्मीकि हैं. इसी वोट बैंक में पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री चन्नी खासकर दोआबा इलाके में गंभीर चुनौती पेश कर रहे हैं. वे खुद रामदासी सिख हैं और उन्हें गोलबंद कर रहे हैं और उनके जरिए सभी दलित जातियों-समुदायों में पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं. वे इस बार शायद दोआबा में आदमपुर से चुनाव लड़ें, जहां 45 फीसद दलित आबादी है. चन्नी रविदासी संगठन डेरा सचखंड बल्लां के आसरे हैं. भाजपा इसके बदले मजहबी सिखों और वाल्मीकियों पर डोरे डालने की कोशिश में है और समुदाय को बेहतर प्रतिनिधित्व देने का वादा कर रही है. 

पिछले विधानसभा में दो सीटों वाली भाजपा ने इस बार 70 सीटों लड़ने का मन बनाया है और 47 सीटें सहयोगी दलों के लिए छोड़ने जा रही है. हालांकि यह बेशक भारी चुनौती भरा होगा क्योंकि 2007 में उसकी वोट हिस्सेदारी 8 फीसद थी, जो 2017 के विधानसभा चुनावों में 5 फीसद पर आ गई और उसे महज तीन सीटें मिलीं, वह भी उस समय जब मोदी की लोकप्रियता अपनी बुलंदी पर थी. किसान आंदोलन के दौरान भारी विरोध झेलने के बावजूद पार्टी राज्य के सभी 24,689 पोलिंग बूथों पर अपनी मौजूदगी का दावा करती है. जाहिर है, नए दोस्तों के साथ होड़ भी होती है. पंजाब के एक बड़े भाजपा नेता कहते हैं, ''दूसरी पार्टियों से अच्छे नेताओं का भाजपा में स्वागत है. लेकिन हमें अवसरवादियों के लिए अपने दरवाजे नहीं खोलने चाहिए. हमारे पास हिंदू बहुल सीटों पर तगड़े उम्मीदवार हैं. भाजपा नेतृत्व को दूसरी पार्टियों से आने वालों को टिकट देने के पहले उनको भरोसे में जरूर लेना चाहिए.''

इसी वजह से पार्टी को नए गठजोड़ों से अपने वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी की उम्मीद है. इसके अलावा अमरिंदर के वफादारों गुरु हरशाली के विधायक राना सोढ़ी, संगरूर के पूर्व विधायक अरविंद खन्ना और कादियां के विधायक फतेहजंग सिंह बाजवा की आमद को अपने बड़ी रणनीति का हिस्सा मानती है. हालांकि असली चाल तो ऊंची जातियों के हिंदू वोट बैंक को एकजुट बनाए रखकर जट्ट सिखों में नाराजगी मिटाने और दलितों पर डोरे डालने की कामयाबी में ही निहित होगी. इसी मामले में सुरक्षा और राष्ट्रवाद की बोली काम आती है. तो, क्या फिरोजपुर पंजाब के लिए पुलवामा बनेगा? नतीजा हम आगामी 10 मार्च को देखेंगे. 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें