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दक्षिण में संघीय खींचतान

साल 1967 में पहली बार सत्ता में आने के बाद से द्रमुक सरकारों का तमिलनाडु के राज्यपालों के साथ रिश्ता लगातार असहज रहा है

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आमना-सामना : राज्यपाल आर.एन. रवि के साथ सीएम एम.के. स्टालिन (बाएं) आमना-सामना : राज्यपाल आर.एन. रवि के साथ सीएम एम.के. स्टालिन (बाएं)

पहले गैर-कांग्रेसी दल के रूप में 1967 में तमिलनाडु में सत्तारूढ़ होने के बाद से शायद ही कभी द्रमुक सरकारों और राज्यपाल नामक संवैधानिक संस्था के बीच अच्छे संबंध रहे हों. द्रमुक के पहले मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादुरै अक्सर कहते थे कि राज्यों को राज्यपाल की वैसी ही जरूरत होती है, जैसे बकरे को दाढ़ी की. संघवाद और सामाजिक न्याय का समर्थन करने वाली—और 1976 तथा 1991 में केंद्र की ओर से बर्खास्त की गई—पार्टी के लिए इस रिश्ते के अनिवार्य रूप से परस्पर विरोधी होने की बात को समझा जा सकता है.

ऐसे में जब पूर्व आइपीएस अधिकारी आर.एन. रवि को सितंबर 2021 में तमिलनाडु का राज्यपाल नामित किया गया, तो इतिहास का वर्तमान पर असर पड़ना तय था. यही वजह थी कि द्रमुक के गठबंधन सहयोगी वीसीके (विदुथलै चिरुथैगल काची) के अध्यक्ष तिरुमावलवन ने इंटेलिजेंस ब्यूरो में उनके कार्यकाल का उल्लेख करते हुए रवि को 'भाषाई पहचान के दावों को उलटने का प्रयास करने में सक्षम व्यक्ति' के रूप में किया था. अगर वह स्थिति संघर्ष की संभावनाओं से परिपूर्ण थी, तो अब ये संभावनाएं पूरी तरह से साकार हो चुकी हैं.

बीते 25 अप्रैल को रवि उढ़गमंडलम के राजभवन में राज्य के केंद्रीय, राज्य और निजी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे थे. दूसरी ओर, चेन्नै में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन विधानसभा में ऐसे दो विधेयक पारित करवा रहे थे जिनका उद्देश्य प्रदेश के 13 राज्य विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्ति के मामले में राज्यपाल की शक्तियों को सीमित करते हुए यह अधिकार राज्य सरकार को सौंपना था. ये विधेयक थे—तमिलनाडु विश्वविद्यालय कानून (संशोधन) अधिनियम और चेन्नै विश्वविद्यालय (संशोधन) अधिनियम. उसी दिन बाद में, राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा (नीट—एनईईटी) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के खिलाफ चल रहे अभियान का समापन करने और राज्य के संघीय अधिकारों को फिर से हासिल करने के बारे में हुई बैठक में स्टालिन ने राज्यपाल रवि पर उस विधेयक को अटकाए रखने के लिए तीखा हमला किया जिसमें राज्य को नीट के दायरे से छूट देने की व्यवस्था की गई थी.

राज्यपाल की भूमिका की तुलना डाकिया से करते हुए भन्नाए हुए स्टालिन ने कहा, ''राज्यपाल के पास इसकी (विधेयक वापस करने की) शक्ति नहीं है. उसे राष्ट्रपति को भेजा जाना चाहिए. ऐसा करने से इनकार करना उनके पद के लिए अशोभनीय है. एक नियुक्त राज्यपाल आठ करोड़ लोगों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की ओर से पारित विधेयकों को वापस भेज रहा है. क्या हम कह सकते हैं कि भारत में लोकतंत्र है?'' इसके दो दिन बाद विधानसभा ने तमिलनाडु सिद्ध चिकित्सा विश्वविद्यालय की स्थापना और राज्यपाल के बजाए मुख्यमंत्री को इसका कुलाधिपति बनाए जाने की व्यवस्था वाला विधेयक पारित किया.

रवि ने नीट संबंधी पहला विधेयक विधायिका को वापस भेजने के साथ अपने उस कदम के कारणों का सार्वजनिक रूप से उल्लेख करके सत्तारूढ़ दल को नाराज कर दिया था. उसके बाद विधानसभा ने जल्दी से नीट विधेयक का दूसरा संस्करण पारित किया और उसे राज्यपाल को भेज दिया. इस बीच, संसद में द्रमुक सांसदों ने मांग उठाई कि रवि को वापस बुलाया जाए. इन सांसदों ने उस विधेयक पर राज्यपाल की कार्रवाई के लिए एक समयसीमा निर्धारित करने के उद्देश्य से एक निजी सदस्य विधेयक भी पेश किया.

स्टालिन कहते हैं, ''एक निर्वाचित सरकार विश्वविद्यालय कुलपति की नियुक्ति भी नहीं कर सकती. यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है.'' यह उल्लेख करते हुए कि अतीत में कुलपतियों की नियुक्ति राज्य सरकार के परामर्श से होती थी, मुख्यमंत्री कहते हैं कि पिछले चार वर्षों से राज्यपाल कार्यालय ऐसे काम कर रहा है जैसे कि उनके पास इन नियुक्तियों का विशेषाधिकार हो. राजनीतिक टिप्पणीकार एन. सत्य मूर्ति बताते हैं, ''कुलपतियों का चयन राज्य के भीतर से करने और इस प्रक्रिया में राज्य सरकार को शामिल करने की परंपरा की पूर्व राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित की ओर से अनदेखी करते हुए नियुक्तियां करने के साथ इसकी शुरुआत हुई थी. मानो वे सभी कुलपति यूजीसी के माध्यम से केंद्र के प्रति उत्तरदायी हों.'' सत्य मूर्ति का कहना है कि केंद्र और राज्यपालों को राज्यों के साथ संबंधों के मामले में अधिक संवेदनशील और सतर्क होना चाहिए.

असल में केंद्र-राज्य संबंधों का अध्ययन करने के लिए 2007 में स्थापित मदन मोहन पुंछी आयोग ने सिफारिश की थी कि राज्यपालों के पास कुलपितयों की नियुक्ति की शक्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे कार्यों और शक्तियों का टकराव होगा. तमिलनाडु सहित 19 राज्यों ने आयोग की सिफारिशों को स्वीकार्य माना था. 2017 में, तत्कालीन अन्नाद्रमुक शासन ने औपचारिक रूप से ऐसा किया और पिछले साल सरकार बनाने के बाद द्रमुक ने भी केंद्र के सामने इसी विचार को दोहराया. अन्य राज्यों में यह पहले से लागू है. गुजरात सरकार कुलपति पद के उम्मीदवारों की पहचान करने के लिए गठित खोज समिति के अनुशंसित तीन नामों में से एक को चुनती है. आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में कुलपतियों का चयन राज्य सरकार के परामर्श से किया जाता है.

जब 1994 में जे. जयललिता मुख्यमंत्री थीं, ऐसा ही विवाद हुआ था और राज्यपाल एम. चेन्ना रेड्डी ने कुलपतियों की नियुक्ति का अधिकार राज्य को देने से असहमति जताई थी. उनका तर्क था कि इससे विश्वविद्यालयों के प्रशासन में बहुत अधिक सियासी हस्तक्षेप होगा. तब रेड्डी और जयललिता ने एक-दूसरे के खिलाफ तीखी बयानबाजी की थी. एक साल बाद, अप्रैल 1995 में तमिलनाडु विधानसभा ने राज्यपाल रेड्डी पर चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने के लिए असंवैधानिक तरीके से काम करने का आरोप लगाते हुए केंद्र से उन्हें वापस बुलाने की मांग की थी.

मुख्यत: भाषा के कारण नीट का विरोध कर रहे तमिलनाडु का कहना है कि इसका माध्यम अंग्रेजी होने के कारण उसके छात्रों को नुक्सान होता है. फिलहाल यह राज्य के सबसे भावनात्मक मुद्दों में से एक है. इस दिशा में राज्य के प्रयासों को सियासी वजहों से बाधित करने के आरोपों से उबरने के लिए राज्यपाल रवि को अतिरिक्त प्रयास करने पड़ सकते हैं.

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