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कृषिः असंतोष की खाद

डीएपी की गंभीर किल्लत की वजह से उसकी जमाखोरी और कालाबाजारी हो रही है. यह भी आरोप है कि मिलीभगत से निजी व्यापारियों को खाद की खेप दे दी गई है

किल्लत हिसार की अनाज मंडी में डीएपी की खेप आने का इंतजार करते किसान किल्लत हिसार की अनाज मंडी में डीएपी की खेप आने का इंतजार करते किसान

इन दिनों देश भर के किसान खाद (उर्वरक) और खासकर डायअमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) और यूरिया की कमी से परेशान हैं. रबी का सीजन चल रहा है और ये दोनों ही इस सीजन में खेती के लिए जरूरी हैं. इनकी किल्लत से बुआई में देरी हो रही है, जिससे उपज कम होगी और किसानों की आमदनी घटने का खतरा है. इस संकट की वजह से राजनैतिक पार्टियों का समर्थन-आधार भी टूटने का खतरा है. खासकर, उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव होने वाले हैं और इन दोनों ही प्रदेशों में किसान अहम राजनैतिक धड़े हैं. लिहाजा यहां इस संकट के ज्यादा तीखे नतीजे हो सकते हैं.

डीएपी की कमी के पीछे बहुत कुछ अंतरराष्ट्रीय वजहें हैं. मगर यह भी सच है कि केंद्र सरकार ने उर्वरकों पर सब्सिडी का ऐलान देर से किया, जिसकी वजह से ऑर्डर देने में देरी हुई. देश को एक साल में 90 लाख टन डीएपी की जरूरत होती है, जिसमें से 61 लाख टन आयात के माध्यम से पूरी होती है. दरअसल, भारत दुनिया में डीएपी का सबसे बड़ा आयातक देश है. इस मामले में भारत के बाद पाकिस्तान, अमेरिका, तुर्की और वियतनाम का स्थान है. खाद की इस जबरदस्त किल्लत की दूसरी वजह यह है कि बीते दशक में भारत ने छह बड़े उर्वरक कारखाने बंद कर दिए, क्योंकि पता चला कि उत्पादन के मुकाबले आयात कहीं ज्यादा सस्ता है. वह फैसला अब बड़ा संकट लेकर आया है. दरअसल, चीन ने फॉस्फेट के निर्यात पर पाबंदी लगा दी और इसका असर दुनिया के साथ हम पर भी पड़ा. उर्वरकों का सबसे बड़ा उत्पादक देश चीन, भारत को डीएपी का सबसे बड़ा सप्लायर भी है.

केंद्रीय उर्वरक मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी खाद की कमी की बात से इनकार करते हैं. मगर वे अधिकारी इस बात की शिकायत भी करते हैं कि 'दहशत और अफवाहों' के कारण 'जमाखोरी हो रही है'. पिछले हक्रते पंजाब के कृषि मंत्री रणदीप सिंह नाभा ने केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री मनसुख मांडविया से मिलकर राज्य में उर्वरकों की कमी का मुद्दा उठाया है. पंजाब के किसान केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों को लेकर पहले ही आगबबूला हैं. अब खाद के इस संकट से उनका आक्रोश और बढ़ गया है. दूसरी तरफ, पंजाब के पड़ोसी राज्य हरियाणा में तो राज्य सरकार को उर्वरक बिक्री केंद्रों पर पुलिस लगानी पड़ी. यहां तक कि कुछ इलाकों में पुलिस थानों से खाद का वितरण करना पड़ा.

मध्य प्रदेश में यह संकट अक्तूबर के तीसरे हफ्ते में सबसे पहले भिंड और मुरैना के उत्तरी जिलों से शुरू हुआ, जहां किसानों ने हाइवे पर जाम लगा दिया. सरकार की ओर से संचालित प्राइमरी एग्रीकल्चर क्रेडिट सोसाइटी (पीएसीएस) के बिक्री केंद्रों के बाहर लंबी कतारें लग गईं और कानून-व्यवस्था संभालना मुश्किल हो गया. कुछ जगहों पर तो किसानों पर लाठी चार्ज करना पड़ा. उर्वरकों की लूट की भी खबरें आईं.

आधिकारिक तौर पर तो मध्य प्रदेश सरकार भी इस बात से इनकार करती है कि खाद की कमी है. मध्य प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव, कृषि, अजित केसरी कहते हैं, ''पर्याप्त खाद उपलब्ध है, हालांकि आशंका से भरे खरीद का रुझान भी देखा गया है. माल आते ही उठाया जा रहा है, इसीलिए गोदामों में इसके अंबार दिखाई नहीं देते. बुआई निर्धारित समय सीमा में पूरी हो जाएगी.''

खाद की कमी के चलते कालाबाजारी भी हो रही है. भारतीय किसान यूनियन के मध्य प्रदेश इकाई के महासचिव अनिल यादव कहते हैं, ''सरकार का दावा है कि कोई कमी नहीं है. उसका यह भी कहना है कि 70 फीसद माल पीएसीएस और 30 फीसद निजी व्यापारियों के जरिए दिया जा रहा है. अगर ऐसा है तो फिर पीएसीएस में कमी क्यों है और निजी व्यापारियों के पास कमी क्यों नहीं है? जाहिर है मिलीभगत का खेल चल रहा है.'' यादव का दावा है कि डीएपी का 1,200 रुपए में मिलने वाला एक बोरा 1,500 रुपए में, या खरीदने की तत्काल जरूरत और उतावली देखकर उससे भी ऊंचे दाम में बेचा जा रहा है.

किसान कह रहे  हैं कि बुआई में देरी का बुरा असर उपज पर पड़ेगा. धार जिले की बदनावर तहसील के साहबनगर गांव के किसान संजय पटेल कहते हैं, ''मैंने एचआइ 1544 प्रजाति की बुआई का मंसूबा बनाया, जिसे तीन सिंचाई की जरूरत होती है. मैं जितनी देर से बुआई करूंगा, मेरे ट्यूबवेल सूखने की आशंका उतनी ही बढ़ जाएगी और सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलेगा, क्योंकि खाद का जुगाड़ कर लेने वाले बुआई पूरी कर चुके होंगे और पूरा पानी निकाल लेंगे.'' गेहूं की फसल को प्रति एकड़ 50-60 किलो डीएपी की जरूरत होती है, जबकि चने सरीखी फसलों के लिए कम डीएपी चाहिए. डीएपी को बीज के साथ मिलाते हैं और थोड़े-से यूरिया के साथ बुआई की जाती है.

पहले उर्वरकों की कमी आए दिन की घटना हुआ करती थी. पिछले पांच साल में सरकार ने इस समस्या को बड़ी हद तक कामयाबी से हल कर लिया था. कैसे किया था? कृषि विभाग के सूत्र बताते हैं कि पीएसीएस को रोलिंग स्टॉक रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिससे खरीफ सीजन के माल का इस्तेमाल किसान रबी सीजन में भी कर पाएं.

फिर इस साल हालात क्यों बदल गए? अधिकारी इसके लिए केंद्र सरकार की तरफ से सब्सिडी के फैसले में देरी को दोषी ठहराते हैं. उर्वरक मुहैया करवाने का चक्र पूरे साल चलता रहता है. राज्य केंद्रीय कृषि मंत्रालय को अपनी जरूरत बताते हैं, जिसे जोड़कर रसायन और उर्वरक मंत्रालय को कुल मांग बता दी जाती है. उर्वरक या उन्हें बनाने में लगने वाले कच्चे माल की मांग का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा किया जाता है. केंद्र नाइट्रोजन (एन), फॉस्फोरस (पी) और पोटेशियम (के) पर अलग-अलग मात्रा में पोषण-आधारित सब्सिडी देता है. इस साल उर्वरक और उनके कच्चे माल के दामों में शुरू से ही तेजी देखी गई. मुख्य वजह थी डीजल की बढ़ती कीमतें. इसकी वजह से डीएपी के 50 किलो के बोरे की कीमत 1,200 रुपए से बढ़कर 1,900 रुपए पर पहुंच गई.

केंद्र सरकार को इसके राजनैतिक नतीजों को लेकर फिक्र हुई और उसने ऐलान किया कि इस कीमत वृद्धि से राहत देने के लिए वह सब्सिडी बढ़ाएगी. सब्सिडी तब 500 रुपए से बढ़ाकर 1,200 रुपए कर दी गई, जिससे कीमत 1,900 रुपए से घटकर 1,200 रुपए पर आ गई. खरीफ के सीजन में ऐसा कोई संकट नहीं था. तब रबी के सीजन की तुलना में मांग कम भी होती है. डीएपी की अंतरराष्ट्रीय कीमतें अलबत्ता खरीफ के सीजन से ही बढ़ने लगीं और करीब 580 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 650 डॉलर से ऊपर चली गईं. इसी तरह यूरिया के अंतरराष्ट्रीय दाम भी खरीफ सीजन के एक महीने में ही 410 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 440 डॉलर पर पहुंच गए.

रबी सीजन के लिए सब्सिडी बढ़ाने का फैसला सितंबर के अंत में जाकर लिया गया. लिहाजा ऑर्डर देने में देर हुई और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लाइनों में भीड़ बढ़ने और जाम लगने का असर आपूर्ति पर भी पड़ा. मध्य प्रदेश के एक बड़े अफसर कहते हैं, ''अगर ऑर्डर जुलाई या अगस्त में दे दिए जाते, तो इस देरी से बचा जा सकता था.'' केंद्र सरकार ने अब उत्पादन इकाइयों और बंदरगाहों से रेक पॉइंट और उनसे आगे राज्यों तक आपूर्ति पर नजर रखने के लिए एक टीम बनाई है.

केंद्र सरकार की तरफ से दी जा रही खाद सब्सिडी में बीते पांच साल के दौरान लगातार बढ़ोतरी हुई है. मौजूदा साल यह करीब 1.2 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गई. पिछले खरीफ के मौसम में ही बढ़ती कीमतों से राहत देने के लिए जून 2021 में उर्वरकों पर सब्सिडी में 14,775 करोड़ रुपए का इजाफा हुआ. मौजूदा रबी सीजन में और 25,000 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ सकते हैं.

मध्य प्रदेश में किसानों को आसानी से मिलने वाली दूसरी खाद एनपीके मिश्रित खाद को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. लेकिन एनपीके की कीमत थोड़ी ज्यादा पड़ती है, इसलिए किसान अपने पुराने भरोसेमंद डीएपी को ही चुनते हैं. मगर कोई चारा नहीं होने की वजह से किसान एनपीके को अपना रहे हैं.

भारत इस साल आयात में कटौती की योजना बना रहा था, क्योंकि देश के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों के उर्वरक कारखानों की क्षमता बढ़ाई जा रही है. पारादीप फॉस्फेट लिमिटेड तथा मंगलौर केमिकल और फर्टिलाइजर में 'मेक इन इंडिया' रणनीति के तहत उत्पादन क्षमता में 4 लाख टन की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है. मगर क्षमता बढ़ाने में देरी, उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी और वैश्विक कमी की वजह से भारत के खेत संकट से दोचार हैं. और यह राजनैतिक मुद्दा भी बन सकता है.

—साथ में अनिलेश एस. महाजन

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